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जब बहुजन एक हो रहे थे, तब EVM लाने की साजिश चल रही थी....

Created By : डॉ. सुनील कुमार यादव Date : 2017-03-18 Time : 13:12:38 PM


जब बहुजन एक हो रहे थे, तब EVM लाने की साजिश चल रही थी....

11 मार्च 2017 को टीवी पर चुनावी नतीजे देख रहा था तो आचनक न्यूज़रूम से एंकर मायावती की प्रेस कांफ्रेंस की तरफ ले गया और उन्होंने अपनी हार के लिए EVM मशीन को जिम्मेदार बता दिया। लाइव प्रसारण बीच में काटते हुए एंकर ने एक एक्सपर्ट को सवाल पूछा तो जसने जवाब दिया 'खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे।' मगर मुझे बहन मायावती के बयान से पहले 2014 में जब बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम साहब ने जब देश भर में EVM विरोधी प्रबोधन शुरू किया था तब से यह जानकारी थी। तब से मैं यह जानकारी जुटाने के लिए प्रयासरत था।

 

इसी साल मैं दिल्ली गया तो संयोग से मेश्राम साहब भी दिल्ली थे, मैं उनसे मिलने के लिए गया। मैंने उनसे पहला ही सवाल पूछा 'सर इस बार बहनजी का क्या होगा?' उन्होंने मुझे कहा अब EVM का जमाना है बहन जी का कुछ नही होना है। मैंने उसी दिन उनकी बात पर यकीन कर लिया इसलिए चुनाव परिणाम के दौरान जब मायावती प्रेस कांफ्रेंस के लिए जैसे ही माइक पर आईं तो मेरे पास में बैठे साथी को मैंने तपाक से कहा कि बहन जी EVM के खिलाफ बोलेगी।

 


अब सवाल यह है कि आखिर भारत में EVM इतने विवादों के बावजूद चुनाव कंडक्ट करवाने का साधन क्यों है? यह मौलिक सवाल जिसका जवाब ढूंढना ही होगा। इस सवाल के जवाब में सारे उत्तर छिपे है। जब पूरा यूरोप इन मशीन्स को उपयोग करने से इंकार कर रहा था, उस समय भारत में पिछड़े वर्ग में बड़े पैमाने पर राजनीतिक चेतना का निर्माण हो रहा था। हम सभी जानते हैं कि भारत में आपातकाल का कारण जेपी आंदोलन नहीं था वरन् उस आंदोलन के कारण जो हाशिये पर स्थिति सामाजिक समूहों में सत्ता की लालसा पैदा हुई।

 

 

यह 1975 का दौर था। आपातकाल के बाद जो सरकार बनी उसने कालेलकर कमीशन की अनुशंषाएं लागू करने का वादा किया था जिसकी वजह भी हंगामा शुरू हुआ था। जब यह कमीशन बना था तब इस कमीशन को समझने वाला भी कोई पिछड़े वर्ग का नेता नही था। केवल बाबासाहब अम्बेडकर के कारण ही यह कमीशन बना था। मगर जेपी आंदोलन के बाद पिछड़े समुदाय में आए राजनीतिक चेतन्य ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करना शुरू किया और परिस्तिथियां ऐसी आईं कि जनता पार्टी को अपने मैनिफेस्टो में इस बात को रखना पड़ा। बाद में जनता पार्टी की सरकार बनती है और मण्डल आयोग का गठन होता है।

 

 

यहीं से EVM का खेल शुरू होता है। क्योंकि शासक वर्ग को लग रहा था अगर पिछड़े वर्गो में चेतना का निर्माण इसी गति से होता रहा तो एक दिन हमारी शासन सत्ता का अंत निश्चित है। इतना ही नहीं 1972 में कांशीराम जी ने बामसेफ बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी और यह तो समस्त दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक जनता को एक समाज कायम करने का अभियान था इसलिए उनके लिए यह और भय पैदा करने वाली बात थी।

 


इसी परिपेक्ष्य में आप अगर देखे तो 1982 में केरल विधानसभा के चुनावों में EVM मशीन को प्रयोग किया गया। शासक वर्ग ने अपनी शासन सत्ता को बचाने के लिए हजारों सडयंत्र किये उसमे सबसे बड़ा षडयंत्र EVM प्रयोग का था। इसी दौर में EVM के ऊपर आयरलैंड में विवाद चल रहा था।इसी समय ब्रिटेन की संसद ने इसे नकार रही थी। मगर भारत का चुनाव आयोग इसे भारत में लाता है।  यह वाकई कमाल की बात थी।

 


1984 में जब बसपा का उदय हुआ तो शासक वर्ग को लगा कि अग़र लोग 'बहुजन' कांसेप्ट को स्वीकार करते हैं तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी सत्ता समाप्त हो जाएगी। तब 1989 में उन्होंने 'People representative act 1951 में अमेंडमेंट करके EVM को बैलट पेपर का विकल्प बनाने की बात कही गयी।


आप यह टाइमिंग देखिये। अगर आप भारत की राजनीति के 'साम दाम दण्ड भेद' के सिद्धान्त को समझते हैं तो आप तुरन्त समझ जाएंगे कि EVM क्यों लाया जा रहा था, जबकि ठीक इसी समय दुनिया के कई देश इसको प्रयोग करने से इनकार कर रहे थे।


यह बहुत ही रोचक तथ्य है। जैसे उनको लगा है कि EVM का उपयोग उनके लिए बहुत उपयुक्त है तो पहली बार 2004 के आम चुनावों में इसे पूरे भारत में इंट्रोड्यूस किया गया। चुनाव हुए। कांग्रेस गठबंधन जीत गया। फिर EVM से चुनाव हुए 2009 में।।फिर बहुत ज्यादा अलोकप्रिय हो चुकी यूपीए सरकार चुनकर आ गयी।इस बार उसे 207 सीट्स मिली।।यह आश्चर्य का विषय था। इसी समय भाजपा के द्वारा इसका खुलकर विरोध किया गया। स्वामी इस मुद्दे को कोर्ट ले गए। देश के शीर्ष कोर्ट द्वारा 8 ऑक्टेबर 2013 को निर्णय दिया कि EVM से सही, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सम्भव नहीं है। देश की शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद अब यह विवाद का मुद्दा ही नहीं रहा कि EVM टेम्पर या हैक हो सकती है या नहीं।


अब हमें जिन सवालों के उत्तर चाहिए वह निम्न है।

1। जब शीर्ष अदालत ने मान लिया कि EVM से फ्री फेयर एन्ड ट्रांसपेरेंट चुनाव सम्भव नहीं है तो ECI ने चुनाव 2014 EVM से क्यों करवाए?


2।जब बीजेपी के नेताओ द्वारा लगाए गए केस पर शीर्ष अदालत ने यह फैसला दिया। परन्तु जब 2014 में फिर से चुनाव EVM से होने वाले थे तो भाजपा ने विरोध क्यों नहीं किया?


3। दुनिया के सुपर तकनीकी देश या तो EVM उपयोग नही करते। अगर करते है तो VVPAT मशीन के साथ। यह अधिकांशत विकासशील देशों द्वारा उपयोग में लाया जाता है। मेरी यह भी शंका है कि क्या कोई ऐसा अंतरराष्ट्रीय गिरोह है जो अपनी मनचाही सरकारें EVM के माध्यम से बनवाने में लगा है?


यह सवाल मौलिक है। पूछे जाने योग्य है।"

 

(लेखक बामसेफ के वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं।)


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