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नीतीश राज के सामाजिक न्याय का काला सच

Created By : फराह शाकेब Date : 2017-12-04 Time : 13:23:35 PM

नीतीश राज के सामाजिक न्याय का काला सच

बिहार में मीडिया प्रस्तावित तथाकथित जंगलराज ( लालू राबड़ी शासन ) के समाप्त होने के बाद जो सरकार नीतीश कुमार के नेतृत्व में सत्तासीन हुई थी उसने सामाजिक न्याय का नारा दिया था हालांकि भाजपा जैसे वर्णवादी और धार्मिक जातिगत असमानता की पोषक राजनितिक दल के साथ रहते हुए जनता को दिग्भर्मित करने का ये ऐसा छल था जैसे चमकीली रेत दूर से पानी नज़र आती है और प्यासा उसी चमकीली रेत को पानी समझ कर उसके पीछे भागता पता नही कितनी दूर निकल जाता है। 


सामाजिक न्याय आज की राजनीति में एक ऐसा शब्द है जिसे राजनितिक दल अपनी सफ़लता का मूल मन्त्र मानते हैं लेकिन प्रश्न ये है की राजनितिक दलों द्वारा निर्गत सामाजिक न्याय की परिभाषा क्या है। सामाजिक न्याय को एकदम सरल परिभाषा में अगर हम समझने का प्रयास करें तो ये एकदम स्पष्ट है के समाज के अंतिम पंक्ति में बैठे किसी व्यक्ति के उत्थान के बिना और सदियों से शोषित पीड़ित रहे वर्ग का सर्वांगीण विकास किए बिना सामाजिक न्याय की स्थापना नहीं हो सकती। 


सामाजिक न्याय से मुराद है कि दो इंसानों के बीच सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेद न माना जाए, प्रत्येक व्यक्तियों को अपनी शक्ति के अनुपात में समुचित विकास के समान अवसर उपलब्ध हों, किसी भी व्यक्ति का किसी भी रुप मे शोषण न हो, समाज के प्रत्येक व्यक्ति की न्यूनतम मौलिक आवश्यकताएं पूरी हों और सबसे महत्व्पूर्ण है कि आर्थिक सत्ता केवल शोषक वर्ग के हाथों में केन्द्रित न हो, समाज का कमजोर वर्ग अपने को असहाय महसूस न करे। 


सामाजिक न्याय की संकल्पना बहुत व्यापक शब्द है जिसके अधीन ‘सामान्य और सर्वमान्य हित’ के लिए आवश्यक मापदण्ड और उस से सम्बन्धित सब कुछ आ जाता है जिसमें शोषित दलित पिछड़े के साथ साथ अल्पसंख्यकों के हितों का समावेश भी है।  लेकिन  सामाजिक न्याय का उद्घोष कर सत्ता प्राप्त करने वाले राजनितिक दल क्रियान्वन के प्रारूप में सामाजिक न्याय की इस पूरी अवधारणा को विपरीत कर देते हैं। सत्ता निर्माण में दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों की एक बड़ा अंश सहभागिता सुनिश्चित करता है लेकिन उस सत्ता शक्ति से लाभान्वित होता है शोषक वर्ग।


बाबा साहेब कहते हैं कि सामाजिक न्याय के जिस सिद्धांत में जातिगत ऊंच-नीच, धार्मिक कट्टरता, लिंग भेद, पूर्वजन्म की कल्पना को मान्यता दी जाती है। वह सामाजिक न्याय हो ही नहीं सकता बल्कि ब्राह्मणवादी न्याय का सिद्धांत है क्योंकि इस सिद्धांत में किसी जाति विशेष, लिंग विशेष का हित सुरक्षित है और वर्तमान में राजनितिक दलों द्वारा निर्धारित सामाजिक न्याय यही है, जिसकी अवधारणा को बाबा साहेब खारिज करते हैं। 


