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भाजपाई आरक्षण में समीक्षा की बात करते थे, नीतीश ने कर दिखाया

Created By : मुकेश कुमार Date : 2016-12-23 Time : 12:08:35 PM


भाजपाई आरक्षण में समीक्षा की बात करते थे, नीतीश ने कर दिखाया

बिहार में सामाजिक न्याय के नाम पर चलने का दंभ भरने वाली वाली सरकार के राज में आरक्षण की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आरक्षण पर बढ़-चढ़कर बोलने वालों के राज में राज्य की सबसे महत्वपूर्ण संस्था बिहार राज्य लोकसेवा आयोग- बीपीएससी के द्वारा की जा रही नियुक्तियों में जब यह खेल चल रहा है तो बाकी की क्या स्थिति होगी, इसे आसानी से समझा जा सकता है।

 

अभी एक सप्ताह पूर्व बीपीएससी द्वारा जारी एक विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर हेतु लिए गए साक्षात्कार के परिणाम में इसकी पूरी पोल-पट्टी खुल गई है। विज्ञापन के वक्त आयोग द्वारा सामान्य श्रेणी के जितने सीटों के लिए जितनी रिक्तियां निकाली गई थी, घोषित परिणाम में सामान्य श्रेणी में उससे ज्यादा अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण घोषित कर दिया गया है।

 

आपको बताते चलें कि बीपीएससी द्वारा राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं अंगीभूत महाविद्यालयों में सहायक प्राचार्य (असिस्टेंट प्रोफेसर) हेतु दो वर्ष से नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है। इसके विज्ञापन संख्या- 51/ 2014 के अंतर्गत दर्शन शास्त्र विषय में कुल 134 पदों पर नियुक्ति के लिए सामान्य श्रेणी के लिए- 68, का विज्ञापन जारी किया गया था। इस महीने के 13 तारीख को आयोग ने इसका परिणाम जारी करते हुए सामान्य श्रेणी में 73 अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण घोषित कर दिया है। यह आरक्षण से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की खुली अवहेलना है। आखिर आयोग ने जब स्वयं विज्ञापन में 68 रिक्तियों को खुला और बाकी को आरक्षित घोषित करते हुए आवेदकों से आवेदन आमंत्रित किए थे, तब जारी रिजल्ट में सामान्य श्रेणी की संख्या आखिर बढ़ कैसे गई? इसका जवाब तो बीपीएससी को ही देना है।


बीपीएससी ने इस विषय के लिए 669 उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए आमंत्रित किया था, जिनका साक्षात्कार इस साल के शुरू के महीने 22 फरवरी से 5 मार्च के बीच आयोजित हुआ। आयोग ने पुनः पटना उच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन करते हुए वैसे अभ्यर्थी, जो विज्ञापन की अन्य न्यूनतम शर्तों को पूरा करते थे और 1 दिसंबर 2002 के पूर्व BET/SET (बिहार पात्रता परीक्षा/ राज्य पात्रता परीक्षा) उत्तीर्ण 18 उम्मीदवारों को 22 नवंबर 2016 को साक्षात्कार हेतु आमंत्रित किया। आयोग के मुताबिक उक्त दोनों अवधि में आयोजित साक्षात्कार में कुल 493 उम्मीदवार सम्मिलित हुए, जिसमें से 18 उम्मीदवार पर्याप्त दस्तावेज़ आयोग के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर पाने के कारण रद्द कर दिये गए।

 

इस प्रकार 475 उम्मीदवारों से लिए गए साक्षात्कार और एकेडमिक अंकों के योग के अनुसार आयोग ने मेधा सूची तैयार कर 132 उम्मीदवारों को राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालय में नियुक्ति हेतु सफल घोषित कर दिया है।


आयोग द्वारा जारी परिणाम में विज्ञापन के मुताबिक 68 के स्थान पर 73 अभ्यर्थियों को सामान्य कोटि में उत्तीर्ण घोषित कर दिया है। 132 सफल घोषित अभ्यर्थियों में शेष 59 में से 4 जिन निःशक्त उम्मीदवारों को सफल घोषित किया गया है, उसमें से तीन सामान्य श्रेणी के ही हैं। आरक्षित श्रेणी मे सफल इस 59 अभ्यर्थियों में से 18 अनुसूचित जाति, अत्यंत पिछड़ा वर्ग के 21, पिछड़ा वर्ग के 13 जिसमें से 1 निःशक्त कोटे में, और पिछड़ा वर्ग महिला के लिए 4 अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण घोषित किया गया है। इस आरक्षित कोटे में अनुसूचित जनजाति का एक भी नहीं है। कुल 132 में से 5 मुसलमान सामान्य श्रेणी में और 6 मुसलमानों का चयन आरक्षित श्रेणी के तहत हुआ है।


आयोग द्वारा जारी इस परिणाम में आयोग ने स्वयं अपने द्वारा जारी विज्ञापन में सामान्य श्रेणी के लिए घोषित सीटों की परवाह किये बगैर मनमाने ढंग से यह रिजल्ट जारी किया है। बीपीएससी जैसी संस्था का आरक्षण रोस्टर के मामले में यह रुख है तो बाकि नियुक्तियों और नामांकनों में आरक्षण कितना लागू होता होगा, यह आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। और यह तब हो रहा है जब पिछले तीन दशक से राज्य में दलित-पिछड़ों-अति पिछड़ों के नाम पर राजनीति करने वाले लालू-राबड़ी-नीतीश बारी-बारी से सत्ता में हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की मंडलवादी राजनीति के रहनुमा आरक्षण के इस खुले उल्लंघन के संगीन मामले पर क्या संज्ञान लेते हैं? दरअसल अपने प्रारम्भ से ही आरक्षण को लेकर सत्ता मिशनरी-नौकरशाही और नियुक्ति करने वाली एजेंसियों का रवैया ऐसा ही रहा है। पूरे सिस्टम के सर्वोच्च पदों पर बैठे सवर्ण-सामंती ताकतों की नुमाइंदगी आज भी इतनी जबर्दस्त है कि वह हर बार शातिराना खेल के जरिये इन संवैधानिक प्रावधानों को धता-बता देते हैं।


अब समझिए कि आरक्षण कोटे के पार जाकर जब सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण घोषित करने की वे हिम्मत जुटा लेते हैं तो अनारक्षित पदों पर नियुक्तियों में दलित-पिछड़ों के साथ किस किस्म का भेदभाव बरता जाता होगा। ऐसे मामलों में दोषी को सख्त सजा की गारंटी कर नजीर नहीं पेश की जाएगी, तब तक यह सब इसी तरह धड़ल्ले से चलता रहेगा और दलित-पिछड़े-आदिवासियों व अल्पसंख्यकों के साथ यह भेदभाव होता रहेगा।


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