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5 साल की भाजपा सरकार में दलितों पर अत्याचार की पूरी कहानी, क्या बदलेगी इतिहास

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(Image Credits: The Asian Age)

इस बार के लोकसभा चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा रही राष्ट्रवाद, जिसने विकास को पीछे छोड़ दिया राष्ट्रवाद का मुद्दा भगवा रंग में कुछ इस तरह घोला गया है की उसके कारण राजनीती में जाति और धर्म अब पहले की तुलना में और अधिक सक्रिय होते नज़र आ रहे है। चार चरणों की वोटिंग के बाद अभी भी राजनैतिक पार्टियों में बहुजन समाज के वोट को अपनी ओर करने की होड़ सी लगी है।

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सभी पार्टियों की नजर उनके बड़े वोट बैंक पर है। देशभर में करीब 16 प्रतिशत दलित आबादी है, जो किसी की हार और किसी की जीत तय करती है, तो मौजूदा लोकसभा चुनाव में दलितों का रुख किस पार्टी की तरफ है?

देखा जाए तो अगर हम 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले तक उत्तर प्रदेश को छोड़ दें तो दलित कांग्रेस के परंपरागत वोटर रहे हैं. लेकिन 2014 में बाजी पलट गई, भाजपा के पाले में सारे वोट जा गिरे बीजेपी ने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। उत्तर प्रदेश में दलितों की सबसे बड़ी बहुजन समाज पार्टी भी पिछले चुनावो में फीके सी पड़ती दिखाई दी थी। वही 2019 का लोकसभा चुनाव दलितों के ऊपर ही निर्भर है।

उत्तर प्रदेश में सपा बसपा और आरएलडी का गठबंधन होने के कारण भाजपा की मुश्किलें बढ़ी है पर देखना यह है की क्या सिर्फ उत्तर प्रदेश के दलितों के भरोसे यह पूरी जंग जीती जा सकती फिर पुरे देश में भाजपा के राज में दलितों पर हुए अत्याचारों का बहुजन समाज बीजेपी को जवाब देगा या नहीं है यह एक बड़ा सवाल खड़ा होता है।

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पिछले पांच सालों में बीजेपी शासित राज्यों में ऊना, भीमा कोरेगांव जैसी घटना हुई। आरक्षण को कमजोर करने की साजिश भाजपा द्वारा रची गई। दलितों की रक्षा करने वाला कानून कमजोर हुआ। शादी में घोड़ी चढ़ने के लिए कोर्ट से लेकर स्थानीय प्रशासन तक महीनों चक्कर लगाने पड़े। रोहित वेमुला वाली घटना ने भाजपा पर सवाल खड़े किये।


जनवरी 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला ने खुदकुशी कर ली। वेमुला के इस कदम ने पूरे देश को हिला दिया और यहीं से केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ दलित संगठन एकजुट होने लगे। संसद में विपक्षी पार्टियों ने रोहित वेमुला को दलित बताते हुए तब की शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी और केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय को घेरा।

यह मामला ठंडा भी नहीं पड़ा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात के ऊना में कम से कम चार दलित युवकों को उच्च जाति के लोगों ने बदन से कपड़े उतारकर और गाड़ी से बांधकर पिटाई कर दी। इन युवकों का गुनाह सिर्फ इतना था कि ये मरी हुई गाय का खाल निकाल रहे थे। इसी दौरान कथित गौ रक्षकों ने उन्हें पकड़ लिया. परंपरागत तौर पर दलितों का एक वर्ग चमड़े का काम करता रहा है।

