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आज का दिन बहुजनों के लिए महत्वपूर्ण क्यों?

Created By : संतोष यादव Date : 2017-01-01 Time : 10:51:10 AM


आज का दिन बहुजनों के लिए महत्वपूर्ण क्यों?

आज का दिन हमारे लिए शायद इतना नया न होता अगर 1 जनवरी 1818 को कोरेगांव में दलितों (महार) ने अपने खुरदुरे हाँथो में तलवार न पकड़ा होता। आज ही के दिन भीमा नदी के किनारे कोरेगांव में मुठ्ठी भर ( लगभग 500) की संख्या में महार जाति की सेना ने ब्रिटिश कैप्टेन स्टाटन के नेतृत्व में घोर ब्राह्मणवादी ,मनुवादी मराठा पेशवा की 28000 की सेना को धूल चटा दी थी। 


इस युद्ध का महत्व आप इस बात से समझ सकते हैं कि इसी के बाद पेशवा ने ब्रिटिश सत्ता के सामने आत्म समर्पण कर दिया था। अछूतों के तलवार ने हिंदुस्तान के राजनीति की किस्मत पलट दी और इसी तलवार से हमारे पूर्वजों ने उस झाड़ू और मटके को भी काट दिया जो तुमने मार्शल लॉ लागू करके हमारे शरीर में बाँधा था। मनुवादियो ,तुम और तुम्हारे पेशवा तुम्हारे देवी देवता  जो सदियों से हमें अछूत बना के रक्खे थे हमारी तलवार की मार नहीं सह पाये।
              

 यह दिन सिर्फ नया दिन नहीं था बल्कि नए युग की शुरुवात थी। यह हार सिर्फ एक सेना की हार नहीं थी बल्कि एक धर्म, एक निकृष्ट व्यवस्था और न जाने कितने मिथको की हार थी, जिन मिथको के हाथ में तुमने चक्र और धनुष थमा रखा था और इन मिथको के सहारे तुमने बहुजनो का दमन किया। यह लड़ाई इस बात की गवाह है कि अगर इस जम्बूद्वीप पर किसी और धर्म का वर्चस्व होता तो लोगो में श्रेणीबद्ध असमानता न होती , लोगो के हित एक होते। 


तब कोई बाहरी शक्ति यहाँ आकर जब चाहे तब राज न करती , बौद्ध धर्म का प्रभाव जब तक रहा भारत द्वीप राजनीतिक शक्ति ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक शक्ति भी रहा।
                    

ऐसा नहीं की दलितों का यह पहला शौर्य प्रदर्शन था। इससे पहले 1750-1760 में बंगाल में क्लाइव ने दुसाध ( पासवान) जाति की सहायता से बंगाल में बड़े- बड़े नवाबों और राजओं को जमीदोज कर रहा था। इन दोनों बातों का ज़िक्र बाबा साहब डॉ. भीम राव अम्बेडकर अपनी लेखनी में भी करते हैं।


सोचो मनुवादियों तुम कितने स्वार्थी थे, अपने स्वार्थ और अमानवीय विशेषाधिकार से कितना प्यार था तुम्हें। अपने स्वार्थ के लिए तुमने अपने देश को ही मिटा दिया था। अगर दलितों के हाँथ यह तलवार पहले आयी होती तो आज यह देश विश्व का सबसे ताकतवर देश होता, ठीक वैसे ही जैसे एक दलित के लिखे संविधान की वजह से यह देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। तुम्हारे धर्म से इस देश का कितना नुकसान हुआ यह शब्दों  में बयाँ नहीं किया जा सकता।
                               

कोरेगांव की सच्चाई कुछ और नहीं बल्कि पढ़े लिखे भारतीय उच्च वर्गीय इतिहासकारो  की भी सच्चाई है । इन लड़ाइयों में अछूतों का शौर्य और विजय न जाने कितने अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर दे देते, न जाने कितने अनसुलझे, अनचाहे सवालो को हल कर देते। भारत हमेशा गुलाम क्यों रहा, एक गया तो दूसरा आया और यह सिलसिला उस समय तक चलता रहा जब तक आधुनिक सिद्धान्त ने युद्ध और एक देश का दूसरे देश पर कब्ज़ा गैर जरूरी बना दिया। इन सब सवालो का जवाब यह युद्ध है ।
                 

