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मनु मानवता के माथे का कलंक है, इसलिये उसे मिटाना होगा

Created By : भंवर मेघवंशी Date : 2017-01-02 Time : 10:43:35 AM


मनु मानवता के माथे का कलंक है, इसलिये उसे मिटाना होगा

तकरीबन छब्बीस साल पहले न्याय के मंदिर कहे जाने हाईकोर्ट परिसर में राजस्थान उच्च न्यायालय न्यायिक सेवा संगठन और लॉयन्स क्लब जयपुर केपिटल के सहयोग से मानवता के माथे पर इस कलंक को स्थापित किया गया. हाईकोर्ट के बिल्डिंग प्लान में विषमता की विषाक्त व्यवस्था के जनक मनु की मूर्ति लगाने का कोई प्रस्ताव नहीं था.


पर प्लान में मनु हो या ना हो भारतीय सनातनी समाज के मनों में मनु बहुत गहरे विद्यमान रहा है, इसलिये जाति और वर्ण की ऊँच नीच भरी व्यवस्था को शास्त्रोक्त बनाने वाला मनु कभी महर्षि कहा जाता है तो कभी भगवान मनु के रूप में प्रतिष्ठा पाता है.


पूरे देश में राजस्थान ही वो एकमात्र बदनसीब सूबा है जिसके हिस्से में मनु आया है. संभवत: मनुवादी यहां सदैव मजबूत स्थिति में रहे हैं, इसलिये वे मनुस्मृति के रचनाकार को हाईकोर्ट परिसर के भीतर स्थापित करने में सफल रहे हैं तथा संविधान के रचयिता बाबा साहब डॉ अम्बेडकर को बाहर चौराहे पर धकेलने में कामयाब हुए.


उस वक्त के अम्बेडकरवादी तथा प्रगतिशील मानवतावादी लोगों व संगठनों का शत शत अभिनंदन कि उन्होंने मनु की मूर्ति के अनावरण के कार्ड छपकर वितरित हो जाने के बावजूद भी 28 जून 1989 को तत्कालीन कार्यवाहक चीफ जस्टिस मिलापचंद जैन के हाथों होने वाले अनावरण समारोह को नहीं होने दिया. कुछ उत्साही भीम सैनिक तो रात के वक्त छैनी हथौडे़ भी लेकर पहुंच गये, मगर वे कामयाब नहीं हो सके. उन सबको बारम्बार वंदन, अभिनंदन.


जब जयपुर हाईकोर्ट में लगाई गई मनु मूर्ति का विरोध बढ़ा तो ना केवल अनावरण रूका बल्कि राजस्थान उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने प्रशासनिक मींटिंग कर प्रस्ताव पारित किया कि -" मनु के प्रति कोई अनादर भाव रखे बिना परन्तु इस मामले के विवाद को देखते हुये यह प्रस्तावित किया जाता है कि मूर्ति को राजस्थान उच्च न्यायालय परिसर से हटा लिया जाये"


अपने इस प्रस्ताव की पालना के लिये हाईकोर्ट की फुलबैंच ने राजस्थान हाईकोर्ट न्यायिक सेवा संगठन तथा लॉयन्स क्लब के अनुरोध किया कि वे मूर्ति को हटा लें.


वे हटाते इससे पहले ही विश्व हिन्दु परिषद के केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल के सदस्य आचार्य धर्मेंन्द्र जी अपने पुरखे संघ प्रिय मनु को बचाने हेतु मामले में कूद पड़े. आर्य समाजी सामवेदी जी भी आ गये तथा अपनी लाश पर मूर्ति हटने की उदघोषणा करने लगे. मिलीभगत की बेहतरीम मिसाल यह है कि जिस दिन में स्टे हेतु याचिका लगी और दूसरे ही दिन कोर्ट से स्टे भी मिल गया. 


तब से मनु की मूरत बिना लोकार्पित हुये खड़ी है. बरस दर बरस,तारीख दर तारीख, सुनवाई, बहस, जिरह, पेशी पर पेशी.. इस तरह तकरीबन तीन दशक होने के आये. वादी, परिवादी, फरियादी और विवादी में से कई चल बसे, एकाध जो बच गये, वे भी चला चली का मेला है. 


कई आन्दोलन हुये. अम्बेडकर मंच से लेकर मान्यवर काशी राम जी तक और महिला संगठनों व दलित संगठनों से लेकर सुप्रसिद्ध श्रमिक नेता बाबा आढ़ाव तक कई लोगों, समूहों, संस्थाओं और संगठनों ने मनु की प्रतिमा को हटाने के लिये आन्दोलन किये, मगर पूरी बेशर्मी से मनु खड़ा रहा. टस से मस भी नहीं हुआ.


