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हमें भी इंसाफ करने का अधिकार मिलता तो इनका तनता-सिकुड़ता जोश उखाड़ फेंकते

जो औरत आपको तस्वीर में दिखाई दे रही है वो कोई ऐसी वैसी औरत नहीं है। ये है इस विश्वगुरु, अखंड भारत की ज़मीन पर पैदा हुई दुर्गा काली अन्नपूर्णा। ये जो मंजर है.. वो दरअसल भगवान की लीला है, जिसमे उसके भक्तों की जुबानी घोषित देवी के कपड़े फाड़े गए, बीच बाजार नंगा किया गया और अंत मे पीट पीट कर उसकी हत्या कर दी गई। ‘अहिंसा परमो धर्मा’ शायद उस वक्त सड़क किनारे खम्बा ढूंढ के गीला कर रहा था।

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हाँ, मुझे कोई ताज्जुब नही अगर नौ दुर्गा पर पूजन करने वाले भक्तों की भीड़ ने इस औरत की गरदन के नीचे के मांसल हिस्सों को मौका मिलते ही अपनी सुविधा और मौके की नजाकत के हिसाब से छूआ हो। ‘परायी नारी मां समान है’ उस वक्त अपना मुंह छिपाए भीडात्म्क हो उठा अचानक। सुना है भारत देश की हर नारी के अंदर ताकत का तिलिस्म मौजूद रहता है। तब भी ये औरत मार खाती रही। कहां गई इसकी वो ताकत जो मज़हबी किताबों मे पढ़-पढ़ कर ये देश खत्म होने के कगार पर आ गया।

सुना है ये देश वीर जवानों का है, ये कैसे जवानों की भीड़ है जो इस औरत को कुचलने में इस कदर रोमांच महसूस कर रही है? ये रोमांच, ये आक्रोश सिर्फ इसलिये कि बच्चा चुराने का शक था इस पर। ये जोश ये उबाल, ये आर या पार कर देने की जल्दबाजी इसलिये ही ना कि ये औरत किसी हाई सोसायटी से ताल्लुक नहीं रखती?

पर ए इंसाफ परस्त मिट्टी के बांके जवानों अगर तुम सच्चे हो और सारे फैसले यूं ही करने हैं तो फ़िर एक और मौका है, एक या दो बच्चा नहीं, बाकायदा बच्चों की तस्करी के इल्जाम मे रूपा गांगुली का नाम सामने आया है। साबित होगा, तब होगा लेकिन फिलहाल वो भी तो इस औरत की तरह ही मुजरिम हैं।


जाओ, टूट पड़ों नामर्दों…
काश हम देवियों के लिये भी दो चार किताबों मे इन्स्टेन्ट इंसाफ का कायदा लिखवा दिया जाए। ताकि हम भी बलात्कार का शक होते ही, मन माफिक तरीके से उसका इस्तेमाल कर सके। फिर तनता सिकुड़ता जोश सिरे से उखाड़ फेंके। इतना इंसाफ, और बराबरी काफी होगी हमारे लिये। थू है इस मुगालते पर, जिसे डिजिटल इंडिया कहा जा रहा है।

(लेखिका अनुपम वर्मा के ये नीजि विचार हैं।) 

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