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जेएनयू में लेफ्ट दलित-पिछड़े, अल्पसंख्यक छात्रों के हितों के खिलाफ खड़ा है

Created By : मुकेश कुमार Date : 2016-12-27 Time : 11:32:18 AM


जेएनयू में लेफ्ट दलित-पिछड़े, अल्पसंख्यक छात्रों के हितों के खिलाफ खड़ा है

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लेफ्ट के जनेऊवाद और दक्षिणपंथ के ब्रह्मणवाद के बीच का फर्क खत्म होता दिख रहा है। जिस जेएनयू में लेफ्ट के एक हिस्से ने कभी छात्रों के नामांकन आदि में आरक्षण रोस्टर लागू करने की लड़ाई लड़ी थी, वही लेफ्ट आज दलित-पिछड़े, अल्पसंख्यक छात्रों के हितों के खिलाफ खड़ा है।

 

पिछले दिनों अकादमिक काउंसिल की मीटिंग हॉल के बाहर लेफ्ट के लोग साक्षात्कार के अंक को घटाने की मांग कर रहे दलित-बहुजन छात्रों पर हमलावर हो गए। दलित-बहुजन छात्रों पर लेफ्ट के इस हमले ने उसके भीतर के जनेऊवाद की कलई खोल कर रख दी है। 


दरअसल दलित-वंचित वर्ग से आने वाले छात्रों का समूह लंबे समय से साक्षात्कार के नंबर को कम करने की आवाज उठाता रहा है। पिछले दिन राष्ट्रद्रोह-राष्ट्रवाद प्रकरण के दौरान जब जेएनयू के छात्रों- नेताओं ने अनशन प्रारम्भ किया था तो उस वक्त भी यह मांग शामिल थी, किन्तु उस वक्त भी लेफ्ट संगठनों की समझौतीपरस्ती और स्वार्थ खुलकर सामने आया था।


उस वक्त लेफ्ट संगठनों ने मांगों पर समझौते के वक्त इस मुद्दे को कोई अहमियत नहीं देते हुए, केवल मुकदमे और निष्काषन के मसले को ही अहमियत देते हुए समझौता कर लिया था। जबकि दलित-बहुजन तबके के छात्रों को इस एजेंडे के आधार पर भी गोलबंद किया गया था।


क्या है साक्षात्कार का पूरा मसला, इसे समझने की जरूरत है। दरअसल विश्वविद्यालयों में लिखित परीक्षा के साथ-साथ साक्षात्कार भी लिए जाते हैं। और लिखित और साक्षात्कार दोनों के अंक को जोड़कर परीक्षा परिणाम दिये जाते हैं। साक्षात्कार बोर्ड का सोशल कंपोज़ीशन साक्षात्कार को प्रभावित करता है, यह कोई नई बात नहीं है। दलित-वंचित-अल्पसंख्यक छात्र लिखित परीक्षा में तो नंबर ला लेते हैं, किन्तु साक्षात्कार में द्रोणाचार्यों के शिकार बन जाते हैं। 


साक्षात्कार में उनके साथ खुलेआम भेदभाव किये जाते हैं। यह सिलसिला केवल डिग्री तक ही सीमित नहीं रह जाता है। डिग्री के बाद नौकरियों हेतु होने वाले साक्षात्कारों में भी दलित-वंचित तबकों को शिकार बनाया जाता है। साक्षात्कार आधारित नौकरियों में अनारक्षित 50 फीसदी सीटों पर ज़्यादातर सवर्ण तबके के ही छात्र चयनित होते हैं, जिसमें साक्षात्कार की अहम भूमिका होती है। 

 

साक्षात्कार के आधार पर होने वाली नियुक्तियों के अनारक्षित पदों पर जारी बेकलॉग और एनएफएस- नोट फाउंड सूटेबल का खेल भी साक्षात्कार के जरिये ही खेला जाता है। कुल मिलाकर व्यवहार में यह साक्षात्कार ब्राह्मणवाद की रक्षा ही करता है और यह ब्रह्मणवादियों का हित साधने का ही मजबूत जरिया है। साक्षात्कार के दौरान द्रोणाचार्य छात्रों से पूरा हिसाब चुकता कर लेते हैं। अगर छात्र चाटुकार नहीं है और रीढ़ सीधी करके चलता है तो उसे भी साक्षात्कार में इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। 

 

ऐसे छात्रों को दंडित करने के लिए भी साक्षात्कार का बखूबी इस्तेमाल किया जाता है। जेएनयू के ही एक छात्र ने एक बार मुझसे कहा कि ‘अगर नियुक्ति के लिए आयोजित साक्षात्कार में साक्षात्कार बोर्ड को जिसको लेना होगा उससे उसके बाप का नाम पूछा जाएगा, जिसे वह आसानी से बता देगा। और अगर नहीं लेना है तो बोर्ड में शामिल लोग अपने बाप का नाम पूछ देंगे, जिसे छात्र बता ही नहीं पाएगा।’


