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एमनेस्टी इंडिया के रिपोर्ट के अनुसार दलितों के साथ होने वाले अत्याचारों में तीसरे साल भी उत्तर प्रदेश प्रथम स्थान पर

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(Image Credits: idsn)

भाजपा सरकार के राज में देश कितनी तरक्की कर रहा है यह तो सभी जानते है। अपने आप को जनता का हितेषी बताने वाली मोदी सरकार के राज में कितने जुर्म हो रहे है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इन्ही मुद्दों में से सबसे बड़ा मुद्दा है समाज और जाति जिसे लेकर लोग अक्सर मारपीट करते है यहाँ तक की जान भी ले लेते है।

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अक्सर दलितों के साथ सवर्ण जाति के लोग छोटी से छोटी बात को लेकर मारपीट करते है। चाहे वह शादी को लेकर हो या पानी को लेकर। यही सुनने में आता है की दलित की पिटाई कर दी गयी है। सिर्फ घृणा के चलते अगड़ी जाति के लोग दलितों के साथ मारपीट करते है। सबसे ज्यादा घटनाएं यूपी से सामने आती है। योगी राज में दलितों पर हो रहे उत्पीड़न का मामला कम नहीं बल्कि बढ़ गया है। यह हम नहीं एक सर्वे रिपोर्ट बोल रही है यूपी में दलितों पर अत्याचार बढ़ गया है।

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंडिया ने मंगलवार को जारी की गयी नई रिपोर्ट में बताया है कि 2018 में देश में हाशिये के लोगों, खासतौर पर दलितों के ख़िलाफ़ घृणा अपराध के कथित तौर पर 200 से ज़्यादा मामले सामने आए। इस तरह की घटनाओं में उत्तर प्रदेश लगातार तीसरे साल टॉप पर है। एमनेस्टी इंडिया ने अपनी वेबसाइट पर रिकॉर्ड जारी करते हुए कहा कि हाशिये के समुदायों के ख़िलाफ़ घृणा अपराध के मामले सामने आए, जिनमें दलित एवं आदिवासी, जातीय या धार्मिक अल्पसंख्यक समूह, ट्रांसजेंडर व्यक्ति तथा प्रवासी शामिल हैं।

वर्ष 2018 में वेबसाइट ने कथित तौर पर घृणा अपराध की 218 घटनाओं का आंकलन करते हुए दस्तावेज बनाया है। इनमें से 142 मामले दलितों, 50 मामले मुसलमानों और आठ-आठ मामले ईसाई, आदिवासी और ट्रांसजेंडरों के ख़िलाफ़ हैं। यह संकलन अंग्रेज़ी और हिंदी मीडिया में रिपोर्ट किए गए मामलों पर आधारित है।

एमनेस्टी इंडिया का कहना है कि 97 घटनाएं हमले की हैं और 87 मामले हत्या के मामले हैं। 40 मामले ऐसे हैं जिनमें हाशिये पर पड़े समुदाय की महिला या ट्रांसजेंडर व्यक्ति को यौन हिंसा का सामना करना पड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक दलित महिलाओं ने खासतौर पर बड़ी संख्या में यौन हिंसा का सामना किया है। 40 में से 30 मामले उनके ख़िलाफ़ ही हुए हैं।


सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक गोरक्षा से जुड़ी हिंसा और ऑनर किलिंग नफ़रत अपराध की मिसालें हैं। ऐसे अपराधों में उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु और बिहार शीर्ष पांच राज्यों में शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में 57, गुजरात में 22, राजस्थान में 18, तमिलनाडु में 16 और बिहार में 14 मामले कथित तौर पर नफ़रत अपराध के सामने आए हैं।

वहीँ दूसरी और उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा 57 मामले सामने आए और यह लगातार तीसरा साल है जब यह प्रदेश सबसे ऊपर है। साल 2017 में 50 और 2016 में 60 मामले दर्ज किए गए थे। एमनेस्टी इंडिया के प्रमुख आकार पटेल ने कहा, ‘नफ़रत के चलते हुए अपराध के संबंध में सबसे पहला कदम न्याय सुनिश्चित करना होगा। यह देखना होगा कि कहां सबसे ज़्यादा लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि ये लोग एक समूह विशेष से जुड़े हैं।

पटेल का कहना है की , ‘दुर्भाग्यवश हम भारत में होने वाले घृणा-आधारित अपराधों की व्यापकता से अनजान हैं क्योंकि कुछ अपवादों को छोड़कर, देश के कानून में घृणा-आधारित अपराधों को एक अलग श्रेणी के अपराधों के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। पुलिस को इन अपराधों के पीछे छिपी पक्षपाती मंशा या इरादे को उजागर करने की तरफ कदम उठाने चाहिए और नेताओं को इन अपराधों की निंदा करनी चाहिए।

एमनेस्टी इंडिया के अनुसार, वेबसाइट पर सितंबर 2015 से हुए सभी घृणा से जुड़े अपराधों को दर्ज किया गया है, जब उत्तर प्रदेश के दादरी में कथित रूप से गोहत्या करने के लिए मोहम्मद अख़लाक़ को जान से मार दिया गया था। सितंबर 2015 से अब तक, कथित रूप से हुए घृणा-से जुड़े अपराधों के कुल 721 मामले सामने आए हैं, जिनमें से एक बड़ी संख्या दलितों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ हुए अपराधों की है।

आकर पटेल का कहना है की हमारी वेबसाइट पर दिए गए आंकड़े पूरी तस्वीर का बस एक छोटा हिस्सा भर हैं। कई मामलों की शिकायत पुलिस से नहीं की जाती है, और जब शिकायत की भी जाती है तो कई बार मुख्यधारा के मीडिया में उसकी जानकारी नहीं आती। हालांकि कुछ मामलों में आपराधिक जांच शुरू की गई है, लेकिन कई मामलों में अपराधी बच निकले हैं। पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय दिलाने के लिए अधिकारियों को और प्रयत्न करने की ज़रूरत है।

इन्ही रिपोर्ट से पता चलता है की यूपी में योगी की सरकार अपने दावों और वादों को पर खरी नहीं उतरी। जहाँ अपराध के मामले कम होने चाहिए थे वहां उनमे बढ़ोतरी होती जा रही है। इस बार भी अपराध के मामले में यूपी सबसे ऊपर है।

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