इतिहास चाहे लेफ्ट का हो या राईट का उनके पन्नो में इसका ज़िक्र शायद ही मिले। 1 जनवरी  के दिन देश विदेश से दलित कोरेगांव आते है और यहाँ पर बने विजय स्तम्भ  को सलाम करते है। यह विजय स्तम्भ ब्रिटिश ने बनवाया था जिस 22 महार बहादुर सैनिको के नाम लिखे है। बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर जब तक ज़िंदा थे यहाँ 1 जनवरी को जरूर आते थे। 


1 जनवरी 1927 को यहाँ एक बड़ा सम्मलेन हुआ जिसको बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने संबोधित करते हुए कहा-" जो लोग अपने लोगो का इतिहास भूल जाते ऐसे लोग कभी इतिहास नहीं बना सकते और इसलिए हमें अपने बहादुर पूर्वजों को याद रखना आवश्यक है, उनको याद करने से हमें अपने अस्तित्व और आत्म सम्मान का एहसास होता है, हमारे पूर्वजो को जब भी मौका मिला ऐ लोग पूरी शिद्दत, ईमानदारी और बहादुरी से लड़े।
                

कोंकण क्षेत्र में शिवाजी और उनके बॉडीगॉर्ड जीवा के बारे में एक मराठी कहावत प्रसिद्ध है जिसका अर्थ होता है " साथ था जीवा इसलिए बच गए शिवा (शिवाजी)"। जब अफजल खान ने शिवाजी को मारने की कोशिश की थी तब भी जीवा वहाँ था। जीवा दलित था, जाति का नाई था और शिवाजी का सबसे ज्यादा विश्वास पात्र और क़रीबी था।    


शिवाजी ने इस मराठा साम्राज्य की नींव वहाँ हुई भक्ति आंदोलन के समता और समानता के आधार पर रखी थी, जिसमे हर जाति और धर्म के लोगो का योगदान था। भगवाधारियों ने इस व्याख्या को दूषित करने की हर संभव कोशिश की है। शिवाजी ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की नींव रखी थी। शिवाजी सामंतशाही सेना पर निर्भर नहीं थे बल्कि सेना को वेतन देते थे । बाद में चितपावन ब्राह्मण पेशवाओ ने इसके मूलभूत सिद्धान्त को ही चौपट कर दिया। इस लिए मराठा साम्राज्य में दलितों का बहुत बड़ा योगदान था, जिसको बाद में ब्राह्मणवादी शक्तियों ने हथिया लिया।
                   

इस देश की एक- एक इंच ज़मीन जो भी जोती गया हम दलितों ने जोता, पहाड़ तोड़कर रास्ता हमने बनाया, जानवर हमने पाले जिनके दूध से तुम्हारा भगवान स्नान करता है, मकान और महल का एक एक ईंट हमने रखा, तुम्हारे पवित्र नदियों का पुल हमारे सीने पर टिका हुआ है, एक -एक तलवार, भला, तीर हमने बनाया जो तुम्हारे देवताओ ने हमारे सीने में घोप दिया। 


और जब इन हाथों ने तलवार थामी तब तुम्हारा सर ज़मीन पर था और जब इस हाथ ने कलम थामी तो नए भारत का संविधान मिला। और तुम कितने मगरूर थे कितने दंभी थे कि तुमको पता ही नहीं चला की न जाने कितने एकलव्य पैदा हो चुके थे जिनका अंगूठा तुम नहीं काट पाये, और अब संविधान की बदौलत ये सिलसिला चलता ही रहेगा।

 

लेखक- संतोष यादव, एडवोकेट और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, यह लेखक के निजी विचार हैं. 


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