दलितों की पिटाई का वीडियो वायरल होते हुए एक बड़ा हंगामा खड़ा हो गया। विपक्षी पार्टियों को बड़ा मुद्दा मिल गया। संसद कई दिन बाधित रहा। विपक्ष ने बीजेपी की सरकार पर दलित विरोधी होने के आरोप लगाए। ऊना के बाद दलितों ने गुजरात में आंदोलन किया जिसका नेतृत्व जिग्नेश मेवाणी कर रहे थे। जिग्नेश ने जमकर कन्हैया कुमार का प्रचार-प्रसार किया और कई दिन तक बेगूसराय में डटे रहे। उना के बाद भी कई बार कथित गो रक्षकों के द्वारा दलितों को निशाना बनाया गया। इंडिया स्पेंड वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 से 2018 तक लिंचिंग के शिकार हमेशा दलित और मुस्लिम वर्ग रहा है।

दलितों के खिलाफ बढ़े अत्याचार पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बयान दिया. उन्होंने कहा, “यदि हमला करना है तो मुझ पर करो, दलितों पर नहीं, यही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसके बाद कई मौकों पर संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर का जोर-शोर से जिक्र किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने बाबा साहेब आंबेडकर का नाम लेकर दलितों को अपनी ओर करने की नीति बनाई। वह बाबा साहेब का नाम अपनी सभाओ में लेने लगे ताकि दलितों के प्रति उनका विश्वास बना रहे। वही जमीनी स्तर पर प्रधानमंत्री दलितों पर बढ़ते अत्याचार को भूल गए और इन सब के बीच उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दलित और राजपूत समुदाय के बीच डीजे बजाने को लेकर विवाद शुरू हुआ, हिंसा हुई और कई दिनों तक तनाव की स्थिति बनी रही। इस मामले में उत्तर प्रदेश ने दलित कार्यकर्ता और भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद को गिरफ्तार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस एकतरफा कार्रवाई कर रही है।

दलितों में ऊबाल बढ़ता गया. 31 दिसंबर 2017 और 1 जनवरी 2018 की रात को महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलित और मराठा का एक वर्ग आमने-सामने आ गया। इसपर महीनों विवाद चलता रहा। बाद में महाराष्ट्र पुलिस ने मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया। दलित संगठनों ने आरोप लगाया कि संभाजी भिंडे को गिरफ्तार करने की बजाय पुलिस दलितों के लिए काम करने वालों को गिरफ्तार कर रही है। इन सब के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग का जिक्र करते हुए तुरंत गिरफ्तारी के प्रावधान को हटा दिया।

भाजपा की एक और दलित विरोशी नीति सामने आ गई कांग्रेस, बीएसपी समेत तमाम पार्टियों और दलित संगठनों ने मोदी सरकार पर एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने के आरोप लगाए। यही नहीं तब बीजेपी की सांसद रहीं सावित्री फूले, उदित राज ने खुलकर एससी-एसटी एक्ट के पक्ष में वकालत की. आज दोनों ही नेता कांग्रेस में है। 2 अप्रैल 2018 को फिर दलित सड़कों पर उतरे इस दौरान दूसरे वर्ग के लोगों से झड़पें हुई। सबसे अधिक तनाव की स्थिति मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में थी। हिंसा में कम से कम 13 लोगों की जान गई. अंतत: मोदी सरकार को एससी-एसटी एक्ट के पुराने रूप को बहाल करना पड़ा।

विपक्षी पार्टियों ने 13 प्वाइंट रोस्टर का मुद्दा भी उठाया और इसकी जगह यूनिवर्सिटी में पुराने 200 प्वाइंट रोस्टर लागू करने की मांग की। सरकार को मजबूरन विपक्षी पार्टियों की मांगें माननी पड़ी। इन सब के बीच मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ राजस्थान, तेलंगाना समेत कई राज्यों में चुनाव हुए। इन चुनावों में दलित समुदाय का मुद्दा महत्वपूर्ण साबित हुआ। अब एक बार फिर देशभर में चुनाव हो रहे हैं। अब 23 मई को परिणाम के बाद देखना दिलचस्प होगा कि इन सभी घटनाओ को देखते हुए दलितों के वोटिंग पैटर्न पर कोई असर पड़ा है या नहीं?

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