तमाम मनुवादी तत्व मनु के पक्ष में खुलकर खड़े थे, आज भी है और आईन्दा भी खड़े रहने को लालायित है. कोर्ट तक ने मामले को कोल्ड स्टोरेज में डाल दिया है, पिछली सुनवाई गुजिश्ता साल 13 अक्टूबर को हुई. राजस्थान हाई कोर्ट का नजारा देखने लायक था. बार तक जाति के आधार पर विभाजित नजर आया. मनु के समर्थक वकीलों ने मनु प्रतिमा के विरोधी पक्ष के अधिवक्ताओं को बोलने तक नहीं दिया गया. 


सैकड़ों की तादाद मे विद्वान वकील साहबान उँच नीच की विषम व्यवस्था के स्मृतिकार के पक्ष में खुलकर खड़े हो गये. ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट ने मामले की बहस को टाल दिया और कहा कि मामला भारत सरकार को गृह विभाग के सचिव के माध्यम से पूरा मामला भेजा जाये. मतलब यह कि गृह सचिव के जरिये राज्य सरकार एक पक्ष बने और उस आधार पर नोटिस जारी करे ताकि जल्दी से जल्दी जवाब आ सके.


इसके बाद राज्य सरकार की तरफ से कुछ भी कदम नहीं उठाया गया और कोर्ट में भी मामला सुनवाई के लिये नहीं आया. मतलब कि मामला फिर से ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया. यह प्रक्रिया अनंत काल तक दोहराई जायेगी ताकि मनु सदैव हमारी छाती पर खड़ा रहे और चिढ़ाता रहे कि - " हे शूद्रों, हे स्त्रियों मैं मनु जिसने तुम्हें दास बनाया, तुम्हारी गुलामी की शास्त्रीय आधार दिया, तुम्हे जानवर से भी बदतर दर्जा दिया और वो जिन्होंने मेरे नियमों को नहीं माना उन्हें दास के साथ साथ अछूत भी बनाया, मैं वो ही मनु तुम्हारे आजाद देश में भी तुम्हारे सिर पर सवार हूं.


जिस व्यक्ति ने मेरी लिखी पुस्तक मनुस्मृति को एक दिन जलाया, मैं आज तक हर दिन उसके लिखे संविधान का मखौल उड़ा रहा हूं "


इस रोज रोज चिढ़ाते मनु का हम कुछ नहीं कर पा रहे है, क्योंकि मनुवाद फिर से बेहद प्रबल रूप में पुनर्स्थापित हो रहा है. दलित बहुजन मूलनिवासी तथा समानता के समर्थक प्रगतिशील आन्दोलन मनु के प्रति क्षमादान के उदारभाव से भर गये है, उन्हें मनु, मनुस्मृति, मनु मूर्ति और मनुवाद से अब कोई तकलीफ नहीं बची है, अब वे वार त्यौहार बतौरे रस्म जय भीम तथा जय जय भीम चिल्लाते है. 


मोटी तनख्वाह, तगड़ा फण्ड या बड़ा पद पाते है. उनके लिये अम्बेडकर का दर्शन महज प्रदर्शन भर की विषय वस्तु है. अब वे इतने निर्मम अम्बेडकरवादी हो चुके है कि यथार्थ के नाम पर बाबा साहब को भी बेचकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेने में नहीं चूकते है. यह अपराध किया गया है और किया जा रहा है.


अगर मनुस्मृति के दहनकर्ता बाबा साहब का दर्शन समझ नहीं पड़ रहा है तो हम एक बार फिर हम डॉ अम्बेडकर को पढ़ें,जानें कि वे क्यों मनु के इतने विरोधी थे, क्यो उन्होनें मनु की विषैली स्मृति को आग के हवाले किया और क्यों हमें मनुवाद के खिलाफ पुन: एक निर्णायक जंग छेड़नी चाहिये.


जिन्हे मनु से हमदर्दी है, उन पर हमारा जोर नहीं है. जो मनु के समर्थक है, उनको हमारा कुछ भी कहना नहीं है. जो साक्षात मनुवादी है,उनकी मुखालफत करते हुये हम बुद्ध, कबीर, फुले, पेरियार, रविदास तथा बाबा भीम के वंशजों से कहना है कि मानवता के माथे पर कलंक की भांति खड़ी इस मनु प्रतिमा को हटाने के आन्दोलन का हिस्सा बनिये.


यह सिर्फ एक निर्जीव मूर्ति को हटाने का अभियान नहीं है,यह मनुवाद को मिटाने और ब्राह्मणवाद के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने का महाभियान है.इससे जुड़िये और इसको सफल कीजिये.


3 जनवरी 2017 को जयपुर से मनुवाद विरोधी अभियान की शुरूआत हो रही है. इस ऐतिहासिक पल के साक्षी होने से चूकिये मत. हम इंतजार में है, आना मत भूलिये.


लेखक- भंवर मेघवंशी स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं, यह लेखक के निजी विचार हैं.
 


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