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पीरियड्स की समस्या पर लेखिका अनुराधा सरोज का जबरदस्त लेख.. जरूर पढ़ें

मुझे जब पीरियड्स शुरू हुए तो मेरी माँ ने मुझे पहले नहीं बताया था। जाने उन्हें कैसा संकोच था? मेरे लिए वो दुःख और परेशानी लेके आये थे, जैसे मैंने कोई बड़ा पाप कर दिया हो। मुझे याद है, मैं उस दिन भगवान की मूर्ति के आगे खूब रोई थी और मुझे फिर कभी पीरियड्स ना हों इसकी दुआ मांगी थी। मुझे कोई ज्ञान नहीं था ये क्यों होते हैं और होने पर क्या किया जाता है। उस दोपहर मैं यूँही वॉटर वर्क्स के खाली प्लाटो और लम्बे-लम्बे सफेदे के पेड़ो के बीच घूमती रही। कभी सूखे कागज़ बिनती और कभी….. उस दोपहर को लिखना भी मेरे लिए आसान नहीं है।

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शाम को माँ ने थोड़ा समझाया वो भी झिझकते हुए और कुछ साफ़ कपड़ो में रुई लगा के मुझे दे दी। कई सालों तक रुई और कपड़ो से काम चलता रहा। कभी-कभार रुई खत्म हो जाती तो सिर्फ कपड़े। और हर महीने नए कपड़े कहाँ से आते? कोई दर्जी की दुकान तो था नहीं हमारा घर! तो वही कपड़ो को धो के सुखाया जाता। सबसे बड़ी समस्या होती उनको फेकने की। आज के घर की तरह बाथरूम में तो डस्टबिन था नहीं, एक रसोई में डस्टबिन होता था, वो भी खुला। उसमे कैसे फेंकते? हर बार की पॉलिटीथिन ढूंढो, अख़बार में लपेटो, धोओ, मांजों। पीरियड्स आना जैसे शामत आना। दर्द और दाग़ तो आगे की समस्याएं हैं। और फिर चादर, सोफे, कपड़े…. सबको बचाते चलो।

फिर स्टे-फ्री आया तो कुछ सुकून मिला। लेकिन दाग़, धब्बों, रेशइस, और फेंकने की समस्या ज्यों की त्यों। और वही जैसा गीता ने लिखा है, एक पैकेट को ज्यादा से ज्यादा चलाने की कोशिश! उसी सड़े-गले नैपकिन को ज्यादा से ज्यादा यूज़ कर पाने की कोशिश। आज याद करके भी मितली आती है। कॉलेज के फर्स्ट ईयर की छुट्टिओं में पूना में एक अमरीकन लड़की मिली मुझे। हम दोनों काफी अच्छे दोस्त बन गए थे। एक दिन उसने मुझे स्विमिंग चलने को पूछा तो मैंने उसे बताया के मैं डाउन हूँ (लड़कियां पीरियड्स के लिए, “डाउन होना,” “चम्मिंग” जैसे और शब्दों का इस्तेमाल करती हैं।) तो उसने कहा के इसमें क्या नई बात है, स्विमिंग तो चल ही सकते हैं?? उसने मुझे टैम्पोन के बारे में बताया, और अपना टैम्पोन का पैकेट मुझे दे भी दिया। उसने जैसे जीवन स्वर्ग ही बना दिया!! ना कोई दाग़-धब्बों का डर, ना रैश और ना ही कोई स्मैल। ये एक विसपर के पैकेट के जितना ही महंगा था, और इसको फेंकना उससे भी आसान। मैंने कॉलेज आके इसका खूब प्रचार किया!

अखिल जब छः साल पहले लंदन आया तो मुझे लगा लंदन से वो चीज मँगानी चाहिए जो अपने यहाँ नहीं मिलती। तो मैंने कुछ नेट पे रिसर्च करके “फेम कप” मंगाया। यह एक सिलिकॉन का बना कप होता है जो पीरियड्स में यूज़ किया जाता है। https://en.wikipedia.org/wiki/Menstrual_cup

ये हज़ार से दो हज़ार के बीच में मिलता है और आप इसे पूरी उम्र यूज़ कर सकते हैं। फेकने की कोई समस्या ही नहीं क्यूंकि आप सिर्फ ब्लड फेंकते हैं जो पॉट में फेंका जा सकता है और इसको बेसिन में धो के फिर से इन्सर्ट कर सकते हैं। पीरियड्स ख़त्म होने पर इसे पानी में उबाल के साफ़ कर सकते हैं। मुझे एक कप को यूज़ करते हुए छः साल लगभग हो गए हैं, और ये मेरी बहुत सारी सहेलियां भी अब ये इस्तेमाल करती हैं। ये एनवायरनमेंट के लिए भी अच्छा है, क्यूंकि एक नैपकिन का रीसायकल होना बहुत मुश्किल है। और बस एक बार का खर्चा है! आपके कोई और सवाल हों तो आप मुझे कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं। आजकल ये इंडिया में भी मिलता है। – Anuradha Saroj


 

–  अनुराधा सरोज समाजसेवी  हैं और बालिकाओं की शिक्षा के लिए ‘जियो बेटी’ नामक संस्था चलाती हैं। इनकी आजादी मेरा ब्रांड  नामक पुस्तक धूम मचा चुकी है।

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