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विमर्श

अफ़सोस है कि. . . . . . मैं हिन्दू हूँ

vimarsh

“बहुत अफ़सोस होता है कि मेरा जन्म हिन्दू धर्म में हुआ पर मेरी अंतिम सांसे इस धर्म में नहीं लेगीं “

हो सकता है कि आपने इन शब्दों का भावार्थ कहीं सुन रखा हो, मैं इन शब्दों को किसी आवेश में नहीं बोल रहा हूँ बल्कि इनको कई वर्षो की पीड़ा देखने, सुनने के बाद बोल रहा हूँ। वैसे तो मैं किसी गरीब दलित के घर पैदा नहीं हुआ हूँ।

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जिसने बहुत से दुःख केवल गरीब दलित होने के खातिर सहा हो। पर मैंने उन सब अपमान को महसूस किया है जो हर दलित को उसके दलित होने के कारण मिलती है।

यह धर्म ऐसा है जो अपने ही कही बातों में उलझा हुआ है। यह धर्म कहता है कि हम सब ‘एक समान’ हैं, पर इसी धर्म ने हिन्दुओ को चार वर्णो में बाँट रखा है। वह है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इनमे शूद्रों की स्थिति, खास तौर से दलितों की स्थिति ने, हिन्दू धर्म की जो पोल खोली है वह जगजाहिर है | दलितों को मंदिर में ना प्रवेश करने देना, दलित दूल्हे को घुड़चढ़ी ना करने देना। दलितों को किराये पर घर ना देना, दलितों को पानी ना पीने देना, ऐसे ना जाने कितने केस हैं जिससे इस धर्म की “तथाकथित समानता ” का पता चलता हैं।
समानता का ढोंग केवल वर्ण तक ही सीमित नहीं है बल्कि इन्होंने इस ढोंग को लैंगिक आधार पर भी कहीं का नहीं छोड़ा है। इस धर्म ने नारी को भी दोयम दर्जे का मानव समझा है। मनुस्मृति जैसी विवादस्पद किताब (ग्रन्थ) में नारी का जो वर्णन मिलता है, वह इस धर्म की लैंगिक आधार पर भेदभाव करने की अति है। सबरीमाला का विवाद आपको इस धर्म की ‘तथाकथित लैंगिक समानता ‘ को बताने के लिये काफी है।

मै इस धर्म में क्यों मरूं मुझे समझ नहीं आता है। कोई एक ठोस वजह नहीं मिलती जिससे मुझ जैसे दलित हिन्दू को अपने इस धर्म पर अभिमान हो। कोई एक वजह जिससे हम दलितों को इस धर्म पर गुमान हो। मुझे तो इस धर्म में दलितों का हित कहीं दूर दूर तक नहीं दिखाई देता है। तिरष्कार और घृणा के अलावा इस धर्म में दलितों के लिये कुछ भी नहीं है।

हो सकता है कुछ लोग मेरी इस बात से असहमत हो और कहें कि हिन्दू धर्म में कोई बुराई नहीं है, यह तो लोगो की गलती है। पर मेरा एक सवाल फिर यह है कि क्यों ऐसे लोग इस धर्म में है। क्यों इनको इस धर्म का ठेकेदार बनाया गया है। क्यों दलितों को इस धर्म को चलाने की अनुमति नहीं मिलती है? जब धर्म को चलाने वालो पर एक ही प्रकार के लोगों का वर्चस्व है, फिर इस धर्म को कैसे सबके लिये समान माना जाये।


वास्तव में यह सब एक छलावा है। कुछ चंद लोगो द्वारा रचा गया एक ऐसा छलावा जिसमे चंद लोग सब पर राज करना चाहते हैं वह भी अपमानित करके। मैं ऐसे छलावे से बाहर निकलना चाहता हूँ। एक आज़ाद जिंदगी मरना चाहता हूँ। इसलिये ही मैं कहता हूँ कि “मेरी अंतिम सांसे इस धर्म में नहीं लेंगी “

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