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RBI का खजाना मोदी सरकार को ट्रांसफर, ‘देश के लिए घातक कदम’ पूर्व गवर्नर ने दी चेतावनी

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(image credits: the financial express)

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया RBI और मौजूदा सरकार अक्सर एक दूसरे से नाराज दिखाई देते है। इस नाराजगी का कारण सरकार और रिज़र्व बैंक द्वारा लिए गए फैसले पर आपसी सहमति नहीं होना भी है। अक्सर केंद्रीय बैंक जो भी निर्णय लेने की कोशिश करता है तो केंद्र सरकार उसे प्रभावित करने की कोशिश करती है। मालूम हो की कुछ ही महीनो पहले RBI के डिप्टी गवर्नर ने इस्तीफ़ा दे दिया और साथ ही उन्होंने बैंक की स्वतंत्रता प्रभावित होने की भी बात कही थी।

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वहीँ इसके बाद फिर एक बार फिर सरकार और केंद्रीय बैंक के पूर्व गवर्नर में नाराजगी सामने आई है। दरअसल रिजर्व बैंक ने विमल जालान समिति की सिफारिशों को अमल में लाते हुये सोमवार को रिकार्ड 1.76 लाख करोड़ रुपये का लाभांश और कैश रिजर्व मोदी सरकार का देने का निर्णय लिया है। हालाँकि जानकर बता रहे है की इससे नरेंद्र मोदी सरकार को राजकोषीय घाटा बढ़ाए बिना सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को गति देने में मदद मिलेगी। 

वहीं बैंक के पूर्व अधिकारियो ने ऐसा न करने के लिए चेताया है। बता दें की यह मुद्दा काफी वक्त तक वित्त मंत्रालय और केंद्रीय बैंक के बीच खींचतान की वजह बना।  RBI द्वारा फंड सरकार को ट्रांसफर करने के फैसले पर डी सुब्बाराव और वाईवी रेड्डी खुलकर पहले ही विरोध कर चुके हैं। हाल ही में इस्तीफ़ा देने वाले डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने भी फंड ट्रांसफर से काफी बूरा प्रभाव पड़ने की बात कही है। 

उन्होंने अर्जेंटीना का उदाहरण देते हुए कहा, केंद्रीय बैंक के कामकाज में दखल का भारतीय अर्थव्यवस्था पर बेहद बूरा प्रभाव डाल सकता है। पिछले साल अक्टूबर में आचार्य ने यहां तक कहा था कि सरकार टी-20 तो आरबीआई टेस्ट मैच खेल रही है। विरल ने बताया था कि 6.6 बिलियन डॉलर की रकम अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक से देश के खजाने में ट्रांसफर के बाद देश का ‘सबसे बुरा संवैधानिक संकट’ उत्पन्न हुआ।

आपको बता दे की RBI ने सोमवार को एक बयान में कहा कि गवर्नर शक्तिकांत दास की अगुवाई में रिजर्व बैंक के निदेशक मंडल ने 1,76,051 करोड़ रुपये सरकार को ट्रांसफर करने का फैसला किया है। इसमें 2018-19 के लिए 1,23,414 करोड़ रुपये का अधिशेष और 52,637 करोड़ रुपये अतिरिक्त प्रावधान के रूप में चिन्हित किया गया है। अतिरिक्त प्रावधान की यह रकम आरबीआई की आर्थिक पूंजी से संबंधित संशोधित नियमों Economic Capital Framework (ईसीएफ) के आधार पर निकाली गई है।


वहीं, फरवरी में रेड्डी ने आरबीआई के खजाने पर सरकार की नजर की आलोचना करते हुए कहा था कि सरकार ने ऐसा करके उस स्थापित सिस्टम को सकंट  में डाल दिया है, जिसके तहत सरकार केंद्रीय बैंक से वक्त वक्त पर अस्थाई लोन लेती थी। उनके मुताबिक, यह रकम भविष्य के इंश्योरेंस के तौर पर काम करती है और इसे जमा करके रखने की जरूरत है, न कि बांट दिए जाने के। 

एक तरफ कुछ जानकार मानते है की इस फंड से अर्थव्यवस्था को सुधारने में मदद मिलेगी। परन्तु दूसरी ओर पूर्व गवर्नर द्वारा इस फैसले का विरोध किया गया और इस निर्णय से देश में बूरा प्रभाव पड़ने की बात कही जा रही है।  बता दें कि देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पांच साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। अब देखना यह होगा की सरकार का यह कदम देश के हित में जाने वाला है या इसके कुछ और ही परिणाम देखने को मिलेंगे।

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