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मौजूदा सरकार में ग्रामीण इलाको में मजदूरी दर UPA सरकार से भी नीचे

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(Image Credits: Livemint)

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव से पहले किसानो के लिए योजना का एलान किया था और साथ ही कहा था की योजना के तहत उन्हें पहली क़िस्त दी जाएगी। चुनावी समय में मोदी सरकार मजदूरों और किसानो के गुण गाती रहती है और यह दावा करती है की बीजेपी ने अपने कार्यकाल में किस प्रकार से किसानो और मजदूरों के लिए कई योजनाए निकली जिससे उनकी उन्नति हुई है। परन्तु क्या यह सच है की देश के किसानो की हालत पहले से अच्छी है। क्या मज़दूरों को एक अच्छी ज़िन्दगी और वह सम्मान मिला जिसका दावा मोदी सरकार करती आ रही है।

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परन्तु नयी रिपोर्ट के मुताबिक भारत के ग्रामीण इलाकों में काम कर रहे लोगों की मदजूरी दर दिसंबर में सालाना आधार पर 3.8 फीसदी की दर से बढ़ी है, जो आंकड़ों के आधार पर इस महीने की सबसे कम बढ़ोतरी है। साथ ही किसान फसल की कीमत को लेकर भी निराश रहे । क्यूंकि दिसंबर में वार्षिक थोक मुद्राप्रसार खाद्य सामग्री के लिए माइनस 0.07 फीसदी रही और गैर खाद्य सामग्री के लिए ये 4.45 फीसदी थी।

लोकसभा चुनाव से पहले किसानों की हालत की उनके तनाव की ओर इशारा करती हैं। खबर अनुसार कि दिसंबर 2018 में राष्ट्रीय दैनिक ग्रामीण मजदूरी दर 322.62 रुपए थी, जो कि पिछले साल के मुकाबले 3.84 फीसदी ज्यादा थी। इसके पिछले साल में राष्ट्रीय दैनिक ग्रामीण मजदूरी दर 310.69 रुपए थी। 1.5 फीसदी की वार्षिक ग्रामीण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई मुद्राप्रसार को देखते हुए, इसका मतलब है कि वास्तव में मजदूरी केवल 2.3 प्रतिशत बढ़ी है।

आपको बता दे कि एनडीए सरकार में दिसंबर महीने में साल 2014 से 2018 के बीच 4.2 फीसदी की मंहगाई दर के बाद ये बहुत कम 4.7 फीसदी और वास्तविक रूप में महज 0.5 फीसदी बढ़ी। वहीं 2009 से 2013 के इन्हीं पांच सालों के महीनों में, जब यूपीए सत्ता में थी, तब ग्रामीण मजूदरी औसतन 17.8 फीसदी की दर से बढ़ी।

जबकि कृषि श्रमिकों के लिए सीपीआई मुद्राप्रसार औसतन 11.1 फीसदी रही और मजदूरी में वास्तविक वृद्धि प्रतिवर्ष 6.7 फीसदी रही। पिछले पांच सालों में मुद्रास्फीति को समायोजित करने के बाद भी ग्रामीण मजदूरी में मंदी देखी गई है, जो यूपीए शासन के दौरान की तुलना में ये बहुत कम है। मजदूरों किसानो की ऐसी हालत साफ़ बयान करती है मोदी राज में किस प्रकार उन्हें मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। अपनी रोजी रोटी को लेकर किसानो की हालत खस्ता है। अनाजों का दाम भी सोची समझी रकम से कम मिल रही है।


सोचने वाली बात यह है की पिछले पांच सालों में कम मजदूरी बढ़ोतरी कृषि से संबंधित कामो तक ही सीमित नहीं रही है। श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 8 मुख्य कृषि से जुड़े रोजगार जैसे जुताई, बुवाई, कटाई, उठाई, बागवानी श्रम, पशुपालन और प्लांट प्रोटेक्शन जैसे कामों में दिसंबर माह में औसतन वृद्धिदर 5.14 फीसदी रही जो कि सामान्य मजदूरी से 4.68 फीसदी अधिक है। इस दौरान किसानों को अपनी फसलों की कीमतों में बहुत कम बढ़ोतरी का अनुभव हुआ। कृषि मजदूरी में भी वृद्धि ज्यादा नहीं हुई।

इन आंकड़ों से पता चलता है की मोदी सरकार अपने वादों पर खरी नहीं उतरी। मजदूरों और किसानो के लिए निकाली योजनाए महज एक लुभाने की प्रक्रिया थी। वोट के लिए किस प्रकार किसानो को लॉलीपॉप दिया जाता है यह मोदी सरकार से सीखे

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