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जेएनयू प्रकरण के बहाने कामरेडों से कुछ सवाल 

Created By : ओम सुधा Date : 2016-12-30 Time : 11:31:26 AM

जेएनयू प्रकरण के बहाने कामरेडों से कुछ सवाल 

वर्तमान जेएनयू प्रकरण में वामपंथी संगठनों का जनेऊवाद खुलकर सामने आ गया है. सबसे दिलचस्प पहलु यह है कि खुद को दलितों का रहनुमा बताने वाले इस बार दलित लीडरशिप के लिए" इंटेलेक्चुअल मास्टरबेट " {बौद्धिक हस्तमैथुन } जैसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं. 


दलितों-वंचितों के वर्तमान आंदोलन को हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी, गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़, झारखण्ड, भागलपुर और अभी जेएनयू के संदर्भ में जोड़कर समझिये।
पुराने वाले-लालू-नीतीश-मुलायम-मायावती-शिबू के साथ इसे खड़ा करके क्या साबित करना चाहते हैं 'वे'!!!  इसके असर को कम करते हुए किसकी तरफदारी कर रहे हैं 'वो'!! समझिये....


साथ ही दलितों के ब्राह्मणवादी होने की चर्चा करना कुछ लोग कभी नहीं भूलते! दलित एक्टिविस्ट और न्याय मंच से जुड़े डॉ मुकेश कुमार इसके जवाब में कहते हैं- दलित क्या ब्राह्मणवादी होंगे? वे इसके शिकार भले हो सकते हैं, ब्राह्मणवाद के गुलाम भले हो सकते हैं। ब्राह्मणवाद का मूल स्रोत कभी नहीं हो सकते। 


इन जनेऊधारी वामपंथी नेताओं को तय करना होगा की प्रधान शत्रु से लड़ेंगे या दलितों-वंचितों के ही खिलाफ खड़े होगे! फिलहाल इन्हें अपने शब्दों और भीतर की भावनाओं की खुद ही गहराई में जाकर पड़ताल करके देख लेना चाहिए! कितनी नफरत भरी हुई है इनके  शब्दों, विश्लेषण और प्रवृत्तियों में कैसे-कैसे तर्क गढ़ते दिख रहे हैं.  


अस्मितावाद! नेतृत्व की महत्वाकांक्षा! और भी बहुत कुछ... मनमाफिक विश्लेषण का तर्कजाल बुन रहे, क्रान्ति का पाठ पढ़ाते हुए दिख  रहे हैं! लेकिन बता भी नहीं रहे कि भारत में क्रान्ति का इनका  फार्मूला हर बार असफल क्यों हुआ? दलितों-वंचितों के युवाओं के प्रति इतनी नफरत से भरे हुए क्यों दिख रहे हैं! इन सारे पहलुओं पर गहराई से सोचने की जरुरत है! आत्मविश्लेषण-आत्ममंथन- आत्मालोचना का क्या हुआ?


डॉ मुकेश कुमार कहते हैं - इनको यह भी सोचना पड़ेगा की अपने मुंह मियां मिट्ठू बनकर आखिर कब तक क्रांतिकारी बने रहेंगे ? कमजोर तबकों के तबकाई प्रश्नों पर क्या यही है इनका मार्क्सवादी एप्रोच! ये क्यों मार्क्सवाद का बैंड बजाने पर तुले हुए हैं! आत्ममंथन करें! आलोचनाओं को आत्मसात करें! और आगे बढ़ चलें! वर्ना क्रान्ति तो दूर, प्रतिक्रान्तिकारी ही बन बैठे रह जाएंगे!


वैसे लालू-नीतीश-मुलायम-रामविलास की पार्टी को असली वाला सोशल जस्टिस वाली पार्टी नहीं माना जा सकता है। आप भागलपुर की घटना को देखिये एक महीना पूरा होने वाला है पर अब तक सामाजिक न्याय का दम्भ भरने वाली नितीश सरकार पुरे मामले पर चुप है. जिस सदर एसडीओ कुमार अनुज ने दलित महिलाओं पर बेरहमी से लाठियां बरसाई थी वो आज भी भागलपुर में ठाठ से अपना बर्थडे सेलिब्रेट कर रहा है.  


