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सरकार ने राज्यों और जनता से बिना चर्चा किए अडानी के हवाले कर दिए छह एयरपोर्ट

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(Image Credits: Catch News)

मोदी सरकार वैसे तो देश में अक्सर सबका साथ सबका विकास की बात करती है। लेकिन सच्चाई तो यह है की मौजूदा सरकार सिर्फ पूंजीपतियों के हितो के लिए ही काम करती है। सरकार इनके हितो को पूरा करने के लिए कोई भी कदम उठाने से पीछे नहीं हटती है। चाहे वो कदम देश की जनता के खिलाफ ही क्यों न हो। यहां तक की सरकार इनके हितों को साधने के लिए राज्य सरकार से भी चर्चा करना जरुरी नहीं समझती है।

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इसी प्रकार एक बार फिर सरकार का ऐसा ही कारनामा सामने आया है। जिसमे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने देश के छह एयरपोर्ट राज्यों से बगैर चर्चा किए ही अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड को सौंप दिए। एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) इन एयरपोर्ट्स का प्रबंधन संभालती है, जिनके बारे में यह जानकारी राज्यसभा की समिति ने नागरिक विमानन मंत्रालय को हाल ही में दी है।

नीलामी के वक्त 10 कम्पनीयों के द्वारा 32 बोली लगाई गई थी जिसमें अडानी ग्रुप पांच एयरपोर्ट्स पर बोली लगाने में अव्वल रही थी। प्रति यात्री शुल्क के आधार पर अडाणी समूह ने अहमदाबाद के लिए 177 रुपये, जयपुर के लिए 174 रुपये, लखनऊ के लिए 171 रुपये, तिरुवनंतपुरम के लिए 168 रुपये और मेंगलुरु के लिए 115 रुपये की बोली लगाई। यह राशियां अडानी समूह द्वारा इन हवाईअड्डों का परिचालन मिलने पर प्राधिकरण को दिया जाएगा।

इस प्रक्रिया में अडानी समूह के आलावा दूसरी बोली लगाने वाली कंपनी में जीएमआर एयरपोट्र्स लिमिटेड ने इनके लिए क्रमश: 85 रुपये, 69 रुपये, 63 रुपये, 63 रुपये और 18 रुपये की बोली लगाई थी। अब देखने वाली बात यह है की GMR द्वारा इतनी कम बोली रखने के बाद भी उन्हें इसका ठेका नहीं दिया गया। बल्कि सबसे अधिक बोली रखने वाले अडानी ग्रुप को इसका ठेका दे दिया गया। इसके साथ गुवाहाटी एयरपोर्ट की बोलीयां अगले दिन यानी मंगलवार को खोली जानी थी परन्तु इसे भी अडानी ग्रुप के हवाले कर दिया गय़ा। इस तरह से अडानी ग्रुप को अगले पांच सालों तक इसके परिचालन का ठेका मिला है।

ऐसे में केंद्र सरकार पर यह सवालिया निशान लग सकते है। की किस प्रकार सरकार ने बिना राज्यों और जनता से चर्चा किये, इतना बड़ा फैसला ले लिया।


टीओआई’ की एक खबर के मुताबिक, मंत्रालय ने इस संबंध में हुई दो बैठकों (27 व 28 दिसंबर को) से जुड़ी रिपोर्ट सौंपी है। उसमें कहा गया कि एयरपोर्ट्स पट्टे (लीज) पर देने से पहले राज्यों से नहीं पूछा गया था। दस्तावेजों में लखनऊ, तिरुवनंतपुरम, जयपुर, अहमदाबाद, गुवाहाटी और मंगलौर एयरपोर्ट्स को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के अंतर्गत विकसित व संचालित आदि करने को लेकर विस्तृत ब्यौरा दिया गया था।

आखिर सरकार ने राज्यों और जनता से इस बारे में चर्चा किये बिना ही इतना बड़ा फैसला कैसे ले लिया। सरकार की ऐसी कौन सी मजबूरी या कौन सी ऐसी जल्दबाजी थी जिसके कारण सरकार ने देश के छह एयरपोर्ट को अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड को दिया। इससे ऐसा लगता है की सरकार कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पहले किसी से भी चर्चा करना जरूरी नहीं समझती है।

दरअसल सरकार यह मामला तब सामने आया जब, कोलकाता के रहने वाले सप्तऋषि देब ने एएआई के तहत आने वाले एयरपोर्ट्स के आधुनिकिकरण को लेकर याचिका दी थी। इसी याचिका पर राज्यसभा की समिति ने इस संबंध में मंत्रालय से जवाब मांगा है कि एयरपोर्ट पट्टे पर दिए जाने से पहले क्या (राज्यों से) इसकी सलाह ली गई थी? साथ मंत्रालय ने भी यह माना था की एयरपोर्ट को पट्टे पर देने से पहले राज्य सरकार या फिर जनता से नहीं पूछा गया था।

मंत्रालय ने पिछली बैठकों में राज्यसभा की समिति को बताया कि एयरपोर्ट अडानी समूह की कंपनी को सौंपे जाने को लेकर राज्यों से बातचीत नहीं हुई थी।11 जनवरी, 2019 के उसके जवाब के मुताबिक, “प्रक्रिया के अनुसार, एएआई के एयरपोर्ट पीपीपी मोड के जरिए पट्टे पर किसी को देने को लिए जनता से या फिर राज्यों से चर्चा करना जरूरी होता है।” बता दें की अडानी समूह के चेयरमैन और संस्थापक गौतम अडानी की पत्नी प्रीति अडानी इस कंपनी (अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड) की चेयरपर्सन हैं।

अब ऐसे में इस प्रकार के सवाल जायज है और सरकार से पूछा भी जाना चाहिए कि जब एएआई के एयरपोर्ट पीपीपी मोड के जरिए पट्टे पर किसी को देने के लिए जनता से या फिर राज्यों से चर्चा करना जरूरी होता है तो फिर अडानी समूह को इन एयरपोर्ट्स सौंपने से पहले इस प्रक्रिया का अनदेखा क्यों किया गया? लेकिन सरकार से सवाल पूछे तो पूछे कौन? क्योंकि सवालों के बदले में जवाब देने के बजाय हर सवाल पुछने वाले को मौजूदा सरकार देशभक्त या फिर देशद्रोही के तराजू में तौल देती है।

सरकार द्वारा अपने पूंजीपति दोस्तों को फायदा पहुंचना कोई नई बात नहीं है। पहले भी सरकार ने राफेल विमान बनाने का ठेका अपने दोस्त अनिल अम्बानी की कंपनी को दे दिया था। सरकार ने रक्षा क्षेत्र में मैन्यूफैक्चरिंग का 78 साल का तजुर्बा रखने वाली अनुभवी कंपनी HALहिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को इस डील से बाहर रखा। इसके बाद सरकार ने राफेल बनाने का ठेका डील से महज 15 दिन पहले अनिल अम्बानी द्वारा स्थापित की गई कंपनी को दे दिया।

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