Switch to English

National Dastak

x

क्या बिहार में नए दलित नेतृत्व की छटपटाहट है

Created By : ओम सुधा Date : 2016-12-22 Time : 14:49:18 PM


क्या बिहार में नए दलित नेतृत्व की छटपटाहट है

चाहे भागलपुर में दलितों की पिटाई का मसला हो या फिर असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति में आरक्षण रोस्टर का पालन न करने का मामला हो। नितीश जी हर दिन दलित पिछड़ा विरोधी होने का नया मॉडल पेश कर रहे हैं। ये वही नितीश कुमार हैं जिन्होंने दलित नरसंहारों की ऐसी चार्जशीट तैयार करवाई की सभी आरोपी बाइज्जत बरी होते जा रहे हैं। 

 

नितीश कुमार ही वो शख्स हैं जिन्होंने भाजपा के साथ सरकार बनाते ही दलित नरसंहार की जांच करने वाले अमीरदास आयोग को भंग कर दिया। क्योंकि दलित नरसंहार में भाजपा नेताओं का नाम आया था। नितीश कुमार ने ही असंवैधानिक् तरीके से दलितों में फुट डालने के लिए दलितों का विभाजन दलित-महादलित में कर दिया। नितीश कुमार के नाम सवर्ण आयोग गठित करने का रिकार्ड भी दर्ज है। 


अपने लगातार तीसरे कार्यकाल में भी नितीश कुमार दलितों को जमीन उपलब्ध कराने में नाकाम रहे और भगलपुर में भूमिहीन दलितों की बर्बरतम पिटाई तो पूरे देश ने देखा। दलित विद्यार्थियों की छात्रवृति बंद करने का रिकार्ड भी नितीश कुमार के नाम है।


बिहार चुनाव के पहले अपनी हर सभा में नीतीश कुमार उछल उछल कर जाती जनगणना प्रकाशित कराने की मांग करते रहे। पर, सत्ता में आते ही एक बार भी इस मसले पर बयान तक नही दिया। स्थापित सामाजिक न्याय की बात करनेवालों को बिहार के दलित पिछड़े भुगत रहे हैं। हर दिन दलित उत्पीड़न के नए नए मामले बिहार में सामान्य हैं। ईमानदार नेतृत्व खाली खाली सा लगने लगा है।


तो क्या यह समझ लिया जाना चाहिए की बिहार की जनता सामाजिक् न्याय के इन फ़र्ज़ी रहनुमाओं से आजिज आ चुकी है ? बिहार में दलित नेतृत्व भी एक निर्वात के दौर से गुजर रहा है। रामविलास पासवान जैसे नेता आज आरक्षण विरोधी भाजपा के साथ गलबहियां कर रहे हैं।


नए लोग पूरी ईमानदारी से छोटे छोटे शहरो कस्बों में दलित उत्पीड़न के खिलाफ संघ और सरकार दोनों से लोहा ले रहे हैं। लाठियां खा रहे हैं पर संघर्ष कर रहे हैं। इंक़लाब कर रहे हैं। मुक़दमे झेल रहे हैं। गिरफ्तारी दे रहे हैं। जनता भी पतित राजनीति से आजिज हो चुकी है। नए युवा जोश से लबरेज हैं, मेनस्ट्रीम मिडिया की परवाह ना करते हुए सोशल साइट को अपना औजार बना लिया है। 


ये किताबे पढ़ते हैं, बहस करते हैं, तार्किक हैं, ज्यादा वैज्ञानिक चिंतन से लैस हैं , ये समाजवाद भी समझते हैं और पूंजीवाद भी। ये सीरिया पर बहस कर सकते हैं तो बिहार के किसी दलित बस्ती में स्कुल अस्पताल का न।होने भी इनके।लिए सवाल है। ये गांधी और मॉर्क्स से भी उतने ही परिचित हैं जितने आंबेडकर से। लड़ने भिड़ने को आतुर हैं। 


ये सिर्फ दलाल नेतृत्व को बेनकाब ही नहीं करते बल्कि नए विकल्प के साथ तैयार हैं। जिनके आँखों में बिहार को बदलने का सपना है और नया बिहार बदलने का रोडमैप भी इनके पास हैं। ये हर जिले हर कसबे में पाए जाते हैं। अपने आसपास नज़रे घुमाकर देखिये।


लेखक डॉ. ओम सुधा अम्बेडकर फुले युवा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, यह लेखक के निजी विचार हैं.
 


खबरों की अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक, ट्विटर और Youtube पर फॉलो करें---




Latest News

दिल्ली यूनिवर्सिटी में एबीवीपी की सरेआम गुंडागर्दी

20 साल बाद कोर्ट को पता चला फर्जी था भोजपुर एनकाउंटर

गर्व से कहो, हम गधे हैं!

मुझे प्रधानमंत्री का कुत्ता कहा गया- तारिक फतेह

उमा भारती के गढ़ में सबसे मजबूत नजर आ रही BSP!

झारखंडवासियों को शराब पिला कर लूटना चाहती सरकारः हेमंत सोरेन

भाजपा ने विधायक ने मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा

मोदी के श्मशान वाले बयान की मायावती ने खोली पोल

आर्थिक तंगी और कर्ज ना उतार पाने के कारण किसानों ने की आत्महत्या

सपा को समर्थन करने पर नीतीश ने जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष को निकाला

पांच सालों में मायावती ने कराए खूब काम, मीडिया को दिखीं सिर्फ मूर्तियां

प्ले स्कूल में 3 साल की छात्रा के साथ रेप