इनके पूरे चरित्र को ठीक से देखने पर समझ में आता है की सत्ता में आते-जाते इन्होंने सोशल जस्टिस के समग्र एजेंडे को लागू करने के बजाय उससे गद्दारी की है। नितीश कुमार ने पिछले दिनों न्यायिक सेवा में आरक्षण लागू करने की दिशा में पहल की है लेकिन क्या समग्रता में वो सामाजिक न्याय के लिए कितना प्रतिबद्ध हैं इसका पता इस बात से ही चल जाता है की दलित नरसंहार की जांच करने वाले अमीरदास आयोग को इनके कार्यकाल में ही भांग किया गया. 


दलितों -पिछड़ों की हिमायती बनते बनते सवर्ण आयोग गठित कर दिया . दलित नरसंहारों की चार्जशीट इतनी कमजोर कर दी जाती रही की सभी आरोपी बाइज्जत बरी होते गए . पुरे सूबे में सवर्ण सामंती ताकतों के हौसले बुलंद हैं. साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, फासीवाद, कोर्पोरेटवाद, जातिवाद, ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता इन सारे दुश्मनों से दलित-वंचित-आदिवासी-अल्पसंख्यक-महिलाएं ही तो लड़ रही हैं असली लड़ाई।  कुल मिलाकर ये पार्टियां भी दलितों-पिछड़ों की उसी किस्म की पार्टियां हैं जैसे सिंगुर नंदीग्राम करने वाली पार्टी और उससे गठजोड़ बिठाने वाली पार्टियां --कम्युनिस्ट हैं!


सोशल जस्टिस की जंग गुजरात से लेकर भागलपुर, जेएनयू और देश के कोने-कोने में जारी है, जो किसी देवता का मोहताज नहीं है! देश भर में फ़ैल रहे इस आंदोलन को अब नए सिरे से देखने-समझने-परिभाषित करने की जरुरत है। तभी खुद को दलितों-पिछड़ों- मुसलमानो का रहनुमा कहलाने वाले फ़र्ज़ी सामाजिक न्यायवादियों और जनेऊधारी कामरेडों की बौखलाहट को समझा जा सकता है. 


सामाजिक न्याय का ढिंढोरा पीटने वाले जो लोग सत्ता में आते जाते रहे हैं वो अपने राज्यों में भी मंडल कमीशन की सभी सिफारिशों की समग्रता में अबतक लागू क्यों नहीं कर पाये? कौन उनके पैर की बेड़ियाँ बन गया है ? जहां कथित सामाजिक न्याय मार्का सरकारें हैं वहाँ भी दलितों का उत्पीडन बदस्तूर क्यों जारी है ? सवर्ण -सामंती ताकतों के हौसले क्यों बुलंद हैं? 


वहीँ खुद को गरीबो-पिछड़ों और मुसलमानो का एक मात्र तारणहार कहने वाले और संघर्ष के रास्ते मुक्ति की बात करने वाले जनेऊधारी कामरेडों को बताना चाहिए की उनके संगठन में शीर्ष पर कोई दलित नेता क्यों नहीं है ? जो थोड़े बहुत दलित नेता उनके संगठन में हैं उनकी ही कमोवेश वही हालात है जो भाजपा में रामविलास और उदित राज जैसों की है. 

 

कामरेडों को जवाब देना चाहिए की दलित नेतृत्व से उनको डर क्यों लगता है ? दलितों की बात बात खुद दलित ही करे तो उनको क्या आपत्ति है ? भाजपा- संघ पर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर बवाल मचाने वाले कामरेडों को इस बात का जवाब देना चाहिए की जब दलित खुद अपनी बात कहते लगा है तो अभिव्यक्ति की आज़ादी उनको बौद्धिक हस्तमैथुन क्यों लगने लगा ? 


जेएनयू प्रकरण में जब दलित-पिछड़े अपने हक़ अधिकार के लिए सामाजिक न्याय की लड़ाई छेड़ चुके हैं तब उनकी प्रगतिशीलता और दलित -पिछड़ा के नाम पर लड़ने वाली लड़ाइयों पर खामोशी क्यों छा गयी? 
क्यों कामरेड जनेऊ का बोझ बहुत बढ़ गया है क्या?

 

लेखक- डॉ. ओम सुधा, अम्बेडकर फुले युवा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. यह लेखक के निजी विचार हैं. 


 


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