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इस मदरसे में तैयार होती हैं महिला मुफ्ती

Created By : नेशनल दस्तक ब्यूरो Date : 2017-01-09 Time : 15:49:32 PM


इस मदरसे में तैयार होती हैं महिला मुफ्ती

हैदराबाद। मोगलपुरा इलाके का मदरसा जमायतुल मोमिनाथ शहर का पहला और अकेला ऐसा मदरसा है जहां महिलाओं को मुफ्ती बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां छात्राओं को इस्लाम के जुड़ी किताबें, हादिस, कुरान की व्याख्याएं और फतवे पढ़ाए जाते हैं।


फतवा मुस्लिम समाज में एक राय की तरह है। यह अलग-अलग विषयों और मुद्दों से जुड़ा हो सकता है। इनमें शादी, माहवारी, तलाक, बच्चा गोद लेना, संपत्ति विवाद और नमाज व रोजा रखने जैसी चीजों से जुड़ा हो सकता है। देश में अनगिनत मदरसे हैं। कई जगहों पर मुफ्ती बनने की ट्रेनिंग दी जाती है, लेकिन वे सभी केवल पुरुषों के लिए हैं। वहां महिलाओं की कोई जगह नहीं है।

 

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NBT की रिपोर्ट के अनुसार, जमायतुल मोमिनाथ मदरसे की नींव रखने वाले हाफिज मस्तान अली ने बताया, 'कई सवाल ऐसे होते हैं, जिन्हें मुफ्ती से पूछने में महिलाएं संकोच करती हैं। हमें लगा कि महिलाओं को महिला मुफ्तियों के साथ बात करने में ज्यादा सहजता महसूस होगी। इसीलिए हमने यहां 12 साल पहले एक साल का यह पाठ्यक्रम शुरू किया था।' इस मदरसे की शुरुआत साल 1991 में हुई थी। आज की तारीख में यहां करीब 2,500 मुस्लिम छात्राएं पढ़ती हैं। इनमें से करीब 400 छात्राएं यहां छात्रावास में रहकर पढ़ती हैं। जब यह मुफ्तिया पाठ्यक्रम शुरू हुआ, तब केवल 5 छात्राएं इसमें थीं। इस साल 15 छात्राएं मुफ्तियां बनने का प्रशिक्षण ले रही हैं। इतने सालों में मदरसे ने 318 महिला मुफ्तियों को तैयार किया है। फतवा विभाग की प्रमुख नाजिमा अजीज के मुताबिक, लड़कियों और महिलाओं को मुफ्ती बनाना असल में उनका सशक्तिकरण करना है। उन्होंने कहा, 'जब एक अलिमा (महिला स्नातक) फाजिला (MA) की पढ़ाई पूरी कर लेती है, तो वह फतवा कोर्स कर सकती है।'

 

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नाजिमा ने बताया कि यह पाठ्यक्रम 5 हिस्सों में बंटा हुआ है- प्रार्थना, महिलाओं के निजी मुद्दे, सीमाएं (महिलाएं क्या कर सकती हैं और क्या नहीं), संपत्ति विवाद और वर्तमान मुद्दे। नाजिमा ने कहा, 'कुरान में कही गई बातों और पैगंबर की परंपरा के मुताबिक ही फतवा जारी किया जाता है। किसी विवाद पर फैसला सुनाते समय मुफ्ती इस बात का ध्यान रखते हैं कि पक्षपात ना हो। अगर कोई उनके फैसले से संतुष्ट नहीं होता, तो वह किसी और मुफ्ती या मुफ्तिया से संपर्क कर सकता है।' सुरैया शकील खान भी इसी मदरसे से मुफ्तिया बनने का प्रशिक्षण ले रही हैं। वह कहती हैं कि मुफ्तिया बनकर वह महिलाओं की मदद करना चाहती हैं। उन्होंने कहा, 'मैं मजहब से जुड़ी बातों में लोगों को रास्ता दिखा सकती हूं।' एक अन्य छात्रा खादिजा फातिमा को लगता है कि मुफ्तिया बनने के बाद समाज में उन्हें सम्मान और प्रतिष्ठा मिलेगी। ज्यादातर छात्राओं का मानना है कि देशभर में महिलाओं के लिए दारूर इफ्ता शुरू होने चाहिए।

 


दिलचस्प यह है कि ना केवल नाजिमा, बल्कि मदरसे की छात्राएं भी तीन तलाक के मुद्दे पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ हैं। मदरसे का एक फतवा विभाग पुरुषों के लिए भी है, जहां पुरुषों को मुफ्ती बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके प्रमुख मुहम्मद हसनुद्दीन कहते हैं, 'पहली नजर में तो तलाक को हतोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन इसे प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है। ऐसा करना शरीया कानूनों के साथ छेड़छाड़ और उनका उल्लंघन करना है।' उन्होंने कहा, 'हमें नहीं लगता कि तीन तलाक महिलाओं के सिर पर लटकती तलवार की तरह है। एक मुश्किल और बुरी शादी को खत्म करने का यह एक तरीका है और इसे आखिरी उपाय की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए।'

 

 

 


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