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नीतीश की तरह मुलायम भी अब आरएसएस के लिए 'अपने आदमी' हैं...!

Created By : नेशनल दस्तक ब्यूरो Date : 2016-12-31 Time : 13:26:17 PM


नीतीश की तरह मुलायम भी अब आरएसएस के लिए 'अपने आदमी' हैं...!

नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी में नॉनस्टॉप ड्रामा जारी है। अखिलेश यादव की इमेज चमकाने के खुलासे के बाद अब शिवपाल यादव का नाम समाजवादी पार्टी की ऑफिशियल वेबसाइट से हटा दिया गया है। इस मामले पर सोशल मीडिया पर तमाम तरह के रिएक्शन देखने को मिल रहे हैं। 


स्वतंत्र पत्रकार महेंद्र मिश्रा ने लिखा है.....
सपा मुखिया मुलायम सिंह की हार में भी उनकी जीत है । पुत्र को स्थापित करने के लिए पिता के धृतराष्ट्र बनने की कहानियां आम हैं । लेकिन यहां तो पुत्र से दुश्मनी पिता का सपना पूरा होने की कसौटी बन गई है । दरअसल राजनीति में परिस्थितियों और मौकों का बड़ा महत्व होता है । सपा आज जहां खड़ी है अखिलेश उसके स्वाभाविक नेता बन गए हैं । मुलायम के कुदरती और राजनीतिक वारिस भी वही हैं । उनको बढ़ाने और स्थापित करने में मुलायम का ही हाथ रहा है । लेकिन साढ़े चार साल के शासन में उन्होंने अपनी एक स्वतंत्र छवि और वजूद कायम कर लिया है । और यह मुलायम सिंह और सपा की परंपरागत छवि को भी पार कर जाती है । जिसमें अपराधी माफियाओं का विरोध है तो विकास की नई संभावनाएं भी हैं । अब समय के इस चक्र को पीछे नहीं लौटाया जा सकता है । न ही किसी दूसरे नेता को उसकी जगह स्थापित किया जा सकता है। 


लेकिन इस पूरे मामले में मुलायम सिंह की भी मजबूरी को समझना होगा । नेताजी अभी भी अपने परिवार के साथ रहते हैं । और अखिलेश को चुनकर बाकी को वो छोड़ भी नहीं सकते हैं । वो चाहे साथ रहने वाली पत्नी हों या फिर 30 सालों से साथ दे रहे छोटे भाई शिवपाल । बाकी जिंदगी भी मुलायम जी सुकून से जिएं और उनकी राजनीतिक विरासत भी सुरक्षित रहे । इस लिहाज से उनके लिए यही रास्ता हो सकता था । इसमें अखिलेश उनके जीते जी पूरी तरह स्थापित हो जाएंगे और परिवार के प्रति उनके समर्पण पर भी आंच नहीं आएगी । 


मुलायम सिंह शिवपाल के साथ-साथ अपनी पत्नी से घिरे हुए हैं।  ऐसे में उनको छोड़कर सीधे अखिलेश के पक्ष में खड़ा होना उनके लिए मुश्किल था। सरकार से बाहर किये जा चुके शिवपाल को एक ही बार में पार्टी के अधिकारों से भी बेदखल नहीं किया जा सकता था । लेकिन साथ ही सत्ता की कमान के साथ-साथ पार्टी और चुनाव की कमान भी अखिलेश को देनी थी । ऐसे में इस काम को भी अब पिछली बार की तरह जनदबाव में पूरा किया जाएगा।  जिसमें आखिरी तौर पर एक बार फिर शिवपाल आगे आ कर समर्पण कर सकते हैं । और फिर कुछ प्रत्याशी बदले जाएंगे और अखिलेश के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा होगी । क्योंकि पार्टी के बंटवारे से सबका नुकसान है ।


हां ये बात जरूर है कि राजनीति के हर अखाड़े में जीतने वाला ये पहलवान आखिरी बाजी हारता दिख रहा है । लेकिन ये हार भी अपने बेटे से मिल रही है इसलिए एक नेता के तौर पर भले ही कुछ अपमानजनक हो लेकिन एक पिता के रूप में बड़ी जीत है । क्योंकि पिता खुद को खत्म कर भी अपने बेटे को स्थापित करना चाहता है । ऐतिहासिक बाबर से लेकर पौराणिक दशरथ तक यही कहानी है ।


पत्रकार अरविंद शेष लिख रहे हैं...
बसपा को उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल करने से रोकना भाजपा का अकेला मकसद है! वह अखिलेश यादव के सहारे हो, तब भी..! वैसे भी, पिछले कम से कम सात-आठ सालों से सपा की 'मुलायम' सियासत का आखिरी हासिल भाजपा की सियासी और समाजी जमीन को मजबूत करने की शक्ल में मजबूत हुआ है...!


अब दिखने में जो दिख रहा है, वही देखिए, लेकिन याद रखिए कि आरएसएस हम लोगों के मनोरंजन के लिए सियासत नहीं कर रहा है..! भारतीय आबोहवा में किसी भी बदलाव की लड़ाई या फिर जड़ता को बनाए रखने के लिए प्रतीकों की अहमियत के बारे में उससे बेहतर कोई नहीं जानता है।


इस लिहाज से अखिलेश यादव उसके लिए गैर-महत्त्व की 'चीज' हैं। मायावती प्रतीक हैं, इसलिए मायावती उसके निशाने पर हैं, मुलायम या अखिलेश नहीं..! नीतीश की तरह मुलायम भी अब आरएसएस के लिए 'अपने आदमी' हैं...!


मेरी यह टिप्पणी पढ़ते हुए यह याद रखा जाए कि किसी भी हालत में इस बार बसपा अगर भाजपा के साथ जाती है तो यह उसके लिए आत्महत्या से भी बुरी मौत होगी...!
 


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