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मोदी सरकार और योगी सरकार के बीच मतभेद शुरू

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भारतीय जनता पार्टी में अब अपने ही नेताओ के बीच मतभेद की खबरे सामने आने लगी है। केन्द्र की मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के बीच एक मुद्दे पर मतभेद सामने आए हैं। आपको बता दे की योगी सरकार ने ओबीसी वर्ग की 17 जातियों को एससी वर्ग में शामिल करना का प्रस्ताव केंद्र के आगे रखा था, लेकिन इस मुद्दे पर केन्द्र और राज्य सरकार के बीच एकराय नहीं बन सकी है।

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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के इस फैसले को केन्द्र के सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने खारिज कर दिया था। बीती 2 जुलाई को थावर चंद गहलोत ने संसद में इसकी जानकारी देते हुए इस प्रावधान को ‘असंवैधानिक’ बताया था। हालांकि योगी सरकार अभी भी अपने स्टैंड से पीछे हटने को तैयार नहीं है। जब अपनी ही सरकार द्वारा योगी के इस फैसले को  ‘असंवैधानिक’ करार दे दिया गया उसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी ही सरकार से नाराज़ है। 

इकॉनोमिक टाइम्स की एक खबर के अनुसार, यूपी सरकार के प्रवक्ता का कहना है कि ‘यह मामला अभी विचाराधीन है। समाज कल्याण विभाग द्वारा दिया गया फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अंतरिम आदेश के अनुसार ही है। यदि उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश को पढ़ेंगे तो यह खासतौर पर कहता है कि सभी जातियों को जाति प्रमाण पत्र इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार ही दिए जाएंगे। अब कोर्ट आगामी 12 जुलाई को इस मुद्दे पर सुनवाई करेगा।’

उत्तर प्रदेश सामाजिक कल्याण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अभी किसी को भी जाति प्रमाण पत्र नहीं दिए गए हैं। वहीं सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि ‘यह बेहद ही संवेदनशील मुद्दा है और हम अदालत के आदेश की स्टडी कर रहे हैं और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि राज्य सरकार ने ऐसे आदेश क्यों जारी किए?’

बीते 24 जून को उत्तर प्रदेश के सामाजिक कल्याण विभाग ने जिलाधिकारियों और डिविजनल कमिश्नर को इलाहाबाद हाईकोर्ट के 29 मार्च, 2017 वाले  फैसले के तहत जाति प्रमाण पत्र जारी करने के निर्देश दिए थे। निर्देशों के अनुसार, जिन जातियों को जाति प्रमाण पत्र दिए जाने थे, उनमें कश्यप, राजभर, धीवर, बिंद, कुम्हार, केहर, केवट, निषाद, भार, मल्ला, प्रजापति, धीमर, बाथम, तुरहा, गोदिया मांझी और मछुआ जैसी जातियां शामिल हैं। बसपा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा ने इस मुद्दे को राज्यसभा में उठाया था। जिस पर जवाब देते हुए केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय ने योगी सरकार के इस प्रावधान को खारिज कर दिया था।


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