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पिछले पांच सालों के दौरान देश में रोजगार के बेहद ही कम मौके पैदा हुए

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(Image Credits: Daily Sabah)

मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान जनता से अनेको वायदें किये थे। लेकिन सरकार उन सभी वादों में से एक को भी पूरा नहीं कर पाई। सरकार ने देश के हर लोगो के खाते में 15- 15 लाख रुपए देने की बात कही थी। इसके साथ देश में काला धन रखने वालो और भ्रस्टाचार करने वालो पर भी कार्रवाई करने की बात कही थी। काले धन के साथ सरकार ने हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का भी वायदा किया था।

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परन्तु अब सरकार का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है, और सरकार अपनी विफलताओं को छुपाने की कोशिश में लगी है। क्यूंकि सरकार यह भली भाति जानती है की अगर उनकी विफलता लोगो के सामने आती है तो चुनाव में उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है।

इसी प्रकार सरकार इस बार भी अपनी विफलता छिपाने के लिए रोजगार को लेकर एक रिपोर्ट को छिपाने में लगी है। दरअसल हाल ही में NSSO द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में सामने आया है की देश में पुरुष कामगारों की संख्या घट रही है। साल 2017-18 में NSSO द्वारा किए गए Periodic Labour Force Survey (PLFS) में खुलासा हुआ है कि साल 1993-94 के बाद 2017-18 में पुरुष कामगारों की संख्या में 28.6 करोड़ की गिरावट आयी है।

रिपोर्ट के अनुसार साल 1993-94 में यह संख्या 21.9 करोड़ थी, वहीं साल 2011-12 में यह आंकड़ा 30.4 करोड़ था। इस सर्वे से पता चलता है कि पिछले पांच सालों के दौरान देश में रोजगार के बेहद ही कम मौके पैदा हुए हैं।

खास बात यह है की सरकार ने NSSO द्वारा जारी की गई इस रिपोर्ट को सामने आने से रोक दिया है। यह पहली बार नहीं है जब मौजूदा सरकार ऐसा कर रही है, इससे पूर्व भी मोदी सरकार ने NSSO द्वारा देश में रोजगार को लेकर रिपोर्ट को दबाया था। सरकार के इस कदम के विरोध में नेशनल स्टेटिकल कमीशन के कार्यवाहक चेयरपर्सन पीसी मोहनन और एक सदस्य जेवी मीनाक्षी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। जिसको लेकर सरकार की आलोचना की गई इसके कारण मजबूरन ही सरकार को उसे जारी करना पड़ा।


माना जा रहा है सरकार ने दूसरी रिपोर्ट को दबाने का फैसला आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए लिया है। इस रिपोर्ट में देश के शहरी और ग्रामीण इलाकों का अलग-अलग डाटा भी दिया गया है। जिसके मुताबिक शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर 7.1 प्रतिशत रही, वहीं ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 5.8 प्रतिशत है। एक विशेषज्ञ ने अपनी पहचान जाहिर ना करने की शर्त पर बताया कि अभी इस डाटा का और अध्ययन किया जाना है, लेकिन यह बात साफ है कि नौकरियों में कमी आयी है और रोजगार के नए मौके भी पैदा नहीं हुए हैं।

NSSO के डाटा के अनुसार, साल 2011-12 से लेकर साल 2017-18 के बीच देश के ग्रामीण इलाकों में 4.3 करोड़ नौकरियां कम हुईं। वहीं इस दौरान शहरी इलाकों में 40 लाख नौकरियां कम हुई। ग्रामीण इलाकों में महिला रोजगार में 68 प्रतिशत की कमी आयी। शहरों में पुरुष कामगारों को रोजगार में 96 प्रतिशत की कमी आयी है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2011-12 से अब तक देश में कुल 4.7 करोड़ रोजगार कम हुए हैं, जो कि सऊदी अरब की कुल जनसंख्या से भी ज्यादा है।

PLFS की रिपोर्ट के अनुसार, तकनीकी शिक्षा पाने वाले कामगारों के प्रतिशत में कमी देखी गई है, जिसका सीधा असर रोजगार पर पड़ा है। साल 2011-12 से लेकर 2017-18 तक रोजगार की वोकेशनल/टेक्नीकल ट्रेनिंग पाने वालों की संख्या में 2.2 प्रतिशत की गिरावट आयी है।

मौजूदा सरकार वैसे तो ग्रामीण इलाकों में रोजगार देने की बाते करती है। परन्तु उनके ही कार्यकाल में ग्रामीण इलाकों में 4.3 करोड़ नौकरियों में गिरावट आई है, जो की बेहद दुखद है। मौजूदा सरकार में रोजगार में इतने बड़े स्तर पर कमी आना उनकी खराब नीतियों को दर्शाता है।

भाजपा सरकार वादे तो बड़ी बड़ी करती है परन्तु जब उन्हें पूरा करने की बात आती है तो, सरकार विफल शाबित हो जाती है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक एक सर्वे से पता चला है की (एलएफपीआर) लेबर फोर्स पार्टिशिपेशन रेट 2011-12 के 55.9 फीसदी की तुलना में 2017-18 में घटकर 49.8 फीसदी रह गया ।

इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकनॉमिक रिलेशन की राधिका कपूर ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, यह काफी चिंता की बात है कि आप (मोदी सरकार) डिविडेंड फैक्टर का उपयोग करने में असमर्थ हैं। खासतौर पर तब, जब आपको पता है कि देश की 65 प्रतिशत आबादी वर्किंग एज ग्रुप में आती है।

इससे यह सिद्ध होता है की जो सरकार हमेशा युवाओ की बात करती है। और साथ में यह भी मानती है की देश की 65 प्रतिशत जनसँख्या की आयु 35 वर्ष से कम है। उन युवाओ को सरकार देश के भविष्य के लिए इस्तेमाल करने में असमर्थ रही है अथार्त उनको रोजगार नहीं दे पाई है।

अब जब NSSO के आकड़ो से ही ये साफ़ साफ जाहिर होता है की सरकार रोजगार देने में असमर्थ रही है तो, आये दिन सरकार द्वारा रोजगार को लेकर कौन से आकड़े जनता के सामने पेश किये जा रहे है। इससे यह शाबित होता है की सरकार लोगो के सामने रोजगार के आकड़ो को गलत तरीके से रख रही है।

सरकार द्वारा NSSO के दूसरे आकड़ो को भी दबाने का प्रयास करना उचित नहीं है। ऐसा करने से सरकार किसी और का नही बल्कि अपना ही नुकसान कर रही है। सरकार आकड़ो को छुपाकर अपनी सच्चाई को लोगो से दूर रखना चाहती है। परन्तु जनता बहुत समझदार है और वह सरकार के एक एक कारनामे को भली भाति समझती है। और समय आने पर सरकार को इसको जवाब देना भी जानती है।

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