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हरियाणा वह राज्य है जहां बच्चियों कि हत्या सबसे ज्यादा होती है..

Created By : डॉली बंसीवार Date : 2016-12-31 Time : 16:22:02 PM


हरियाणा वह राज्य है जहां बच्चियों कि हत्या सबसे ज्यादा होती है..

आज दंगल देखी, लोगों की फिल्म समीक्षाएं तो पहले ही पढ़ ली थी। कुछ कमेन्ट करने का मन न किया। सोचा पहले देख ही ली जावे फेर कुछ बोलें। खैर फिल्म की टेक्निकली, परफॉरमेंस, म्यूजिक, डायरेक्शन पर सब लिख चुके हैं अब तक और सबसे बड़ी बात लोग दो मुद्दों को ध्यान में रखते हुए लिख रहे हैं एक तो ये के फिल्म में फेमिनिज्म नहीं है और दूसरा ये कि एक बाप ने अपने सपने को पूरा करने के लिए बच्चियों के बचपन को बरबाद कर दिया। 


बात यहां ख़त्म न हुई, कुछ महापुरुष और महिलाएं ये भी लिख रहे हैं कि आमिर को शर्म आनी चाहिए जहां एक तरफ़ वो ‘थ्री इडियट्स’ में कह रहे थे कि बालक जो बनना चाहे उसे वो बनाओ वहीं दंगल में कह रहे हैं जो तुम चाहते हो अपने बालक को वो बनाओ। और तारे ज़मीन पर कहते हैं कि कोई बात ना है अगर आपका बालक कुछ बनना न चाह रहा तो मरण दो, कुछ मत करो। बड़ा विरोधाभास है भाई आमिर के स्कूल ऑफ़ थॉट में। 

 

खैर मेरा मन तो तभी कर रहा था इन लोगों के जवाब तभी दे दूं। बहरहाल, ये शहरों में कंप्यूटरों के सामने और मोबाइल पर बकैती करना बहुत आसान है। सड़ी हुई सोच के मैसेज फॉरवर्ड करना उससे भी ज्यादा आसान है। पहली बात तो यह कि फिल्म आमिर खान पर नहीं बनी, बल्कि हरियाणा के छोटे से गांव के एक बन्दे ‘महावीर सिंह’ पर बनी है। इसमें न तो आमिर कहीं आता है न तथाकथित फेमिनिज्म और न ही एक क्रूर बाप। फिल्म को उस परिप्रेक्ष्य से देखो जहां छोरियों का अनुपात 879 है। सोचो 2001 में 861 ही था। 

 

अब कम बुद्धि वालों को ये कैसे समझावें के हरियाणा वो राज्य रहा जहां बच्चियों कि हत्या सबसे ज्यादा होती है। जहां लड़कियों का शैक्षिक अनुपात 65.94 फीसद है और लड़कों का 84.06 फीसद है। ऐसे राज्य में जब एक बाप सारे समाज से लड़कर अपनी बेटियों को उस मुकाम तक पहुंचाता है जहाँ तुम बकैत उसके बारे में बात कर सको। ये कोई छोटी बात नहीं है साब। मैं बहुत अच्छे से समझ सकती हूं इसे, जब 12 पास करने के बाद रिश्तेदार पापा पर B.Ed करवाने का प्रेशर डाल रहे थे। 

 

तब उन्होंने सबकी बातों में न आकर मेरी पढ़ाई पर इतना पैसा खर्च किया। लोगों की बातें सुनी और सबसे बड़ी बात तब सुनी जब बम्बई में मेरी नौकरी लगी। सबने कहा कि बम्बई अच्छा शहर नहीं है, और खासकर वहां पर रहने वाली छोरियां। मुझे अब भी याद है जब मां लोगों से भरे चौक में लड़ गयी थी के हमारी छोरी ऐसे न है। 

 

मैं अपने गांव कि पहली ऐसी लड़की थी जो बम्बई नौकरी करने आई। दिल्ली में पली बढ़ी हूं लेकिन राजस्थान के छोटे से गांव से आज भी जड़ें जुडी हैं। इसीलिए सब सुनने को मिला है सबका अनुभव रहा है। 

 

बच्चे मेहनत करते हैं और जब कुछ बन जाते हैं तो नाम होता है और शोहरत होती है, लेकिन उसके पीछे सबसे बड़ा हाथ होता है उनके मां-पिताजी का। बहुत कुछ गंवाते हैं वो हमें कुछ बनाने के लिए।


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