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...तो आपके हिसाब से जनाब ओवैसी ही मुस्लिमों के लिये अंतिम विकल्प हैं?

Created By : अशफाक अहमद Date : 2017-01-11 Time : 12:02:19 PM


...तो आपके हिसाब से जनाब ओवैसी ही मुस्लिमों के लिये अंतिम विकल्प हैं?

इधर कुछ चुनावों से एक नया ही नारा देखने में आने लगा है... मुस्लिम कयादत का। पढ़े लिखे मुसलमानों का एक वर्ग कभी याकूब कुरैश में अपना मसीहा ढूंढने लगता है, कभी डाक्टर अय्यूब में तो कभी ओवैसी में... और इस बार तो मुस्लिम कयादत का दावा करने वाले तीन तीन दावेदार चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं, पीस पार्टी, राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल और असदुद्दीन ओवैसी की मजलिस पार्टी।


इनमें ओवैसी समर्थक सोशल मीडिया पर ज्यादा ही मुखर हैं। वे एक अभियान की तरह मुसलमानों को याद दिलाने में लगे हैं कि अखिलेश मुसलमानों के लिये इसलिये खलनायक हैं क्योंकि उनके राज में बाकायदा सपा के नेतृत्व में न सिर्फ मुजफ्फर नगर का दंगा हुआ था बल्कि उनके शासनकाल में सौ से ज्यादा दंगे हुए हैं और मुसलमान लगातार असुरक्षित रहे हैं। 


इसी तरह मायावती जी के बारे में याद दिलाया जा रहा है कि वे न सिर्फ गुजरात मोदी के चुनाव प्रचार के लिये गयी थीं, बल्कि वे भाजपा के साथ मिल कर सरकार भी बना चुकी हैं और कई भाजपा नेताओं से उनके बहन भाई जैसे सम्बंध हैं। वहीं कांग्रेस तो हमेशा मुसलमानों की दुश्मन रही है और बाबरी मस्जिद का ताला भी उसी ने खुलवाया था। बाकी भाजपा तो जो है सो है... यानि सारे मुसलमानों के दुश्मन हैं और जनाब ओवैसी ही आपके लिये अंतिम विकल्प हैं। उन्हें इस बात से भी कोई मतलब नहीं कि ओवैसी लड़ कितनी सीटों पर रहे हैं।


भई लोकतांत्रिक सत्ता को क्या आप कोई इस्लामिक खिलाफत (हुकूमत) समझते हैं कि सबकुछ आपके हिसाब से हो, आपके लिये हो... वे कई धर्मों, संस्कृतियों वाले समाज का नेतृत्व करते हैं, कुछ आपको सुहायेगा तो कुछ दूसरे के लिये होगा। शासन इतने सीधे सादे तौर पर नहीं होता, कभी झुकना पड़ता है, कभी समझौते करने पड़ते हैं, किसी अपनी छवि से निकल कर कुछ और दिखना पड़ता है, कभी किसी वर्ग की भावनाओं का ख्याल रखने के लिये नर्म होना पड़ता है, कभी किसी की... 


न कि कोई भी पार्टी सत्तासीन होने पर सिर्फ आपके हित देखने लग जायेगी, कि नहीं देखे तो आप मुस्लिम कयादत ढूंढने लगे... क्या आपके इन मुस्लिम कयादत के दावेदारों के दो चार सीटें जीत लेने से पूरा परिदृश्य बदल जायेगा या कुछ भी बदल जायेगा?


क्या है यह मुस्लिम कयादत की सोच... धर्म के नाम पर अपना अलग मंच ही तो है। क्या यह चरमपंथी विचारधारा नहीं कि जहां बहुधर्मी समाज हो, जहां सर्वजन के हित की बात होनी चाहिये, वहां आप अपना धर्म देख रहे हैं, ठीक भाजपा की तरह।


जब आप मुस्लिम कयादत के नाम पर चरमपंथ की पैरवी करते हैं तो फिर हिंदू नेतृत्व के आकंक्षी आरएसएस, भाजपा और उनके अनुयायियों को गलत कैसे कह लेते हैं, क्यों उनसे नफरत है आपको... वो भी तो आपकी ही तरह राजनीति का आधार धर्म को बनाते हैं। न वे सर्वसमावेशी राजनीति के समर्थन में हैं और न ही आप। 


पर यह क्यों नहीं सोचते कि जब ऐसी चरमपंथी विचारधारा को सत्ता का वरदहस्त प्राप्त हो जाता है तो प्रतिक्रियात्मक रूप से अखलाक, नजीब, मिन्हाज ही सामने आते हैं... तब बिलबिलाहट क्यों होती है?


वे तादाद में ज्यादा हैं तो बहुमत बना सकते हैं और तुम कम हो तो चाह कर भी कभी नहीं बना सकते, लेकिन अगर बना सकते और अपनी सत्ता स्थापित कर सकते तो आप भी प्रतिक्रियात्मक रूप से कमलेश तिवारी, प्राची, आदित्यनाथ जैसों के कटे हुए सरों का माडल ही प्रस्तुत करते... चरमपंथ का तो चरित्र ही यही है।


बेहतर है कि सर्वसमावेशी राजनीति का समर्थन करें... जहां जाति की राजनीति का एक सकारात्मक पहलू यह होता है कि  वह दबी कुचली, वंचित, शोषित जातियों को हाशिए से निकाल कर मुख्यधारा में लाती है, वही धर्म की राजनीति सिर्फ समाज में विघटन ही पैदा करती है और एक दूसरा के प्रति दुराभाव की कारक होती है। इससे बचें, न कि समर्थन करें।

 

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)


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