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एंटी रोमियो दल की परवाह किए बिना लेखक ने सरेआम किया प्यार का इजहार

Created By : अमोल सरोज Date : 2017-04-20 Time : 17:55:39 PM


एंटी रोमियो दल की परवाह किए बिना लेखक ने सरेआम किया प्यार का इजहार

हैल्लो, बोलना और लिखना दो जुदा मसले हैं,बोलना मेरा फ़ील्ड नहीं है,लिखने में मैंने प्रैक्टिस की हुई है, चाहे वो प्रैक्टिस ग़लत हिंदी लिखने की ही हो,पर लिखने में फिर भी प्रैक्टिस है। बोलने की तो है नहीं, न सही बोलने की, न ग़लत बोलने की। पर आज तो बोलना है ही, तो मैं सबसे ज़रूरी बात सबसे पहले कहना चाहता हूँ। किताब और सोशल मीडिया पर बात फिर भी हो सकती है । योगी जी की तर्ज़ पर खट्टर जी ने भी प्रेमियों को सबक सिखाने के लिये कमर कस ली है। इससे पहले की "आई लव यू" कहना ही देशद्रोह हो जाए, मैं कहना चाहता हूँ कि मैं निशा से बहुत-बहुत प्यार करता हूँ। प्यार ही मेरे लिखने का एकमात्र कारण है। 

 

मैं उन बरगलाए हुए नवयुवकों को भी कहना चाहता हूँ, जो जवानी में माँ-बाप से प्यार करते हुए 14 फरवरी मनाते हैं। जो जवानी में माँ-बाप से प्यार करते हैं, लोग उन्हें बुढ़ापे में आसाराम कहते हैं। ठरक या नॉर्मेल्टी में आपको क्या चुनना है आप देख लीजिए। एक बात और भी ज्ञान की बताता हूँ। सामान्य होना अब तक देश में गुनाह घोषित नहीं हुआ है और इस पर अभी जेटली जी ने टैक्स भी नहीं लगाया है। मैं इस देश के बच्चों के माँ-बाप से भी कहना चाहता हूँ कि बच्चों से प्यार की अपेक्षा करने की बजाय आपस में प्यार करने की कोशिश करें,ज़्यादा मुश्किल नहीं है । 

 

आसमान में चाँद 60 की उम्र में भी वैसा ही होता है जैसा 25 की उम्र में दिखता है। ये कॉपी जो आपने राम नाम लिख के भरी हुई है, वो अपनी प्रेमिका के लिए कविता लिखते हुए भी भरी जा सकती है, जिसने अपनी सारी ज़िंदगी आपके जूठे बर्तन से लेकर आपके कच्छे धोने में बिता दी। 70 साल की उम्र में जब गुलज़ार लिख सकता है, दिल तो बच्चा है जी। तो आपको क्या हुआ है? गुलज़ार से सीखिए कुछ। आप अपने बच्चों के आगे अपने बोया, वो क्या कहते है अंग्रेजी में, बैटर हाफ़ से प्यार जताएंगे, तो बच्चे भी ढंग से प्यार करना सीखेंगे। मैं बोल रहा हूँ इस देश के बच्चों के माँ- बाप जिस दिन आपस में प्यार करना सीख जाएंगे देश का भला हो जाएगा। अपने लिए नहीं तो देश के लिए कर लीजिए।


यहाँ मुझे फ़ेसबुक पर बोलना है। फ़ेसबुक पर मैंने पन्द्रह-बीस दिन पहले एक पोस्ट डाली थी, जिसमें तोतलापन का मज़ाक न उड़ाने की बात कही थी। नॉर्मल सी पोस्ट थी, उस पोस्ट के लिए बहुत से दोस्त नाराज़ हो गए। अधिकतर दोस्तों का तर्क था कि मज़ाक से आहत नहीं होना चाहिए, हँसना बहुत ज़रूरी है ज़िन्दगी के लिए। अब तोतलापन, रंग या जाति पर मज़ाक न करें तो हम हँसे कैसे? मुझे देर से ही सही, बात समझ आ गई। हँसना ज़रूरी है। अब ठीक है ना, जो सवर्ण है , मर्द है ,रंग गोरा है, साफ़-साफ़ भी बोलता है, उसके हँसने के लिए ठीक है। पर एक लड़की जो सवर्ण नहीं है, रंग गोरा नहीं है, आवाज़ साफ़ नहीं है उसे इन चुटकुलों पर हँसी नहीं आएगी। 