बिहार में नितीश कुमार के नेतृत्व वाली सामाजिक न्याय की सरकार के कुछ कारनामों पर नज़र डालते चलें तो बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार के अभियुक्त रणवीर सेना के आरोपियों को आरोपियों के स्वजातीय अपने क़रीबी सहयोगियों के इशारे पर कोर्ट से बचाने से ले कर अररिया ज़िले के फारबिसगंज के भजनपुरा गोलीकांड में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और उनके क़रीबी भाजपा विधान पार्षद के इशारे निहत्थे अहिसंक ग्रामीणों पर गोली चलाने का आदेश देने वाली महिला आरक्षी अधीक्षक को प्रोन्नति दे कर दरभंगा ज़िला के सीनियर एस पी के पद पर पदस्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण माने जाएंगे।

 
विगत कार्यकाल की चर्चा को विराम दे कर फिलहाल पिछले एक साल के अंदर जो वारदात सत्तापोषित सवर्णों ने अंजाम दिया है वो नीतीश कुमार के सामाजिक न्याय की बखिया उधेड़ने के लिए काफी है। 1 जनवरी 2017 को सत्ता संरक्षित सामंती-अपराधियों ने अररिया के माले जिला सचिव कॉमरेड सत्यनारायण प्रसाद यादव और कॉमरेड कमलेश्वरी ऋषिदेव की भरगामा थाना प्रभारी की उपस्थिति में बर्बर हत्या को अंजाम दिया।


ज्ञात हो के भरगामा प्रखंड के रहरीया गांव में सिलींग की जमीन पर महादलित मुसहर परिवार पिछले 40 वर्षों से आबाद हैं लेकिन सत्ता पोषित भू माफ़ियाओं ने अवैध ढंग से इस ज़मीन पर कब्ज़ा जमा कर रखा है। वे इन परिवारों को ज़मीन से बेदख़ल करने का षड्यंत्र कर रहे हैं और इसी सिलसिले में कॉमरेड सत्यनारायण 1 जनवरी को गांव में बैठक करने गये हुए थे। दिन-दहाड़े पुलिस की उपिस्थिति में सत्यनारायण और कमलेश्वरी ऋषिदेव को मार डाला गया। 


ठीक साल भर पहले जनवरी 2016 में ही अररिया जिले के नरपतगंज प्रखंड के बहादुरपुर गांव में दलित समुदाय के 10 लोगों पर अपराधियों ने तेजाब फेंककर अपनी शक्ति का  प्रदर्शन किया तो दूसरी तरफ़ दिसम्बर 2016 में भाजपा संरिक्षत भूस्वामियों ने सहरसा में मौत का तांडव मचाकर इसका जश्न मनाया। सहरसा में चमरखला की 1 बीघा जमीन पर कब्जे की नीयत से इन ताकतों ने चानो राम व वकील राम की हत्या कर दी। बेगूसराय जिले के बलिया प्रखंड में 21 मार्च की शाम भूमि संघर्ष के कारण भाकपा माले के दो नेताओं महेश राम और रामप्रवेश राम की हत्या की गयी उसके बाद एक के बाद एक हत्याओं को अंजाम दिया गया और गारो पासवान, राजाराम पासवान और अनिता देवी की भी हत्या कर दी गयी। दरभंगा जिले के बिरौल पंचायत के कटैया मुसहरी में भी भाजपा के पोषित दबंगों ने महादलितों की ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा जमाने की कोशिश की जिस क्रम में जगमाया देवी की मौत हुई और हिरा पासवान की हत्या हुई।


पश्चिम चंपारण के मैनाटांड़ प्रखंड के मैनाटांड़ पंचायत में करीब 100 एकड़ बेनामी जमीन तीस सालों गरीबों के कब्जे में है जिसका उपयोग वो जीविका चलाने के लिए करते आ रहे हैं। लेकिन कुछ स्थानीय भूमाफ़ियाओं ने अवैध ढंग से फ़र्ज़ी कागज़ात बनवा कर उस ज़मीन का निबन्धन करवा लिया है और कोर्ट में मुक़दमा कर बिना उस ज़मीन की बेनामी सम्पत्ति का ज़िक्र किये गरीबों की बेदखली का दबाव बना रहे हैं। दमन प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भाकपा-माले सह खेमस नेता बन्हू राम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। विगत दिनों भागलपुर से लेकर पटना तक दलित-गरीबों के ऊपर बर्बर जुल्म ढाये गये। 


