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सेना में कब खत्म होगी आत्मसम्मान को चकनाचूर करने वाली सेवादार प्रथा?

Created By : नेशनल दस्तक ब्यूरो Date : 2017-01-11 Time : 14:05:36 PM

सेना में कब खत्म होगी आत्मसम्मान को चकनाचूर करने वाली सेवादार प्रथा?

नई दिल्ली। देश में एक वर्ग हमेशा से ऐसा रहा है जिसे राजाओं की तरह शान से रहना रास आया है। यहां तक की अपने सामान्य से काम भी खुद करना गंवारा नही होता। ये मानसिकता बहुत पुरानी है जिसे आजादी के बाद भी बदला नहीं गया। जवानों को जवान नही बल्कि घरेलू नौकर बना कर रख दिया है सिस्टम ने। बाकी कसर हमारे नेता पूरी कर देते हैं।


इस बहस को एक बार फिर छेड़ने का काम किया है बीएसएफ के एक जवान तेज बहादुर यादव ने। 9 जनवरी को फेसबुक पर एक वीडियो शेयर कर बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने अफसरों पर सेना का राशन बेच देने का आरोप लगाया। इसके साथ ही बहादुर ने कुछ वीडियो पोस्ट करके दिखाया था कि जवानों को खाने-पीने के लिए ठीक खाना नहीं दिया जाता। 

 

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देश का कोई भी नागरिक सेना में जाकर देश की सेवा करने का सपना देखता है। वह सेना में इसलिए जाता है क्योंकि उसके अन्दर देश के लिए कुछ करने का जज्बा होता है। लेकिन सेना के जवानों की हकीकत कुछ और ही है। भारतीय सेना में एक लाख जवान ऐसे हैं जो फ़ौजी अफसरों की नौकरी करते हैं जैसे उनके जूते पॉलिश करना, कुत्तों को घुमाना, घरों की साफ़ सफ़ाई करना, खाना पकाना और कपड़े धोना।
 

अंग्रेजों के जमाने में भारतीय जवान अंग्रेज अफसरों के लिए यह करते थे। भारत आजाद हुआ लेकिन इस रुढ़िवादी और आरामपसन्द देश में वह प्रथा रुकी रह गई। जो जवान सीमा पर तोप और राइफल चलाने का सपना देखता है। वही सेना में आकर अफसरों के लिए सेवादार यानी अर्दली की ड्यूटी भी करता है।
 

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सेना और अर्द्धसैनिक बलों में सेवादार, अर्दली या बटमैन की परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही है। एक सेवादार का काम अफसर को उसके काम के लिए तैयार होने में मदद करना होता है, लेकिन हकीकत में उससे निजी नौकर की तरह काम लिया जाता है।

 

 

सेवादार का पहला काम अफसर के घर के हर सदस्य के जूते चमकाना होता है। उसके बाद सबको चाय देना, फिर बगीचे की सफाई करना और शौचालय साफ करना। अफसर जब काम पर चला जाता, तो वह मेमसाहब का हुक्म बजाने को बाध्य है। हफ्ते में एक दिन भी छुट्टी नहीं होती। उसे साहब के घर पर खाना भी नहीं मिलता।

 

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सेना के कठोर अनुशासन में बंधे सैनिकों के लिए यह तैनाती काफी तकलीफदेह होती है। कोई एक महीने, तो किसी को कई साल इस तरह की सेवादारी करनी पड़ती है। पूर्व सैनिक और उत्तराखंड के चमोली जिला न्यायालय में जिला शासकीय अधिवक्ता-राजस्व के पद पर काम कर रहे धूम सिंह नेगी कहते हैं, ''हर चार में एक सैनिक को सेवादारी पर लगना ही होता है। साथियों की नजर में आ जाने के कारण सेना की सेवा से बाहर आने के बाद भी सेवादारी का यह कष्ट जीवन भर सालता रहता है।''


सेना के सेवानिवृत्त जवानों का कहना है कि अफ़सरों के जूते चमकाने की परम्परा अब समाप्त हो जानी चाहिए क्योंकि यह एक औपनिवेशिक चलन था। इन पूर्व जवानों का आरोप है कि पूरी भारतीय सेना में उनकी तादात लगभग 97 प्रतिशत है, लेकिन जब बात सुविधाओं की होती है तो अफ़सरों को ही सारी सुविधाएं मिलती हैं।
 

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यही नहीं सेना के जवानों का कहना है कि सर्वेंट अलाउंस को जेब में डालकर घरेलू काम जवानों से करवाना अनैतिक है। सरकार को चाहिए कि अब यह प्रथा ख़त्म की जाए क्योंकि यह बात उस समय की है जब भारत एक उपनिवेश था। जवान कहते हैं, "तत्कालीन ब्रितानी अधिकारी जवानों को नौकर बनाकर रखा करते थे। अब भारत किसी का उपनिवेश नहीं है तब भी हम यह काम करने को मजबूर हैं।"
 

 

सेवानिवृत जवानों का कहना है कि देखा जाए तो जवानों को ज़्यादा सुविधाएं मिलनी चाहिए क्योंकि उन्हें 40 साल की उम्र में ही रिटायर कर दिया जाता है, वो भी ऐसे वक़्त जब परिवार की ज़िम्मेदारियां पूरी भी नहीं हो पाती हैं। वहीं अफसर 60 साल की उम्र में रिटायर होते हैं जब उनकी ज़िम्मेदारियां लगभग पूरी हो चुकी होती हैं।


जवानों का कहना है कि सेना को मिलने वाले राशन और आम जरूरतों के सामान को भी सेना के अफसर आधे-पौने दामों में बेच देते हैं। यही नहीं सेना कैंप के पास रहने वाले लोगों नें भी स्वीकार किया है कि सेना के अफसर उन्हें आधे-पौने दामों में सेना का सामान बेचते हैं। इससे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है।

 

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वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल भी कहते हैं-


राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए अभियान!
जवानों का राशन अफ़सर बेचते हैं या नहीं, यह तो जाँच का विषय है, लेकिन सेना, अर्धसैनिक बल, पुलिस में जारी सेवादार यानी सहायक यानी अर्दली प्रथा को सरकार बंद क्यों नहीं करती, जिसकी वजह से तोप और मशीनगन चलाने वाले जवान कई बार अफ़सरों के कुत्ते टहलाते और उनके घरों में कपड़े प्रेस करते नज़र आते हैं। अंग्रेज़ों के समय का सिस्टम था। क़ानून बनाकर पाबंदी लगाइए।
सेना का हर दसवां जवान यही कर रहा होता है। यह राष्ट्र के लिए शर्म की बात है।

 


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