 

मेरी कोशिश उन्हें हँसाने की ही है और मैं किसी मुग़ालते में नहीं हूँ। कोई समाज सेवा या देश सेवा नहीं है। मैंने बस अपना पाठक वर्ग तय किया है, अपनी क़ाबिलियत के अनुसार। सवर्ण मर्दों को हँसाना भले ही कम मेहनत का काम हो, पर वहाँ ज़लील होने की सम्भावना ज़्यादा है। वो क्रूर लोग हैं। अगर पाँच दिन हँसाने के बाद एक दिन हँसा नहीं पाए तो वो ज़लील करने में वक़्त नहीं लगाते। मैंने अपना पाठक वर्ग जो चुना है, वो मानवीय है, संवेदनशील है, बात को समझते हैं। अब आज मैं बोल रहा हूँ। यहाँ लड़कियाँ बहुत हैं, सवर्ण मेंटालिटी के मर्द भी कम ही है । मैंने शुरुवात में ही कहा कि मैं अपनी प्रेमिका से बहुत प्यार करता हूँ, बात कुछ भी नहीं थी। आप सब ने समझ लिया कि बंदा पहली बार स्टेज पर आया है अपनी शरीके हयात का नाम लेकर नॉर्मल होने की कोशिश कर रहा है। आपने हौसला अफ़ज़ाई करते हुए तालियाँ बजाई। मैं भी थोड़ा नॉर्मल हुआ। पर अगर ये महफ़िल सवर्ण मर्दों की होती तो क्या मैं ऐसा बोल सकता था? शायद इतनी गालियाँ पड़ती कि मुझे स्टेज अगले ही मिनट छोड़ना पड़ता। कैसे-कैसे कमेंट आ सकते थे ?

 

"तेरी लव स्टोरी नहीं सुनने आए हैं "
"थोड़ा प्यार हम भी कर लें ?"
"ऐसी तो कुछ है भी न ऐश्वर्या राय"

 

मैं बहुत चालाक आदमी हूँ। जानबूझकर ऐसे पाठक चुने हैं, जो प्यार-मोहब्बत में विश्वास रखते हैं। मैं व्यंग्य लिख सकता हूँ। थोड़ा बहुत हँसने-हँसाने की कोशिश कर सकता हूँ पर मैं पागलों का डॉक्टर नहीं हूँ। मेरा अहम मक़सद अपने लोगों के चेहरे पर हँसी लाना है। अगर उनके चेहरे पर हँसी देख कर कोई अपने आप को अपमानित महसूस करता है, ज़लील हुआ महसूस करता है, तो ये बोनस है। ये मेरा प्राइम मोटिव नहीं है। मेरा पक्ष और मेरा ईमान सिर्फ़ मेरे पाठकों के लिए है, मेरे अपने लोगों के लिए है। दूसरे पक्ष के लोगों के लिए मेरे पास शुभकामनाएँ भी नहीं हैं ,उनको आहत करने का वक़्त भी नहीं है। पर जो हमारी हँसी देख कर आहत होते हैं उनका हम कुछ कर भी नहीं सकते। हमें कुछ करना भी क्यों है? कुछ काम जाने-अनजाने में ही, अगर सही हो रहा है तो दिक़्क़त  क्या है ?

 

अब मैं जो लिखता हूँ, उसे क्या कहा जाए मैं नहीं जानता पर मुझे इतना पता है कि मैं जो लिखता हूँ वो ज़्यादा मेहनत का काम नहीं है। किसी महान लेखक ने कहा है जब आप सच्चे दिल से व्यंग्य लिखने की कोशिश करो तो सारे अखबार, देश की सरकार, सारे नेता, अभिनेता सब पूरी शिद्द्त से आपको व्यंग्यकार बनाने में लग जाते हैं। मैं आपको मेरे दो व्यंग्य सुनाता हूँ। 

 