कई बार तो साक्षात्कार बोर्ड में शामिल द्रोणाचार्य अपने चहेते छात्रों को साक्षात्कार से पूर्व ही साक्षात्कार में पूछे जाने वाले प्रश्नों के बारे में बता देते हैं। साक्षात्कार के वक्त वही सारे प्रश्न पूछे जाते हैं। और यह चहेता कौन होता है, भारतीय समाज में इसे बताने की आवश्यकता नहीं है। विश्वविद्यालयों में ज्यादातर शिक्षक अपने जाति-वर्ण के ही छात्रों को प्रमोट  करते हैं। उनकी जाति-वर्ण के ही ज़्यादातर छात्र उनके इर्द-गिर्द रहते हैं, घर तक उनकी आवाजाही बनी रहती है। 


इस पूरी प्रक्रिया में दोनों के बीच इतना गहरा रिश्ता बन जाता है कि शिक्षक के नाक-भौं, हाव-भाव देखकर ही ये छात्र गुरुजी की इच्छा-अनिच्छा समझने लगते हैं और बाकी छात्रों में हीनताबोध पैदा करते हैं। इस सबका कुल लाभ साक्षात्कार में ही तो दिया जाता है। गुरुजी साक्षात्कार के वक्त शिष्य ऋण से उऋण होते हैं और अपनी जाति-वर्ण के हितों का संरक्षण करते हैं। दलित-वंचित तबके के अभ्यर्थियों के प्रति पूर्वाग्रह और नफरत की ज़्यादातर अभिव्यक्ति साक्षात्कार में पूछे गये जटिल व बेतुके प्रश्नों के रूप में होती है। 


ढेर सारे साक्षात्कार, खासकर विश्वविद्यालयों में तो ऐसे होते हैं कि उसमें सबकुछ पूर्व से ही तय रहता है। किसको लेना है, किसको छांटना है, पूर्व निर्धारित रहता है। कुल मिलाकर भारतीय समाज में व्यवहार में साक्षात्कार योग्यता मापने का पैमाना नहीं रह जाता है और यह जाति-वर्ण-संप्रदाय के पूर्वाग्रहों से प्रेरित और दंडात्मक ज्यादा होता है। 
दस-पंद्रह मिनट के साक्षात्कार में न तो किसी की पूरी मेधा ही जांची जा सकती है और न ही उसकी क्षमता-मेधा का ही सही आकलन ही किया जा सकता है। उसमें भी तब तो और नहीं जब इंटरव्यू लेने वाला बोर्ड जाति-वर्ण-लिंग-संप्रदाय के पूर्वाग्रहों से मुक्त न हो। 


और भारतीय समाज की वर्तमान स्थिति में किसी ऐसे बोर्ड के पूर्वाग्रह मुक्त होने की बात बेमानी है। इसलिए यह जरूरी है कि साक्षात्कार के लिए इतने अंक न हों कि वह परीक्षा परिणाम को प्रभावित करने वाला अहम हिस्सा बन जाय। इसी बात की मांग जेएनयू में दलित-वंचित, बहुजन तबके से आने वाले छात्र कर रहे हैं कि साक्षात्कार के अंक को 30 से घटाकर 10 किया जाय ताकि साक्षात्कार में बरते जाने वाला भेदभाव परीक्षा परिणाम पर निर्णायक असर न डाल सके। 


ऐसे प्रगतिशील मांग के पक्ष में खड़ा होने के बजाय लेफ्ट छात्र संगठनों का विरोधी रवैया उसके भीतर के भगवाकरण को ही उजागर करता है। फिलहाल जेएनयू के दलित-वंचित-बहुजन छात्रों ने इस सवाल पर लड़ाई का मोर्चा खोल रखा है। छात्रों ने सोमवार को अकादमिक काउंसिल के दूसरे फेज की मीटिंग को बाधित कर दिया है और आज भी वे डटे हुए हैं। आज दो बजे उनकी ओर से जेएनयू प्रशासनिक भवन के बाहर प्रतिवाद-प्रदर्शन रखा गया है और विश्वविद्यालय कैंपस में सामाजिक न्याय की इस लड़ाई में सभी लोकतन्त्र पसंद व न्याय पसंद लोगों से भी शामिल होने की भी अपील की है।


लेखक मुकेश कुमार, सामाजिक चिन्तक और लेखक हैं, यह उनके निजी विचार हैं.


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