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अयोध्या केस: मुस्लिम पक्षकार बोले वेद पुराणों से नहीं, कानूनी तरीके से हो निपटारा

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सुप्रीम कोर्ट में रोजाना रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले पर सुनवाई हो रही है। दोनों पक्ष अपनी अपनी दलीलें कोर्ट के आगे रख रहे है। अयोध्या राम जन्म भूमि मामला लगतार पेचीदा होता जा रहा है। हाल ही में हुई सुनवाई में हिन्दू पक्ष ने अपनी दलीलें सामने रही वही अब  इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्षकार की ओर से वकील राजीव धवन ने अपना पक्ष रखा उन्होंने कहा की अयोध्या भूमि मामले का निपटारा कानून के हिसाब से हो, न कि स्कंद पुराण और वेद के जरिए। अयोध्या में लोगों की आस्था हो सकती है, लेकिन इसे सबूत नहीं माना जा सकता। 

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उन्होंने कहा की मैं कोर्ट को बताना चाहता हूं कि पूजा के लिए की जाने वाली भगवान की परिक्रमा सबूत नहीं हो सकती। यहां इसे लेकर इतनी दलीलें दी गईं लेकिन इन्हें सुनने के बाद भी मैं यह नहीं दिखा सकता कि परिक्रमा कहां है। इसलिए यह सबूत नहीं है, हम सिर्फ इसलिए इस पक्ष को मजबूती से देख रहे हैं क्योंकि वहां की शिला पर एक मोर या कमल था। इसका मतलब यह नहीं है कि मस्जिद से पहले एक विशाल संरचना थी। उन्होंने कहा भूमि मामले न निपटारा कानून के हिसाब से होगा। 

मुस्लिम पक्षकार के वकील राजीव धवन ने आगे कहा कि स्वयंभू का मतलब भगवान का प्रकट होना होता है। इसको किसी खास जगह से नहीं जोड़ा जा सकता है।  हम स्वयंभू और परिक्रमा के दस्तावेजों पर भरोसा नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में इतिहासकारों पर भरोसा नहीं कर सकते हैं। मामले की सुनवाई पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आपने भी तो इतिहास को सबूत के तौर पर पेश किया है, उसका क्या?

राजीव धवन ने अपने दलील में पुराने मुकदमों और फैसलों के हवाले भी दिए। उन्होंने कहा कि देवता का सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। सिर्फ सेवायत का ही होता है। धवन ने दलील दी कि देवता का कोई जरूरी पक्षकार नहीं रहा है। यहां तो देवता और सेवायत ही आमने सामने हैं।  देवता के लिए अनुच्छेद 32 के तहत कोर्ट में दावा नहीं किया जा सकता। 

राजीव धवन ने दलील दी कि वैदिक काल में मंदिर बनाने और वहीं मूर्तिपूजा करने की कोई परंपरा ही नहीं थी। कोई मंदिर या स्थान ज्यूरिस्टक पर्सन यानी कानूनी व्यक्ति हो ही नहीं सकता। हां, देवता या मूर्ति कानूनी व्यक्ति यानी ज्यूरिस्टिक पर्सन तो हो सकते हैं, पर मुकदमा नहीं लड़ सकते।  धवन ने कहा कि महाभारत तो इतिहास की कथा है लेकिन रामायण तो काव्य है। क्योंकि वाल्मीकि ने खुद इसे काव्य और कल्पना से लिखा है। रामायण तो राम और उनके भाइयों की कहानी है। तुलसीदास ने भी मस्जिद के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है जबकि उन्होंने राम के बारे में सबसे बाद में लिखा। 


इन सभी दलीलों  को सामने रखते हुए ही यह पक्ष रखा गया की इस मामले की सुनवाई स्कंद पुराण और वेद के जरिए ना की जाए, बल्कि कानूनी आधार की की जाए, फिलहाल अभी इस मामले में सुनवाई ज़ारी है। 

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