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ड्रामेबाजी से मुद्दे को हवा करने वाले संगठन से प्रशिक्षित हैं मोदीजी

Created By : महेंद्र मिश्रा Date : 2016-12-24 Time : 12:06:33 PM


ड्रामेबाजी से मुद्दे को हवा करने वाले संगठन से प्रशिक्षित हैं मोदीजी

मुद्दे को बदलना कोई मोदी जी से सीखे। दरअसल उनकी राजनीतिक पैदाइश और प्रशिक्षण ही ऐसे संगठन में हुई है जिसने जीवन भर यही खेल खेला है। और वो इस काम को अग्रेजों के जमाने से कर रहा है। 1857 की लड़ाई में जब अंग्रेजों को लगा कि हिंदू-मुस्लिम एकता बनी रही तो भारत में उनके लिए एक दिन भी शासन करना मुश्किल हो जाएगा। तब उन्होंने दंगे का एक नायाब हथियार खोज निकाला। जिसके जरिये जनता को आपस में बांटकर सालों-साल तक राज किया जा सकता था। बाद के दौर में आरएसएस और मुस्लिम लीग उसके दाएं और बाएं हाथ बने। 


आजादी के बाद से संघ यही काम जनता को उसके बुनियादी सवालों से काटने के लिए करता रहा। एक बार फिर मोदी जी जब सहारा घूसकांड पर चौतरफा घिरते नजर आ रहे हैं तो उन्होंने फिर अपने उसी पुराने फार्मुले का सहारा लिया है। प्रधानमंत्री जी तो अब इस खेल के माहिर खिलाड़ी हो गए हैं। कभी रोते हैं तो कभी सीना ठोंकते हैं और फिर कभी मिमिक्री करने लगते हैं। एक बार फिर उन्होंने अपने उसी गुरुमंत्र का पासा फेंका है। बीएचयू के कार्यक्रम में बजाय मुद्दे का सीधे जवाब देने के उन्होंने राहुल और मनमोहन सिंह की मिमिक्री कर पूरे मामले को हवा में उड़ा देने की कोशिश की। बहस के केंद्र में भी अब सहारा और बिड़ला का घूस नहीं बल्कि मोदी जी की मिमिक्री है।


मोदी जी कि इन सारी हरकतों के पीछे संवेदना और तत्व कम राजनीतिक साजिश और चाल ज्यादा होती है। उनका कोई भी कार्य एक रोबोटी जरूरत है। नोटबंदी पर गोवा में वो रोये थे। क्योंकि उन्हें इसके खतरनाक नतीजों का एहसास हो गया था। लिहाजा उसके लिए एक बड़े नाटकीय प्रदर्शन की जरूरत थी। लेकिन अब जब एक दूसरा संकट उनके सामने आया है। जो किसी भी रूप में उनके निजी राजनीतिक जीवन में भूचाल से कम नहीं है। उससे बचने का न तो कोई रास्ता दिख रहा है और न ही उसका सामना करने का साहस। कहा तो यहां तक जा रहा है कि सहारा और बिड़ला घूसकांड पर बहस को टालने के लिए ही उन्होंने नोटबंदी का एजेंडा फेंका था। 


इस बीच संसद भी नहीं चलने दी और न ही उसमें बैठने और विपक्ष का सामना करने का साहस दिखा सके। क्योंकि उन्हें आशंका थी कि नोटबंदी के साथ ही संसद में उनका ये मुद्दा भी उठ सकता है। लेकिन सहारा का भूत है कि पीछा ही नहीं छोड़ रहा है। अब जब केजरीवाल के बाद राहुल गांधी समेत दूसरे विपक्षी नेताओं ने भी उसे उठाना शुरू कर दिया है। तब उनके सामने उसे टालने का कोई दूसरा जरिया भी नहीं दिख रहा है। साथ ही नोटबंदी के खिलाफ गुस्से ने भौतिक तौर पर विपक्ष के लिए एक जमीन तैयार कर दी है। जिसे खारिज कर पाना मोदीजी के लिए बहुत मुश्किल हो रहा है। 


इस पूरी परिस्थिति से निकलने के लिए उन्होंने दो तरीके अपनाए हैं। एक अपने मन का विपक्ष खड़ा करना और दूसरे मुद्दे पर बात करने की जगह उसको हवा में उड़ा देना। शर्त यही है कि चुना गया विपक्ष कमजोर हो। इस मामले में कांग्रेस और राहुल से बेहतर कोई दूसरा नहीं हो सकता था। मोदी और कांग्रेस के बीच किसी अघोषित समझौते का नतीजा कहिए या फिर कांग्रेस की सोची समझी रणनीति राहुल गांधी सामने आ गए हैं। दरअसल मोदी जी के लिए दोनों बहुत शूट करते हैं। क्योंकि नेता के तौर पर राहुल कमजोर हैं और कांग्रेस की अपनी गल्तियां उसे कहीं खड़ा होने लायक नहीं छोड़ती हैं। ऐसे में मोदी जी के लिए अपनी कमीज सफेद बताना बड़ा आसान हो जाता है। धोबीपाट पर कांग्रेस को धुलने के लिए उनके पास मुद्दे के डिटर्जेंटों की कमी नहीं है। लेकिन मोदी जी को जरूर इस बात को समझना होगा कि कहीं वो इसके जरिये भष्मासुर तो नहीं पैदा कर रहे हैं।


कुछ हो या न हो मोदी जी ने भारतीय राजनीति को पतन के पाताल में पहुंचाने का पूरा इंतजाम कर दिया है। लोकतंत्र में विपक्ष की एक हैसियत होती है। वो सत्ता पक्ष के अगर बराबर नहीं होता तो उससे कम भी नहीं होता है। ऐसे में उसके किसी नेता के साथ मसखरापन कम से कम एक प्रधानमंत्री के लिए शोभा नहीं देता है। यह सब कुछ एक उच्च शिक्षण संस्था में हो ये उससे भी ज्यादा गलत है। लेकिन मोदी जी के इस जमूरेपन से नुकसान राहुल को नहीं बल्कि जगहंसाई उनकी हुई है। 


वैसे तो मोदी जी की नेहरू के साथ कोई तुलना ही नहीं है। उसे करना भी नेहरू की शख्सियत के साथ नाइंसाफी होगी। लेकिन मोदी जी अगर उनसे रत्ती भर राजनीतिक व्यवहार सीखने की कोशिश करेंगे तो वो उनके बहुत काम का होगा। नेहरू के लिए लोकतंत्र कोई शासन का हथियार नहीं था। बल्कि देश की आत्मा और जिंदगी थी। जिसको उन्हें पाल पोस कर बड़ा करना था। उस समय विपक्ष भले ही पैदा हो गया था लेकिन उसे अंगुली पकड़कर चलाने का काम उन्होंने ही किया। 


युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी की उनकी तारीफ से पूरा देश वाकिफ है। धुर विरोधी लोहिया उनकी आलोचना का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। बावजूद इसके संसद में जब बोलने का मौका आता था तो सबसे ज्यादा समय उनको दिलवाते थे। यह अनायास नहीं है कि आपने खुद को नेहरू के खिलाफ खड़ा कर लिया है। और यह लोकतंत्र के विपरीत एक दूसरे छोर की वकालत करता दिख रहा है। जो बेहद खतरनाक है। बहरहाल इंसान अपनी फितरत का गुलाम होता है। लेकिन सच यही है कि दूसरे का मजाक उड़ाने वाला आखिर में खुद विदूषक बन जाता है।

 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

 


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