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यह द्रोणाचार्य नहीं, तर्क और शिक्षा से लैस एकलव्य का दौर है

Created By : डॉ ओम सुधा Date : 2017-01-05 Time : 13:35:02 PM


यह द्रोणाचार्य नहीं, तर्क और शिक्षा से लैस एकलव्य का दौर है

यह शानदार दौर है। सदियों से आजतक शोषण उत्पीडन में लिप्त जातियां, जो अबतक दूसरों की हकमारी करते रहे, अब उनका कलेजा फटने लगा है। ऐसा तो होना ही था सदियों से सामाजिक सत्ता पर काबिज लोगों से अब उनकी सत्ता छीनी जाने लगी है। द्रोणाचार्यों को अब एकलव्य ने अंगूठा देने से मना कर दिया है। यह शानदार दौर है, हीरा और कोयले का भेद अब मिटने लगा है। ब्राह्मणवादी व्यवस्था से सताये हुए शुद्रों, बहुजनों, स्त्रियों ने ताड़न का अधिकारी बनने से मना कर दिया है। यह उम्मीदों का दौर है। जाहिर है यह सकारात्मक वक़्त है। सामाजिक न्याय ज़िंदाबाद के शोर ने अब सवर्ण-सामंती ताकतों के कान का पर्दा फाड़ना शुरू कर दिया है। 


जो लोग यह कहते रहे थे की सामाजिक न्याय की लड़ाई केवल आरक्षण तक सिमट कर रह गयी है, उनकी जुबानो पर ताला लग गया है। सामाजिक न्याय की स्थापना को प्रतिबद्ध कार्यकर्त्ता अब घर घर में तैयार होने लगे हैं। सामाजिक न्याय की लड़ाई मुख्यधारा की मोहताज भी नहीं रही। रोहित वेमुला की सांस्थानिक ह्त्या से शुरू हुयी इस लड़ाई का गहराई से अध्ययन करेंगे तो यह रोचक तत्व सामने आएगा की कैसे सामाजिक न्याय की लड़ाई ने में स्ट्रीम की मिडिया को मुह चिढाते हुए सोशल मिडिया को समानांतर मिडिया के रूप में स्थापित किया। यह लड़ाई ऊना से गुजरते हुए, अख़लाक़ की हत्या से गुजरते हुए, भागलपुर के सफाई कर्मियों के आंदोलन, झारखंड, छत्तीसगढ़ के आदिवासी और भागलपुर में दलित महिलाओं की बेरहमी से पिटाई तक किसी मुख्यधारा की मिडिया का मोहताज नहीं रहा है। इसका ताज़ा उदाहरण जेएनयू की नज़ीब के गायब होने और इंटरव्यू में वायवा का वेटेज कम करने के संघर्ष में देखा जा सकता है। मुख्यधारा की मिडिया के लिए यह जरुरी सवाल नहीं है पर सोशल मिडिया ने ना केवल इस आंदोलन को हवा दी बल्कि इसके समर्थन में देशभर में प्रदर्शन किया जाने लगा और लड़ाई मुकम्मल रूप धारण करने लगी है।


सामाजिक न्याय की इस लड़ाई का सबसे ख़ास पहलू यह है कि इसका नेतृत्व अब युवाओं के हाथ में है। बहुत रोचक है ये सब की जेएनयू के सवाल पर भागलपुर में डॉ मुकेश कुमार, अंजनी, रिंकू जैसे युवा जेएनयू में बहुजनों के समर्थन में कुलपति का पुतला जला सकते हैं। वहीं भागलपुर में दलित महिलाओं की पिटाई के सवाल पर दिल्ली के भागलपुर में सिविल परीक्षा की तैयारी कर रहे संजीव बिहार भवन पर प्रतिरोध करने पहुच जाते हैं तो बिहार के छोटे से गांव भगतचौकी में रह रहे हिमांशु अपने सैकड़ों साथियों के साथ रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के खिलाफ जुलुस निकालते हैं। 


यह बहुत अप्रत्याशित नहीं है। यह होना ही था, सदियों से शोषित-उत्पीड़ित लोगों के हाथों में जब कलम आयी तो वो अम्बेडकरी-फुले परम्परा की मशाल लेकर आगे बढ़ चले। इसका एक और दिलचस्प पहलु ये है कि देशभर में सामाजिक न्याय की इस लड़ाई की अगुवाई करने वाले युवा प्रखर वक्ता हैं, ज्ञान-विज्ञान और तर्कों से लैस ये युवा तकनीक का प्रयोग करने में माहिर हैं। 


सामाजिक न्याय के संघर्ष के दृष्टि से इस दौर को ही स्वर्णकाल कहा जाना चाहिए। अब लड़ाई सिर्फ आरक्षण तक सिमटी हुई नहीं है। हर क्षेत्र में न्यायपूर्ण भागीदारी, संशाधनो का सामान बटवारा, महिलाओं-अल्पसंख्यकों के लिए सामान अवसर, बंधुत्व की स्थापना, बेहतर राष्ट्र के निर्माण को कृतसंकल्पित यह लड़ाई जाति और धर्म को सिरे से मिटाने के लिए तत्पर दिखती है।


यह द्रोणाचार्य का नही एकलव्य का दौर है। देखिये कि कैसे मुख्यधारा की मिडिया  ज्योतिबा फुले, पेरियार, सावित्री बाई फुले और झलकारी देवी जैसे नायकों से मुंह चुराती रही पर अब असली नायक धूल झाड़कर इतिहास से बाहर निकल रहे हैं, स्थापित हो रहे हैं।


दलित चिंतक दिलीप मंडल  के शब्दों में - 
पिछले 67  साल में तमाम सीमाओं के बावजूद भारतीय संवैधानिक लोकतंत्र ने उन तबकों का एक विशाल और शिक्षित मध्ववर्ग दिया है, जिसकी पहले कल्पना तक नहीं हो सकती थी। जिसे आप सड़ा-गला लोकतंत्र और जिस राजनीति को आप गंदा नाला समझ रहे हैं, उसकी सामाजिक उपलब्धियां विश्व की किसी भी क्रांति से कमतर नहीं है। दुनिया की किसी  और क्रांति ने इतने लोगों की जिंदगी को सकारात्मक तरीके से नहीं बदला है

 

{लेखक आंबेडकर फुले युवा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।}


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