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‘नेशनल दस्तक’ वेबसाइट का पन्ना एक उम्मीद लेकर खुलता है

Created By : अरविन्द शेष Date : 2016-12-20 Time : 19:20:29 PM

‘नेशनल दस्तक’ वेबसाइट का पन्ना एक उम्मीद लेकर खुलता है

पक्ष से तय होगा सरोकारों की ईमानदारी
जिस दौर में राजनीति की दिशा तय करने में मुख्यधारा का मीडिया सबसे अहम भूमिका में खड़ा हो चुका है, वैसे समय में अगर सबसे लाचार अगर कोई है तो समाज के कमजोर तबके के वे साधारण लोग, जिनके सामने उनका मानस तैयार करने की मंशा से हमलावर की शक्ल में टीवी का परदा है और विशालकाय घरानों के रंगीन पन्नों वाले अखबार।

 

किसी भी सवाल और धुंधलके पर राय बनाने के लिए लोगों के सामने इतना भी विकल्प नहीं छोड़ा गया है कि वे खुद से किसी खबर या घटना के बारे में अपनी राय बना सकें। उनकी जिंदगी पर सबसे ज्यादा असर डालने वाली कोई पहल या घटना सामने आती है और किसी तूफानी हवा की तरह लगभग समूचा मीडिया उनके सामने खड़ा होकर चिल्लाने लगता है, ऊंगली दिखा-दिखा कर यह बताने लगता है कि सही अगर कुछ है तो यही है... यही है... यही है... जो हम बता रहे हैं।


जबकि मीडिया अपनी बुनियादी अवधारणा में यह है कि उसका पक्ष हरेक देशकाल में सबसे हाशिये पर खड़े या हाशिये के बाहर फेंक दिए गए लोगों का पक्ष होगा। लेकिन कोई भी होशमंद इंसान यह देख सकता है कि कथित मुख्यधारा के मीडिया का लगभग समूचा हिस्सा इस कसौटी पर कहां खड़ा है। बल्कि साफ कहें तो यह सत्ता और सत्ताधारी सामाजिक तबकों के हक में एक भयानक बेईमानी का संजाल रचता है। 


सवाल है कि जब आम जनता के राजनीतिक प्रशिक्षक के तौर पर लगभग समूचे कथित मुख्यधारा के मीडिया ने अपना पक्ष चुन लिया है और उसने खुद को सरकार और खासतौर पर आरएसएस-भाजपा के हर काम के अनुकूल बना कर पेश करना शुरू कर दिया है तो ऐसे में साधारण लोग क्या करें! मेरा मानना है कि अगर मुख्यधारा के माने जाने वाले मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी से निभाई होती तो व्यापक जनता के बीच सत्ता के चरित्र को लेकर इस कदर वहम नहीं होता और सत्ता इतनी अघोषित निरंकुशता के साथ अपने परोक्ष एजेंडे पर काम नहीं कर पाती।


इसी हालत के मद्देनजर एक समांतर मीडिया या मंच की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है और मांग उभर रही है तो फिलहाल ‘नेशनल दस्तक’ का वेबसाइट का पन्ना एक उम्मीद लेकर खुलता है। एक जागरूक और जनपक्षीय व्यक्ति के लिए कथित मुख्यधारा के मीडिया में जो सबसे जरूरी बातें छूटती हैं या वह जहां बेईमान साबित होता है, वहीं ‘नेशनल दस्तक’ इस समूचे तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया को आईना दिखाता हुआ नजर आता है। 


हालांकि अभी एक साल पूरा हुआ है, लेकिन जितनी मुझे जानकारी है, सीमित संसाधनों के बावजूद ‘नेशनल दस्तक’ ने बताया है कि अगर असली तकलीफों, समस्याओं, सवालों की पहचान हो और सरोकारों में ईमानदारी और नजरिए में साफगोई या स्पष्टता हो तो आप बिना किसी नफा-नुकसान की फिक्र किए समाज के सबसे कमजोर तबकों के हक के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाइयों के साथ खड़े हो सकते हैं।


यहीं आकर ‘नेशनल दस्तक’ से वह उम्मीद थोड़ी और ज्यादा बढ़ जाती है कि अगर शुरुआती साल में उसने खुद को मीडिया के मानकों पर खड़ा करने की कोशिश की है तो आने वाले वक्त में वह मौजूदा कथित मुख्यधारा के मीडिया के बरक्स एक समांतर स्पेस के रूप में सामने आए, जो समूचे मीडिया के लिए ईमानदारी से जनता के पक्ष में खड़ा होने की चुनौती पेश करे।
 

लेखक अरविन्द शेष वरिष्ठ पत्रकार हैं.


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