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धारणा पहले स्वतःस्फूर्त होती थी, अब भाजपा टीमवर्क से बनवा रही है...

Created By : अशफाक अहमद Date : 2017-01-08 Time : 17:21:31 PM


धारणा पहले स्वतःस्फूर्त होती थी, अब भाजपा टीमवर्क से बनवा रही है...

राजनीति में पर्सेप्शन, यानि धारणा मुख्य चीज है... जो पहले कभी स्वतःस्फूर्त होती थी, अब बाकायदा इसके लिये टीमवर्क होता है, कई टीमें सोशल मीडिया पर इसे बनाने में लगाई जाती हैं तो प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बड़ी बड़ी मछलियों को ओब्लाईज करके उन्हें भी इसी काम में लगाया जाता है।

 

इधर दो दिन में आसपास के गाँवों के कुछ गरीबों/ग्रामीणों से बात हुई, तो नोटबंदी पे या भाजपा की परफार्मेंस पे उनके विचार जाने... वे खुश थे, बहुत अच्छा काम हुआ है। उन्हें अर्थशास्त्र की ए बी सी डी नहीं आती, उन्हें मतलब नहीं कि विमुद्रीकरण ने देश को कितना पीछे कर दिया है, हमारे आर्थिक ढांचे पर कितना असर पड़ा है, कितने लाख करोड़ का खुद नुकसान झेला है... उन्हें खुशी इस बात की है कि "बड़े लोग" परेशान हुए, सड़क पर आ गये। ऐसे कितने लोगों को वे जानते हैं जो परेशान हुए और सड़क पर आ गये, इसका कोई जवाब उनके पास नहीं था। यही कलियुग है... लोग अपने दुख से दुखी हो न हों, मगर दूसरे के काल्पनिक दुख में भी सुख महसूस कर लेते हैं। अजीब परपीड़ा कामी (सैडिस्ट) चरित्र हो गया है हमारे समाज का।


हालाँकि यह भी इसी धारणा का कमाल है जो 2013 से 2014 तक, महामना मोदी जी, अपने सेठानी मित्रों के पैसे, संघी संगठन के बल पर सोशल मीडिया और अपने मैनेज किये टीवी चैनलों और अखबारों के माध्यम से आम जनचेतना में रोपने में कामयाब रहे कि कांग्रेस देश को 67 सालों से सिर्फ लूट रही है और सिर्फ वही हैं जो देश को गर्त से निकाल कर संभाल सकते हैं।


एक बड़े वर्ग ने इस धारणा को आत्मसात कर लिया और उन्हें अभूतपूर्व सफलता मिली। यह धारणा अभी भी उनके चाहने वालों की सोच में जमी हुई है। भले ढाई साल के कार्यकाल में वे गिनाने लायक एक उपलब्धि न हासिल कर पाये, विकास के नाम पर यूपीए की योजनाओं को ही आगे बढ़ाते रहे, अंतर्राष्ट्रीय भ्रमण के बावजूद निवेश से ले कर रेटिंग तक, चीन, पाकिस्तान के मुद्दे पर भी लगातार मुंह की खाने के बावजूद, महंगाई, बेरोजगारी जैसे घरेलू मुद्दों पर घनघोर नाकामी के बावजूद बहुत से लोगों का यह विश्वास अटल बना हुआ है कि वे जो कर रहे हैं, अच्छा कर रहे हैं।


किसी धारणा को टूटने के लिये इतना वक्त काफी होता है, लेकिन तभी जब विपक्ष इतना सक्षम हो... लेकिन कांग्रेस तो जैसे डिफेंसिव मोड से बाहर ही नहीं निकलना चाहती, उसने जैसे वाकई में मान लिया है कि वह देश की दुर्दशा की जिम्मेदार है। जो इधर उधर के छोटे मोटे चुनावों में उसे सफलता मिली भी है, वह खुद उसकी मेहनत से कम और भाजपा की नाकामी ज्यादा है। यह ठीक है कि धारणा की शिकार अकेली कांग्रेस है, इसलिये जहां जहां भाजपा कांग्रेस का मुकाबला है, वहां भाजपा फायदे में रहती है, जबकि जहां क्षेत्रीय दलों से मुकाबला है, वहां मार खा जाती है... केरल, बंगाल, दिल्ली, बिहार इसके मुख्य उदाहरण हैं।


अभी भी बहुत से मुद्दे दिये हुए हैं भाजपा ने... कांग्रेस को डिफेंसिव मोड से निकल कर खुल कर आक्रामक होना होगा और न सिर्फ अपने खिलाफ बनायी गयी धारणा को तोड़ने की कोशिश करनी होगी, बल्कि पूरे देश में यह पर्सेप्शन रोपने की कोशिश भी करनी होगी कि सरकार सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के लिये ही काम कर रही है। यह कोई मुश्किल भी नहीं, क्योंकि नोटबंदी के बाद उभरी भीषण बेरोजगारी, भुखमरी की चोट तो सब ही महसूस कर रहे हैं, लेकिन अभी परपीड़ा के सुख में अपनी तकलीफ भूले बैठे हैं। कांग्रेस को इसकी जरूरत ज्यादा इसलिए है कि जिन पांच राज्यों में चुनाव हैं... उनमें से चार में उसे ही भाजपा से लड़ना है, बाकी बचता है यूपी, तो यहां सपा बसपा के होते उन्हें तीसरे नम्बर पे ही रहना है, अपने गुलामों के सहारे भ्रम वे कितना भी फैला लें।

 

(वर्तमान परिस्थितियों पर ये लेखक के निजी विचार हैं। यह आर्टिकल उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)


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