fbpx
ट्रेंडिंग  
ट्रेंडिंग  
देश

NSSO की नई रिपोर्ट से खुलासा, मोदी राज में रोजगार छोड़ने वाली महिलाओं की संख्‍या तेजी से बढ़ी

NSSO's-new-report-reveals,-the-number-of-women-who-quit-employment-in-the-state-of-Gujarat-rose-sharply
(Image Credits: NDTV)

देखा जाए तो नौकरियों को लेकर अभी भी हो हल्ला मचा है। नौकरियां न मिलने के कारण बेरोजगरी काफी ज्यादा बढ़ गयी है। हलाकि बेरोजगारी और नौकरियों से जुडी रिपोर्ट को अभी हाल ही में सार्वजानिक करने से मना कर दिया गया। परन्तु यह साफ झलकता है की कई लोग बेरोजगार है और नौकरियों की तलाश है।

Advertisement

यह बात सिर्फ पुरुषो तक ही नहीं महिलाओं पर भी आती है। महिलायें भी पुरषो से कन्धा मिलकर साथ चलती है। शहर ही नहीं गाँवों की महिलायें भी नौकरियां कर घर का गुजरा कर रही है। वही उनको भी काम मिलना मुश्किल हो गया है। परन्तु NSSO की नयी रिपोर्ट सामने आयी जिसमे कई महिलाओं ने नौकरियां छोड़ी। साल 2004-05 से पांच करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाओं ने राष्ट्रीय नौकरी बाजार छोड़ दिया है।

नौकरियों में भागीदारी देने वाली महिलाओं की संख्या 2011-12 में 7 फीसदी की गिरावटआई है जो करीब 2.8 करोड़ महिलाओं के बराबर होता है जो नौकरी की तलाश में हैं। NSSO द्वारा पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे की 2017-18 की रिपोर्ट जारी की गयी थी, जिसपर सरकार ने रोक लगा दी है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक ये कमी 15-59 साल के उम्र के लोगों के बीच अधिक है। आकंड़ों के मुताबिक ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी दर 2004-05 में 49.4 फीसदी से घटकर 2011-12 में 35.8 फीसदी और 2017-18 में और घटकर 24.6 फीसदी हो गई। इस हिसाब से 2004-05 से कामकाजी उम्र की ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी की तुलना कर तो यह आधा रह गया।

जनसत्ता खबर के अनुसार इस बारे में एक एक्ट्रेस से सवाल पूछा गया। उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर जवाब दिया की , ‘शिक्षा में अधिक भागीदारी इसका एक जवाब है लेकिन इतनी बड़ी गिरावट को यह स्पष्ट नहीं कर सकता है। इसका एक हिस्सा सांस्कृतिक बदलाव का परिणाम भी हो सकता है।’


हालांकि खास बात यह है कि शहरी क्षेत्र में, 2017-18 के अंत तक छह वर्षों में महिला भागीदारी में 0.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, यह नौकरी की चाह रखने वाली 12 लाख महिलाओं की संख्या थी। इससे पहले शहरी नौकरी बाजार में महिलाओं की भागीदारी के रूप में रूचि 2004-5 और 2011-12 के बीच 2.2 फीसदी प्वाइंट गिर गया था।

एक अनुमान के मुताबिक साल 2011-12 और 2017-18 के बीच ग्रामीण भारत में करीब 3.2 करोड़ कैजुअल मजदूरों ने अपनी नौकरी खो दी, सबकी पिछले सर्वे में यह 29.2 प्रतिशत थी। नौकरी खोने वाले लोगों में लगभग तीन करोड़ खेती करने वाले थे। NSSO के द्वारा जारी पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे 2017-18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 के बाद से खेत में काम करने वाले लोगों की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक गिर गयी है। कैजुअल लेबर का मतलब है ऐसे कर्मचारी से है जिन्हें अस्थाई रूप से काम रखा जाता है।

NSSO की जारी रिपोर्ट के मुजातिब किस प्रकार महिलाओं के काम करने में कमी आयी है यह साफ़ जाहिर होता है। ग्रामीण से लेकर शहरी महिलाओं की भागीदारी में कई ज्यादा गिरावट के चलते यह तो बात साबित हो गयी की अब नौकरिया ख़त्म होती जा रही है। मोदी द्वारा नौकरियां देने का वादा तो झूठा साबित हो चूका है।

सबसे बड़ी समस्या उन लोगो की है जो गाँवों से शहर नौकरी करने आते है, परन्तु नौकरी नहीं मिलती। चुनावी वादों में नौकरिया तो खूब बांटी जाती है परन्तु चुनाव ख़त्म होने के बाद नौकरियां भी ख़त्म हो जाती है।

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

To Top

© copyright reserved National Dastak. All right reserved