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यमुना को नुकसान पहुंचाने का न्यायिक संस्था का आरोप रविशंकर के लिए मजाक है

Created By : नेशनल दस्तक ब्यूरो Date : 2017-04-21 Time : 13:07:56 PM


यमुना को नुकसान पहुंचाने का न्यायिक संस्था का आरोप रविशंकर के लिए मजाक है

नई दिल्ली। रविशंकर ने यमुना किनारे के अपने आयोजन के लिए माफी मांगने की जगह इन आरोपों को झुठलाने की कोशिश की है। फेसबुक पर अपनी सफाई में उन्होंने लिखा है कि उनके आयोजन से यमुना को कोई नुकसान नहीं हुआ है। 


उनके हिसाब से "आर्ट ऑफ लिविंग को गैर-जिम्मेदार कहने वाले लोग हमारे बारे में कुछ नहीं जानते या फिर वे मजाकिया प्रवृत्ति के लोग हैं।" उनके मुताबिक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आर्ट ऑफ लिविंग को फटकार नहीं लगाई है, बल्कि अपनी ही कमेटी की आलोचना की है, क्योंकि उसने बार बार अपना स्टैंड बदला है।


रविशंकर यह तेवर शायद इसलिए दिखा पा रहे हैं क्योंकि वर्तमान केंद्र सरकार में उनका काफी असर है। यमुना तट के आयोजन में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उपस्थित हुए थे। इस आयोजन की तैयारी के लिए सेना के जवानों को लगा दिया गया था। रविशंकर ने 2014 के लोकसभा चुनाव और उससे पहले भी लगातार बीजेपी के लिए प्रचार किया है। इस रसूख को वे अपने पक्ष में भुना रहे हैं। 

 


आर्ट ऑफ लिविंग का यमुना तट का आयोजन गंभीर विवादों में है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने उस पर आपत्तियां जताई थीं और हाल ही में उसने रविशंकर को फटकार लगाई है।


आपको बता दें कि देश की सबसे बड़ी पर्यावरण अदालत ने रविशंकर के खिलाफ नाराज़गी जताते हुए पूछा है कि 'क्या आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। आपको लगता है कि आप जो मन में आया बोल सकते हैं?'

 


गौरतलब है कि बुधवार को रविशंकर ने पिछले साल यमुना नदी के किनारे हुए तीन दिन के सम्मेलन के आयोजन के लिए सरकार और अदालत को जिम्मेदार ठहाराया था। उन्होंने कहा था कि यह तो सरकार और अदालत की गलती है कि उन्होंने इस कार्यक्रम की अनुमति दी। अदालत की फटाकर पर रविशंकर के प्रवक्ता ने कहा है कि- वह इससे सहमत नहीं हैं। प्रवक्ता ने कहा कि अदालत का असल आंकलन अंतिम आदेश में सामने आएगा। अगली सुनवाई सात मई को होगी।

 

दरअसल विशेषज्ञों की टीम ने एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के सामने इस बात की गवाही दी है कि कई सौ एकड़ में आयोजित किए गए इस कार्यक्रम की वजह से नदी का ताल पूरी तरह बर्बाद हो गया है। साक्ष्य में कहा गया कि इस नुकसान की भरपाई कम से कम 10 साल में हो पाएगी और इसमें करीब 42 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

 

संपादन- भवेंद्र प्रकाश

 


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