पिछले महीने भागलपुर में वास-आवास की जमीन की मांग कर रहे दलितों-गरीबों के दमन,उनपर बर्बर लाठी चार्ज, विगत नवम्बर में भागलपुर में ही रंगरा प्रखण्ड में दबंगों द्वारा दलितों के साथ हिंसा, उनके घर फूंक दिया जाना और लूटपाट, चंपारण में बेनामी ज़मीन पर बसे गरीबों को उजाड़ने के खिलाफ आंदोलनरत माले नेताओं की गिरफ्तारी, राजधानी पटना में मांझी जाति के बेदखल गरीबों पर बर्बर पुलिसिया दमन की कई घटनायें नीतीश कुमार के सामाजिक न्याय के फ़र्ज़ी दावे की पोल खोलती रही हैं। दलित छात्रों की छात्रवृति में कटौती, छपरा सुगौली मधेपुरा पीरो भोजपुर इत्यादि स्थानों पर भाजपा संरक्षित दंगाइयों द्वारा सांप्रदायिक दंगों की घटना और प्रशासनिक विफलता नितीश कुमार के सामाजिक न्याय की असलियत है लेकिन नितीश कुमार की जावाबदेही कौन तय करेगा।


भागवत झा आज़ाद जगन्नाथ मिश्रा जैसे कांग्रेसी छद्म धर्म निरपेक्ष मनुवाद के पोषकों के विकल्प के तौर पर बिहार की जनता ने जे पी के समाजवादी गर्भ से निकले लालू नितीश जैसे रहनुमाओं को न सिर्फ सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा दिया, बल्कि इनसे भावनात्मक रूप से जुड़ गई पर सच तो यह है कि अवसरवाद, परिवारवाद और विलासपूर्ण जीवन शैली के मानसिक गुलाम बन कर इन नेताओं ने जनता का भावनातमक शोषण किया और सत्ता के मद में चूर स्वर्ण सामंतियों के आलाकार बन कर दमनकारी राजनीति में विश्वास करना शुरू किया और सामाजिक न्याय का एक सुनहरा फरेब गढ़ कर आमजनमानस को विश्वास दिलाने में सफल रहे कि वे आम आदमी के राजनीतिक प्रतिनिधि हैं। 


आम जनता में बदलाव की उमीद तो जगी परन्तु इन अवसरवादी नेताओं ने राजनीतिक नेतृत्व के परिवर्तनवादी विकल्प के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर नवसामन्ति मनुवादी सत्ता का वह स्वरूप पेश किया है जो दंभ और यथास्थितिवाद का बड़ा वीभत्सतम रूप है। इन्होंने जनता को छलना शुरू कर दिया है और जिस सामन्ती क्रूर व्यवस्था के विकल्प बन कर ये सामने आये थे सत्ता सुख और भौतिकतावाद के सामने नतमस्तक हो कर उसी हिंसक, दमनकारी व्यवस्था को समाजिक न्याय के इन स्वघोषित राहनुमाओं ने आत्मसात कर लिया है।


नीतीश कुमार ने तो संघ जैसे अतिवादी जातिवादी वर्ण व्यवस्था की पोषक और संरक्षक संगठन की राजनितिक इकाई भाजपा के साथ साझी सरकार चलाई और सामाजिक न्याय का दम्भ भरते रहे हैं। समय है की जनता को अपनी शक्ति का एहसास करवाने के लिए वातानुलित चेम्बरों वाले नहीं बल्कि झोंपडी और नमक रोटी वाले युवा नेतृत्व को स्वीकारना होगा और एक रणनीति बना कर क्रियान्वित करना होगा तभी आने वाली पीढियां हमें माफ़ कर पाएंगी। भ्रष्ठ नौकरशाही, दमनकारी राजनीती और पूंजीवादी मीडिया का कॉकटेल इस तन्त्र को इस तरह जकड़ चुका है के परिवर्तन के लिए संघर्ष की आवश्यकता आलिशान होटलों के अंदर आयोजित सेमिनारों से नही बल्कि गांव और खेतों में जागरूकता अभियान चलाने की है। 

 

(लेखक नेशनल मूवमेंट फ्रंट और दलित पिछड़े अल्पसंख्यक मोर्चा जैसे सामाजिक संगठनों के संस्थापक सदस्य हैं।)

 


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