"अख़बार में ख़बर है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है आधार कार्ड मेंडेटरी नहीं है। अख़बार झूठ नहीं बोलते। पर पैन कार्ड बनवाने में आजकल आधार कार्ड माँगते हैं। स्कूल वाले आधार कार्ड माँगते हैं। सिम लेने के लिए भी आधार कार्ड की ज़रूरत पड़ती है। पर शायद ये सब काम जनहित के नहीं हैं। अभी बहुत से काम हैं, जहाँ आधार कार्ड की ज़रुरत नहीं है। यूनिवर्सिटी में अगर बच्चों को पुलिस के डंडे खाने हैं, तो आधार कार्ड आज भी नहीं माँगा जाता। ख़ुदकुशी भी बिना आधार कार्ड के कर सकते हैं। बहुत से काम हैं जिनके लिए आधार कार्ड की ज़रुरत नहीं है।"

 

"आज आपको अपनी ख़ुदकुशी की कहानी सुनाता हूँ जो मैंने तीन साल पहले की थी। शायर लेखक कई बार मर सकते हैं इसमें आश्चर्य की बात नहीं है। हाँ तीन साल पहले मैं प्राइवेट जॉब करता था। वहां बड़े-बड़े अधिकारियों के एच. आर. डिपार्टमेंट से बोर होकर उनके दरवाजे़ आगे लिख दिया "आई क्विट" ऐसा नहीं था कि वो कोई बड़े तीसमारखाँ थे जिनसे मैं मुक़ाबला नहीं कर सकता था पर उन लोगों से लड़ने का दिल नहीं था। कौन क्या पहन के आया है, कौन लड़की किससे बात कर रही है? सारे दिन बेमतलब की बात। उस लेवल तक मैं जाना नहीं चाहता था तो बोर होकर ख़ुदकुशी कर ली। खुदकुशी के बाद देखता हूँ वो सब लोग आँखों में इतने मोटे-मोटे आँसू लेकर रो रहे थे। एक तो मेरे पास ही आ गया "अमोल मेरे बच्चे। ऐसा क्यों किया। तू एक बार मेरी बात सुन ले अगर तुझे पसंद ना आई तो मैं अपना सर काटकर तेरे क़दमों में रख दूँगा। "

 

मैं बोला," भाई कदमों में रखने की जरुरत नहीं है, हम कामरेड हैं छुआछूत में विश्वास नहीं रखते। मेरे हाथ में ही दे दियो। मैं खुश हो जाऊँगा।" ये बात सुनते ही वो भाग गया। अब वो सब इस बात से दुखी हैं कि मैं मर के भी मरा नहीं हूँ। तो व्यंग्य लेखन मेहनत से ज़्यादा नीयत माँगता है। आपकी नीयत साफ़ है। आपका ईमान अपने लोगों के लिए है तो आधा रास्ता आपने तय कर लिया है। आगे का रास्ता ज़्यादा मुश्किल नहीं है। 

 

अब आज के विषय पर बात करूँ सोशल मीडिया अवसर या आफ़त। तो अवसर के बारे में तो कुछ बताने की शायद ज़रूरत नहीं है। आप सब मेरी क़िताब पर चर्चा के लिये यहाँ आये हुए हैं। फ़ेसबुक से पहले कभी मैंने एक लाइन नहीं लिखी थी। सात सालों में मेरी ख़ुद की किताब आ गई है। फ़ेसबुक से पहले ज्योतिबा फुले ,सावित्री फुले किसी का नाम तक नहीं सुना था। मुझे अचरज होता है फ़ेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म के आफ़त होने का किसी ने सोचा भी कैसे। किताब-विताब छोटी बात है। मेरी एक दोस्त है आज आ नहीं पाई यहाँ। जॉइंट फ़ैमिली में रहती है । हम सब फ़ेसबुक के ज़रिए जुड़े और हम घूमने ट्रैकिंग पर गए। पहाड़ों पर दस किलोमीटर की चढ़ाई चढ़े रात को इतनी सर्दी कि लगा खेल ख़त्म । जॉइंट फ़ैमिली की बहू की कौन कहे मैं ख़ुद ही कभी पहाड़ों पर नहीं गया था, फ़ेसबुक के दोस्तों के साथ दो बार जा आया।

