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मोदी सरकार और जुडिशरी में फिर टकराव, कोलिजियम के खिलाफ जाकर जस्टिस एए कुरैशी को चीफ जस्टिस बनने से रोका

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(image credits: Central India News Centralindia)

अक्सर मौजूदा सरकार पर विपक्षी पार्टियों द्वारा देश की महत्वपूर्ण संस्थानों को प्रभावित करने के आरोप लगते आये है। विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए इन आरोपों के पीछे कोई न कोई तर्क जरूर होता है। जब से भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई है, तब से जुडिशरी और सरकार के बीच टकराव के मामले और भी अधिक हो गए है। कभी सरकार सुप्रीम कोर्ट मे जजों की नियुक्तियों को लेकर कोलिजियम को प्रभावित करने की कोशिश करती है। तो कभी सरकार सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले को प्रभावित करती है।

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इसी प्रकार एक बार फिर मोदी सरकार और जुडिशरी में टकराव का मामला सामने आया है। यह टकराव जजों की नियुक्तियों को लेकर देखा रहा है। दरअसल केंद्र ने मध्य प्रदेश के चीफ जस्टिस की नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली कोलिजियम की सिफारिश को लंबित रखा है।

वहीं मौजूदा सरकार ने इसके विपरीत संविधान के आर्टिकल 223 की शक्तियों का प्रयोग किया है। इसका प्रयोग करके सरकार राष्ट्रपति की तरफ से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज रवि शंकर झा को चीफ जस्टिस के दायित्वों का निर्वहन करने के लिए नियुक्त किया। इससे पहले कोलेजियम ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजय कुमार सेठ के सेवानिवृत्त होने के बाद चीफ जस्टिस पद के लिए जस्टिस एए कुरैशी के नाम की सिफारिश की थी।

जस्टिस कुरैशी के स्थान पर जज रवि शंकर झा को नियुक्त करना मोदी सरकार की नीयत को दिखाता है। ऐसा लगता है की मौजूदा सरकार किसी खास धर्म से आने वाले व्यक्ति को चीफ जस्टिस जैसे महत्वपूर्ण पदों पर नहीं आने देना चाहती है।

जस्टिस सजंय कुमार सेठ 9 जून को रिटायर हो रहे है। कोलेजियम ने देश की विभिन्न हाईकोर्ट के लिए 10 मई को तीन अन्य सिफारिशें भी किया था। ऐसे ही गुजरात हाईकोर्ट के अवर न्यायाधीश को दिल्ली हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की गई है। केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से उनकी नियुक्ति को 22 जून को क्लियर कर दिया था।


इसी प्रकार मद्रास हाईकोर्ट के वरिष्ठत न्यायाधीश जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की गई थी। फ़िलहाल सरकार ने इस सिफारिश के लिए इजाजत नहीं दिया है। इसके साथ हीं राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठतम जज जस्टिस आरएस चौहान को कोलिजियम ने तेलंगाना हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की है।

जस्टिस चौहान अभी तेलंगाना हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं। मोदी सरकार ने जस्टिस चौहान की पदोन्नति को भी अभी मंजूरी नहीं दी है। जजों की नियुक्तियों के सवाल को लेकर सोमवार को विधि मंत्री का प्रभार संभालने के बाद रवि शंकर प्रसाद ने स्पष्टीकरण देते हुए अपनी भूमिका के बारे में कहा कि, उनकी भूमिका स्टेकहोल्डर के रूप में है। उन्होंने बताया, इसमें उनकी या उनके विभाग की कोई भूमिका नहीं है।

बता दे की जस्टिस कुरैशी से जुडा यह मामला नया नहीं है, पिछले साल ही नवंबर में बॉम्बे हाई कोर्ट में उनका तबादला होने से गुजरात हाईकोर्ट में हंगामा हो गया था। बार के सदस्यों ने उनके ट्रांसफर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन ने भी एक प्रस्ताव पारित करके कहा था कि एसोसिएशन का मानना है कि इस तरह का ट्रांसफर न्यायसंगत नहीं है। और साथ में यह भी कहा था की इस ट्रांसफर का निश्चित रूप से बेहतर प्रबंधन से कोई संबंध नहीं है।

अब देखने वाली बात यह है की आखिर जस्टिस कुरैशी के साथ ही सरकार ऐसा बर्ताव क्यों कर रही है। मौजूदा सरकार द्वारा जस्टिस कुरैशी की नियुक्ति को इंकार करते हुए, राष्ट्रपति का सहारा लेकर अपने पसंद से रवि शंकर झा की नियुक्ति करने से पता चलता है। की मोदी सरकार हर महत्वपूर्ण संस्थानों से संबधित कार्यप्रणाली को अपने हिसाब से नियंत्रण करना चाहती है।

बीजेपी सरकार द्वारा सभी संस्थानों के निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करना उचित नहीं है। कुछ ही महीनो पहले जस्टिस गोगोई ने भी यह माना था की कुछ लोग है जो न्यायपालिका के फैसले को प्रभावित करना चाहते है। इतना ही नहीं उन्होंने इसके पीछे राजनीतिक रूप से ताकतवर लोगो के होने का भी शक जताया था। जब से बीजेपी सरकार में सत्ता में आई है तब से लोग महत्वपूर्ण संस्थानों के निर्णय को भी शक की नजर से देखने को मजबूर हो चुके है।

जस्टिस कुरैशी की नियुक्ति को रोकने के पीछे क्या कारण सकते है यह तो मोदी सरकार से बेहतर और कोई नहीं बता सकता है। लेकिन इतना जरूर है मोदी सरकार हर उस महत्वपूर्ण संस्थानों में ऐसे लोगो की नियुक्ति होने से रोकेगी, जिनसे उन्हें भविष्य में कोई बड़ी परेशानी झेलनी पड़ सकती है।

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