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चुनाव आयोग ने मोदी को दिया क्लीन चिट, विपक्षी दलों ने मिशन शक्ति की घोषणा को आचार संहिता का बताया था उल्लंघन

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(Image Credits: APN Live)

तीन दिन पहले 27 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने मिशन शक्ति के नाम से अंतरिक्ष में किए गए परीक्षण को लेकर राष्ट्र को सम्बोधन किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने इस परीक्षण को देश के लिए बहुत बढ़ी सफलता बताया था। वहीं विपक्षी पार्टियों ने मोदी पर आरोप लगाया की आचार सहिंता लागु होने के बाद उनके द्वारा देश की जनता को सम्बोधन करना, आचार सहिंता के खिलाफ है।

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दरअसल, बुधवार (27 मार्च) को पीएम मोदी ने इस उपग्रह भेदी मिसाइल के सफल इस्तेमाल की जानकारी देने के लिए देश के नाम संबोधन दिया था। विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसे आदर्श चुनाव आचारसंहिता का उल्लंघन बताया था और आयोग से इसकी शिकायत की थी। विपक्षी दलों ने मोदी द्वारा किए गए इस परीक्षण की घोषणा को लेकर आरोप लगाया की ऐसा करके मोदी इसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं।

देश को संबोधित करते हुए पीएम ने बताया था कि भारतीय स्पेस एजेंसी ने ‘मिशन शक्ति’ नाम के एक ऑपरेशन में लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में बेकार पड़े एक सैटलाइट को मार गिराया है। पीएम की इस घोषणा के बाद विपक्षी दलों ने उसकी टाइमिंग पर ऐतराज जताया था। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने इसे राजनीतिक घोषणा करार देते हुए कहा था कि यह आदर्श चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन है।

ममता ने कहा, “यह एक राजनीतिक घोषणा है, जबकि इसे वैज्ञानिकों द्वारा बताया जाना चाहिए था, यह उनका क्रेडिट है। सिर्फ एक सैटेलाइट नष्ट किया गया, इसकी कोई जरूरत नहीं थी। सैटलाइट लंबे समय से पड़ा था। यह वैज्ञानिकों का विशेषाधिकार है कि यह कब करना है। हम इसकी शिकायत चुनाव आयोग से करेंगे।” उन्होंने पीएम मोदी द्बारा देश के सम्बोधन को लेकर कड़ी आलोचना करते हुए कहा की कि क्या वह अंतरिक्ष में जाने वाले हैं या स्पेस एजेंसी में काम करते हैं। ममता के अलावा कांग्रेस और सीपीआई ने भी ऐतराज जताते हुए आयोग से शिकायत की थी। जिसके बाद चुनाव आयोग ने पीएम के भाषण की कॉपी पेश करने के आदेश दिए।

प्रधानमंत्री की इस घोषणा को लेकर चुनाव आयोग द्वारा हाई लेवल मीटिंग बुलाई गई। हालाँकि इस मीटिंग में आशंका लगाई जा रही थी, की चुनाव आयोग मोदी को बिना ऐतराज जताये उन्हें क्लीन सीट दे देगा। और ऐसा ही हुआ आखिरकार आयोग ने पीएम को महज दो दिन बाद ही (29 मार्च) क्लीन चिट दे दिया। चुनाव आयोग ने, देर शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आचारसंहिता उल्लंघन से जुड़े एक मामले में की गई शिकायत को खारिज कर दिया। आयोग ने यह साफ कर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘मिशन शक्ति’ की सफलता पर राष्ट्र के नाम दिया गया संबोधन आदर्श चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है।


अगर चुनाव आयोग को उन्हें क्लीन चीट देना ही था तो, चुनाव आयोग द्वारा मोदी के राष्ट्र को सम्बोधन करने के बाद हाई लेवल मीटिंग बुलाने के पीछे क्या तर्क था। इससे तो यह प्रतीत होता है की, चुनाव आयोग द्वारा मोदी के राष्ट्र सम्बोधन के सम्बन्ध में मीटिंग बुलाना सिर्फ एक दिखावा ही था। हाल फिलहाल के समय में यह अक्सर देखा गया है की चुनाव आयोग दिखावा तो इस प्रकार करेगा जैसे वह बिल्कुल निष्पक्ष है, परन्तु सच्चाई तो यह है की अब चुनाव आयोग में स्वतंत्र रूप से फैसले लेने की क्षमता नहीं रही है।

मौजूदा सरकार आचार संहिता लागु होने का बाद किसी न किसी रूप से अभी भी पार्टी का प्रचार कर रही है। हाल ही में एयर इंडिया और रेलवे के यात्री टिकट में मोदी की तस्वीर का देखा गया था। जिसे लेकर चुनाव आयोग ने इस पर जवाब भी माँगा था, परतु अभी भी एयर इंडिया के टिकटों में मोदी की तस्वीर होने की बात कही जा रही है। विमानन मंत्रालय का चुनाव आयोग द्वारा लागु की गई आचार संहिता का उल्लघन करने से यह ज्ञात होता है। की मौजूदा सरकार को किसी भी संस्थानों या उनके नियमो की परवाह नहीं है।

इतना ही नहीं खबर यह भी आ रही है की मोदी सरकार क्लीन गंगा के नाम पर 20 हजार से ज्‍यादा स्‍कूलों में क्विज करवाने जा रही है। मंत्रालय ने बताया की , यह क्विज 1 से 15 अप्रैल तक चलेगा। और यह भी कहा, यह क्विज “गंगा और नदियों के बारे में ज्ञान की कमी और एटिट्यूट को आंकने के लिए एक प्रतियोगी प्‍लैटफॉर्म और जागरूकता पहल है।” वहीँ कुछ सामजिक कार्यकर्ता ने यह संदेह जताया है कि कहीं यह क्विज सरकार के गंगा को साफ करने के प्रयासों का चुनाव-पूर्व प्रचार तो नहीं है।

इन सभी बातो से यह लगता है की मौजूदा सरकार को नियम कानूनों की कोई परवाह ही नहीं है। वर्तमान सरकार लोकतंत्र में महत्वपूर्ण माने जाने वाले संस्थानों के फैसले को प्रभावित करती है। देश में सरकार द्वारा इस तरह का माहौल बना दिया गया है। जिसमे अगर, मौजूदा सरकार नियमो की परवाह किये बिना अपने हितों के लिए फैसले ले भी लेती है तो देश की संस्थानों को इससे कुछ फर्क ही नहीं पड़ता है।

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