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मार्क्स, आंबेडकर और लोहिया की संगति

आज कार्ल मार्क्स का जन्मदिन है, ये हमारे लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाने का अवसर है। जाति चेतना या जातीय अस्मिता की राजनीति ने बहुजनों को क्या दिया?

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कुछ दशकों के लिए इस चेतना ने जातीय दायरों में सिमटी अस्मिताओं को मजबूत किया। कुछ हद तक जातियों में आत्मसम्मान और गर्व का भाव भी भरा है। लेकिन अंबेडकर की प्रस्तावना के ठीक विपरीत जाति के नाश के लक्ष्य और रणनीति – दोनों को नकारते हुए जो कांशीराम की राजनीति चली उसने तात्कालिक लाभ देते हुए एक बड़ा नुकसान भी कर दिया है।

 

जातीय अस्मिताएं मजबूत होने का अर्थ है उनके अपने भीतर गर्व का भाव आये, लेकिन क्या इससे अंतरजातीय (दो जातियों के बीच) अर्थ में एक दूसरे के लिए सम्मान और स्वीकार्यता बढ़ी है? अनुभव बताता है कि जातियों के बीच ऐसा अपेक्षित संवाद और एकता निर्मित नहीं हुई है। बल्कि उनकी पृथक अस्मिताओं की घोषणा ने इस संवाद की संभावना को कुंद किया है।

 

इसका लाभ निश्चित ही उन ताकतों को हो रहा है जो जातियों को लड़ाकर उनपर शासन करती आई हैं।

 

जातियों में परस्पर सम्मान और स्वीकार्यता क्यों नहीं उभर सकी है? इसका कारण साफ है उनके साझा हितों को परिभाषित नहीं किया जा सका है। असल मे जाति का अर्थ कुल मिलाकर इतना ही यह है कि साझा हित की समझ निर्मित होने के पहले ही लोगों को छोटे छोटे खांचों में (जातियों में) तोड़ दिया जाए। उन्हें कार्य, विवाह और भोजन आदि के अलग अलग अनुशासन दे दिए जाएं।


 

ये साझा हित क्या है जिससे शोषक सत्ता भयभीत है?

निश्चित ही ये आर्थिक हित है।
जैसा कि कार्ल मार्क्स बताते हैं।

 

इसका सीधा अर्थ है कि जब तक जातियां अपने आर्थिक हितों के साझेपन को नहीं पहचानेंगी तब तक उनमे साझेदारी और साझे हित की समझ नहीं जन्मेगी। ठीक यही बात हम ओबीसी, दलित, आदिवासी आदि के दुर्निवार विभाजन में देख रहे हैं।

 

इसका सीधा अर्थ है कि बहुजन अपनी जातीय अस्मिता से वर्गीय अस्मिता की तरफ बढ़ेंगे तो उन्हें फायदा होगा।

 

अंबेडकर की जाति उन्मूलन की प्रस्तावना में भी जातियों के बीच परस्पर सम्मान और निकटता अपेक्षित है। यह तभी संभव है जबकि जाति से वर्ग की तरफ वाया वर्ण यात्रा की जाए। और इसकी एक अनिवार्य शर्त ये भी है कि विभाजन को दैवीय नियम बनाने वाले धर्म और संस्कृति के सम्मोहन को तोड़ने का प्रयास भी समानांतर चलता रहे।

 

इस बिंदु पर अंबेडकर, लोहिया और मार्क्स में एक संगति नजर आती है।

 

(लेखक लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।)

 

संपादन- भवेंद्र प्रकाश

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