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अब मोदी सरकार RTI एक्ट में करेगी बदलाव, कांग्रेस सपा समेत कई ने किया विरोध

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(image credits: Awaaz Nation)

मोदी सरकार RTI (राइट टू इनफार्मेशन एक्ट) सूचना का अधिकार के कानून में बदलाव करने की तैयारी में है। वही कानून जिसकी मदद से देश की जनता सरकार से अधिकतर विषयो में जानकारी प्राप्त कर सकती है।

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बीजेपी सरकार ने शुक्रवार को कांग्रेस के वाक आउट के बीच लोकसभा में सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक 2019 पेश किया। विधेयक को नौ के मुकाबले 224 मतों से पेश करने की अनुमति दी गयी।

इसमें यह बताया गया है की, मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों तथा राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन , भत्ते और सेवा के अन्य निबंधन एवं शर्ते केंद्र सरकार द्वारा तय किए जाएंगे। बता दें की मूल कानून के अनुसार अभी मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का वेतन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों के बराबर है। दरअसल कहने का मतलब है की इन तमाम सुचना आयुक्तों से सम्बंधित सेवाओं पर केंद्र सरकार अपने अनुसार से नियमो को तय करेगी।

प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने सूचना का अधिकार अधिनियम ,2005 में संशोधन करने वाले इस विधेयक को पेश किया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि पारदर्शिता के सवाल पर मोदी सरकार की प्रतिबद्धता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता है. उन्होंने जोर दिया कि सरकार अधिकतम सुशासन , न्यूनतम सरकार के सिद्धांत के आधार पर काम करती है. विधेयक के संदर्भ में मंत्री ने कहा कि इसका मकसद आरटीआई अधिनियम को संस्थागत स्वरूप प्रदान करना , व्यवस्थित बनाना तथा परिणामोन्मुखी बनाना है।

एक तरफ जहाँ राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने इस कानून के पारदर्शिता और प्रधानमंत्री के बारे में इतनी बड़ी बड़ी बातें बता रहे है, वहीं विपक्षी पार्टिया समेत कुछ लोगो ने कानून में बदलाव के लिए लाये गए विधयेक की आलोचना करी है। उनका कहना है कि इससे देश में यह पारदर्शिता पैनल कमजोर होगा। विधेयक को पेश किये जाने का विरोध करते हुए लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि मसौदा विधेयक केंद्रीय सूचना आयोग की स्वतंत्रता को खतरा पैदा करता है।


वहीं इस बिल का कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, बीएसपी, एसपी द्वारा विरोध किया जा रहा है। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इस विधयेक को RTI ख़त्म करने वाला करार दिया है। एआईएमआईएम के असादुद्दीन ओवैसी ने कहा कि यह विधेयक संविधान और संसद को कमतर करने वाला है। ओवैसी ने इस पर सदन में मत विभाजन कराने की मांग की. कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस द्वारा इस दौरान सदन से वाकआउट किया गया।

मत विभाजन से पहले तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय ने मांग की कि विधेयक को संसद की स्थायी समिति को विचार के लिये भेजा जाए। उन्होंने कहा कि 15 वीं लोकसभा में 71 प्रतिशत विधेयक समितियों को भेजे गए थे जबकि16 वीं लोकसभा में केवल 26 प्रतिशत विधेयकों को संसदीय समितियों को भेजा गया। उन्होंने आगे कहा , इस नयी लोकसभा में अभी तक एक भी विधेयक किसी संसदीय समिति को नहीं भेजा गया है और कई संसदीय समितियों का अभी तक गठन भी नहीं हुआ है।

बीजेपी सरकार कानून में बदलाव के लिए लाये गए विधेयक पर कितनी ही पारदर्शिता की बातें क्यों न कर ले, लेकिन इसकी सच्चाई कुछ और ही है। आखिर क्यों सरकार सूचना के अधिकार कानून में ही बदलाव करना चाहती है। यहां गौर करने वाली बात यह भी है की अक्सर मोदी सरकार अपनी विफलताओं से संबधित आकड़ो को लोगो के सामने नहीं लाना चाहती, कुछ ही महीनो पहले बेरोजगारी से सम्बंधित आकड़ो को छिपाने की कोशिश करना इसका ही एक उदाहरण है।

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