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यह उम्मीदों का साल है और ये हैं उम्मीदें.....

Created By : डॉ एनी जोया Date : 2017-01-03 Time : 15:29:00 PM


यह उम्मीदों का साल है और ये हैं उम्मीदें.....

बीता हुआ साल कई खट्टे मीठे अनुभवों के साथ बीत गया। रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या से शुरू हुआ यह साल ऊना में हमारी पीठ पर बरसी लाठियों और अख़लाक़ के खून से भीगता हुआ, नजीब को नज़रों से ओझल कर गया और भागलपुर में अपनी जमीन की मांग कर रहे दलित महिलाओं की पीठ पर बरसती हुयी लाठियों के साथ टीसता हुआ दर्द दे गया। 

 

वहीँ, 2016 का साल उम्मीद जगाने के लिये भी जाना जाएगा। रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद जिस तरह से पूरा देश बिलख रहा था, वो अप्रत्याशित भी नही था। सदियों से दमन अत्याचारों को जब्त कर रहे बहुजन समाज की आंसुओ की धारा ने क्रान्ति और आंदोलन की राह पकड़ ली। ऊना में जब दलितों की पीठ पर हिंदूवादियों की लाठियां बरसी तो पूरा बहुजन समाज उबल रहा था। फिर अख़लाक़ की पीट पीटकर बेरहमी से हत्या, जेएनयू से नजीब का गायब होना और भागलपुर में दलित महिलाओं की पीठ पर कथित समाजवादी सरकार की बरसती लाठियों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन ने आंबेडकर-फुले-पेरियार की संघर्ष परंपरा को और भी मजबूत किया। मेनस्ट्रीम मीडिया की अनदेखी से त्रस्त बहुजन समाज को नेशनल दस्तक जैसे वैकल्पिक मिडिया का साथ भी मिला और पलपल न्यूज जैसे वेबपोर्टल का उभरना भी संतोषजनक है।


नाउम्मीदी के इस दौर में कई चेहरे सामने आये जो लगातार दलित-पिछड़े-वंचित-आदिवासी-मुसलमान के पक्ष में तनकर लोहा लेते रहे।  यही उम्मीद हैं आने वाले वक़्त की।

 


इस सूची में दयामनी बारला हैं जो लगातार आदिवासियों के अधिकारों और जल-जंगल-ज़मीन बचाने के लिए संघर्षशील हैं और उसी परंपरा में सोनी सोरी लगातार दमन झेलते हुए आदिवासियों के हक़ हुक़ूक़ की लड़ाई पद रही हैं। दिलीप मंडल जैसे कलम के सिपाही भी जिन्होंने पत्रकारिता की परिभाषा ही बदलकर रख दी।शीतल साठे अपने भीमगीतों से मनुव्यवस्था की नाक में दम करके रखे हुए हैं। मरे हुए जानवरों को ऊना में सरकार के दरवाजे पर पंहुचा कर प्रतिरोध का नया मॉडल स्थापित करने का सूत्रधार बने जिग्नेश मेवानी आज दलित प्रतिरोध का सबसे ताज़ा संस्करण हैं। 

 


डॉली कुमार ने नेशनल दस्तक की स्थापना करके बहुजनो के प्रतिरोध को प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया है। वहीं  डॉ रतनलाल देशभर में घूमघूम कर बहुजनो के बीच संघर्ष और आज़ादी की दूसरी लड़ाई (मनुवाद से) के लिए नयी ऊर्जा का संचार कर रहे हैं। 


डॉ पंवार कौशल सावित्री बाई फुले परंपरा जी संतान हैं जो दुनिया भर में अपनी बात रखने जा रही हैं। शीबा असलम फहमी लगातार दलित -मुसलमान अधिकार के लिए लिख रही  हैं, सड़कों पर उतर रही हैं। खुशबू अख्तर ने यह बताया है कि कम संशाधनों में भी कैसे मुख्यधारा की मीडिया को चैलेन्ज किया जा सकता है। पलपल न्यूज अपने शैशवकाल में ही सामाजिक न्याय को स्वर देने की कोशिश में  लग गया है। वहीं राजीव यादव, डॉ मुकेश कुमार और डॉ ओम सुधा आज के युवाओं का ईमानदार प्रतिनिधि बनकर उभरे हैं। ये युवा जानकारियों से लैस हैं, वाकपटु हैं, शानदार वक्ता हैं और देश, दुनिया और समाज की बेहतर समझ रखते हैं। 

 

आने वाले समय में ये हमारी उम्मीदों के प्रतीक हैं।

 

(लेखिका आंबेडकर फुले युवा मंच से जुडी हैं। ये उनके निजी विचार हैंं।)


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