 

फेसबुक किसी भी तरह से आफ़त नहीं है, इसे आफ़त बनाने की कोशिश की जा रही है, वैसे ही जैसे शिवसेना क्रिकेट की पिच खोद जाती है। कौन लोग हैं जो इसे अफ़वाहों का अड्डा बना रहे हैं? कौन लोग हैं जिन्होंने इसे देवा की अदालत बनाया हुआ है? कौन लोग हैं जो लड़कियों के इनबॉक्स में अकेलेपन की गुहार लगाते हैं? ये जो भी लोग हैं, वो ये सब अनजाने में तो नहीं कर रहे हैं। कमाल की बात है ये सब काम करने वालों की आप पहचान करोगे तो 75 परसेंट वो मिलेंगे जो फेसबुक से पहले साहित्य नाम की अदृश्य संस्था से जुड़े हुए थे। शुरुवात में शिकायत की अब सब कचरा लिख रहे है, 2009 से पहले क्या कमाल लिखा जाता था। किसी ने ध्यान न दिया। फिर ख़ुद लिखने लगे। उससे भी चैन ना आया तो यहाँ अदालत चलाने लगे। बड़ा आसान है ना दूसरे के ग्राउंड को ही ख़राब कर दो, वो खेलेंगे कैसे ? 

 

पर हम सब देख रहे है सबको गिन रहे हैं। हमें अच्छे से पता है हमारे दुश्मन फ़ेसबुक पर गालियाँ देने वाले उतने नहीं है, जितने ये अफ़वाह और कोर्ट चलाने वाले प्रगतिशील। फ़ेसबुक हमारा है और इसे हम गंदा नहीं होने दे सकते हैं। आप सुधर जाइए वरना आप की निजी-सभा में जितने लोग आते हैं, हमारी इस दुनिया में भी आपके उतने ही दोस्त रह जाने हैं।

 

 

दुर्घटना से देर भली 

बोलने को तो बहुत कुछ है पर अब कुछ याद नहीं आ रहा। आप सबका बहुत शुक्रिया मुझे सुनने के लिए। हाँ, याद आ गया मुझे किताबों पर बात करनी है। किताब बेचने पर बात करनी है। मेरे बहुत से दोस्त मेरे किताब बेचने पर बात कर रहे है कुछ बहुत खुश है। कुछ हक़ से बोल रहे हैं कुछ व्यंग्य कर रहे हैं, कुछ मज़ाक करने की कोशिश कर रहे हैं। मैं सब को बताना चाहता हूँ अमोल सरोज बहुत समझदार आदमी है, 1947 के बाद मुझसे समझदार आदमी पैदा नहीं हुआ। तो मैं सब समझता हूँ पहली बात। दूसरी बात किताब लोगों के पढ़ने के लिए छापी है, बिना बेचे उन्हें पढ़ाना सम्भव नहीं है। जिस देश में अंग्रेज़ी फ़िल्मों के चैनल में एड भी हिंदी में आता हो, जहाँ सब कुछ हिंदी में बिकता हो, बस हिंदी की किताब नहीं बिकती।

 

 

पाठकों की कमी नहीं है उनके पास पहुँचने के प्रयास में कमी है। हमारे जैसे लोग जो ज़्यादा कुछ विद्रोह नहीं कर सकते वो किताब तो बेच ही सकते हैं। अपनी पर्सनल लायब्रेरी में रखी किताबें कुछ काम नहीं आने वाली। जो किताब आपको एक बार पढ़के समझ नहीं आई वो दोबारा भी नहीं समझ आनी। जो किताब आपने अब तक नहीं पढ़ी उसे आगे पढ़ोगे इसमें भी शक है। छोटी-सी तो ज़िंदगी है। किताबों को घूमने दीजिए, किताबों की ज़रूरत है देश को। रेल में, बस में जहाँ मौका मिले अपनी किताबें बेच दीजिए। एक बात याद रखिए लायब्रेरी किताबों के लिए होती है, किताबें लायब्रेरी के लिए नहीं होती।

बाक़ी तो आप सब समझदार हो । 

 

(अमोल सरोज लेखक हैं और सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं)

 

(संपादन: भवेंद्र प्रकाश)

 


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