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तेज़ होगी दलित ईसाई की सामाजिक बराबरी की लड़ाई

Created By : अभय कुमार Date : 2016-12-29 Time : 12:13:45 PM


तेज़ होगी दलित ईसाई की सामाजिक बराबरी की लड़ाई

कई दशकों से दलित ईसाई चीख-चीख कर कह रहे थे कि वह छुआछुत और जातिगत-भेदभाव के शिकार हैं मगर अब कैथोलिक समुदाय की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था ‘इंडियन कैथोलिक ईसाई चर्च’ ने भी इस “संगीन गुनाह” को क़बूल कर लिया है। पिछले हफ्ते अपने पॉलिसी डॉक्यूमेंट को जारी करते हुए उपर्युक्त संस्था ने ऐलान किया कि वह छुआछूत और भेदभाव को ख़त्म करने के लिए शख्त क़दम उठा रही है। मैं इस घटना को दलित-ईसाई के आन्दोलन की एक बड़ी कामयाबी मानता हूं। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में दलित ईसाई आरक्षण-समेत कई मुद्दे पर अपनी लड़ाई को और तेज़ करेंगे।

 

दलित-ईसाई वह लोग हैं जिन्होंने जाति-प्रथा के अन्याय और छुआछुत से मुक्ति के लिए ईसाई धर्म को अपनाया। कई इतिहासकारों का मानना है कि भारत में ईसाई मज़हब को अपनाने वालों ज़्यादातर दलित ईसाई निचली जाति के थे। मगर नए मज़हब में भी उन्हें सामाजिक बराबरी नहीं मिल सकी। आज भी दलित ईसाई को भेदभाव झेलना पड़ता है। कुछ ऐसा ही दर्द दलित मुसलमानों का भी है जो अपने मिल्लत में अशराफिया तबक़े के हाथों दबाये जाते हैं।

 

आबादी में अपने समुदाय में बहुसंख्यक होने के बावजूद भी दलित ईसाई हाशिये पर धकेले हुए हैं। मुठी-भर ऊँची-जाति के ईसाई सामाजिक, धार्मिक, तालीमी और आर्थिक की ज़्यादातर संस्थाओं पर क़ब्ज़ा जमाए हुए हैं।

 

बात अगर चर्च की हो तो वहां भी भी वर्चस्व ईसाई “ब्राह्मणों” का ही है। इंडियन कैथोलिक ईसाई चर्च में कार्यरत कुल 5000 बिशप में दलित ईसाई की तादाद सिर्फ 12 है। शिक्षण संस्थाओं में भी दलित ईसाई की संख्या काफी कम हैं। कॉलेजों, विश्वविदालायाओं और टेक्निकल संस्थओं में इनका प्रतिनिधित्व और भी नीचे गिर जाता है। कई शोध से पता चला है कि श्रम के मामले में उनकी हालत “हिन्दू” दलितों के बराबर हैं। सार यह है आज भी दलित ईसाई अपने समाज में सामाजिक बराबरी से महरूम हैं।


अनुसूचित जाति का दर्जा पाना दलित ईसाई की मुख्य मांग है जिसकी हिमायत अब तक की कई सरकारी आयोग भी कर चुके हैं। सामाजिक न्याय और प्रगतिशील सोच से जुड़े कई सामाजिक, राजनितिक और बौद्धिक शख्सियतों ने भी दलित ईसाई की मांग जायज़ को करार दिया है। बावजूद इसके अबतक की सरकारों के रुख में बदलाव नहीं दिख रहा हैं। 


पिछले साल जब पूछा गया कि क्या सरकार सच्चर और रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों की रौशनी में दलित-ईसाई और दलित मुस्लिम को अनुसूचित जाति का दर्जा देगी तो केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री और बीजेपी के नेता थावर चंद गहलोत ने कहा नहीं क्योंकि इससे धर्मपरिवर्तन को बढ़ावा देगा।

 

मैं गहलोत के विचार से सहमत नहीं हूँ। जब धर्म को चुनने और छोड़ने का अधिकार हमारा संविधान हमें देता है तो फिर हिन्दू सत्ताधारी वर्ग को धर्मपरिवर्तन से क्या दिक्क़त है? यह कैसे विडंबना है कि सत्तावर्ग के लोगों को दलितों की याद तभी आती है जब वह हिन्दू धर्म की गुलामी से आज़ादी पाने के लिए कोशिश तेज़ कर देते हैं।

 

कानून के मुताबिक अनुसूचित जाति में वह लोग दाखिल नहीं किये जा सकते जो मुस्लिम और ईसाई हों मगर आज़ादी से पहले ऐसा नहीं था। 1950 के राष्ट्रपति ऑर्डर के तहत दलित ईसाई और दलित मुस्लिम को एका-एक अनुसूचित जाति से बहार कर दिया गया। इस ऑर्डर में साफ तौर से लिखा गया कि जो हिन्दू धर्म के अलावा किसी और धर्म को मानता है वह अनुसूचित जाति में शामिल नहीं हो सकता है। 


बाद में चलकर इस ऑर्डर में संशोधन कर सिख और बुद्ध धर्म के मानने वालों को लाया गया। इसके पीछे सत्तावर्ग की दलील थी कि कि छुआछूत और जातिगत भेदभाव सिर्फ हिन्दू धर्म का हिस्सा है और जिसने धर्मपरिवर्तन कर लिया वह अनुसूचित जाति के लिए दिए गए आरक्षण समेत सारे अधिकारों से वंचित हो गया।


हिंदूवादी सत्तावर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे के।एम। मुंशी ने उस वक्त संसद में बोलते हुए कहा कि अनुसूचित जाति का दर्जा “हरिजन” को इसलिए दिया जा रहा है ताकि वह एक दिन हिन्दू समाज के अन्दर वह शामिल हो जाये।

 

आज दलित ईसाई और दलित मुस्लिम के एक बड़े तबके इस ग़ैर-बराबरी के खिलाफ लड़ रहे हैं। उनका मानना है कि आरक्षण का असली मकसद प्रतिनिधित्व को सुनियोजित करना होना चाहिए न कि एक खास धार्मिक समुदाय को “कंसोलिडेट” करना। कई विद्वानों के मत में दलित ईसाई और दलित मुस्लिम को आरक्षण से बाहर रखना भारत के सेक्युलर मूल्य को ठेस पहुंचता है।

 

अब जब कि चर्च ने भी दलित ईसाई दर्द को महसूस किया है तो उम्मीद बढ़ी है कि उनकी लड़ाई आने वाले दिनों में और तेज़ होगी। ज़रुरत है। बेहतर यही है कि अन्य मजलूम तबके को भी इस लड़ाई में बड़े पैमाने पर जोड़ा जाये।

 

(अभय कुमार जेएनयू में पीएचडी (इतिहास) कर रहे हैं। इनसे debatingissues@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

 


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