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आंकड़ों के खेल से मायावती को कमज़ोर करने की साजिश का पर्दाफाश

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(image credits: Deccan Herald)

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के नतीजों ने सारे समीकरण उलट-पुलट कर रख दिए, लोगो की कवायदों पर नतीजों ने पानी फेर दिया। प्रदेश में आये नतीजों का मामला इतना पेचीदा है कि आज तक नतीजों के विश्लेषण हो रहे हैं। जहां एक तरफ लोकसभा चुनाव में बसपा को बढ़त मिली वहीं सपा वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाई जैसा अंदाज़ा लगाया जा रहा था।

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आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मजबूत जातीय समीकरण के बावजूद महागठबंधन फेल क्यों हो गया? महागठबंधन में सपा बसपा का तालमेल नहीं बैठा या सपा बसपा के परम्परागत वोटर्स ने महगठबंधन का साथ नहीं दिया यह सवाल आज तक बना हुआ है। लगातार मीडिया में बड़े बड़े आंकड़े पेश किये जा रहे है जिसमे यह दिखाया जा रहा है की मायवती का साथ बहुजन समाज से छोड़ दिया है। आंकड़ों के पीछे की सच्चाई क्या है यह आंकड़े आये कहा से यह आज हम आपको बताएँगे।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने तरीके से विश्लेषण कर नतीजा निकाला कि समाजवादी पार्टी के यादव वोटर्स ने बीएसपी उम्मीदवारों को वोट नहीं किया। उन्होंने उपचुनाव में बीएसपी के अकेले लड़ने का ऐलान करते हुए कहा कि अखिलेश अपने परिवार की सीट तक नहीं बचा पाए। यादव वोटर्स ने चुनावों में महागठबंधन का साथ क्यों छोड़ दिया। 2014 के शून्य के मुकाबले 2019 की 10 सीटों पर जीत के बावजूद बीएसपी के इस विश्लेषण का अखिलेश ने संयमित जवाब दिया है। लेकिन फिर भी ये सवाल तो बनता ही है कि क्या सच में ऐसा है? यादव वोटर्स ने समाजवादी पार्टी का साथ नहीं दिया या बसपा के दलित वोट शिफ्ट हुए है।

गोदी मीडिया द्वारा दिखाए जाने वाले ताजा आंकड़े पर गौर करें तो आंकड़े बताते हैं कि यादव वोटर्स का साथ बड़े पैमाने पर महगठबंधन को मिला है वही दलित के वोट बिखरते नज़र आये है। उत्तर प्रदेश में चार बार मायावती के समय बसपा की सरकार रही है और उस समय बहुजनो के साथ के कारण ही यह जीत संभव हो पाई थी।

वही 2014 के नतीजों के बाद से उत्तर प्रदेश में दलितों के वोट क्यों शिफ्ट हो रही है। इंडिया टुडे एक्सिस माय इंडिया पोस्ट पोल सर्वे ने यादवों और दलितों की वोटिंग की स्टडी कर आंकड़े जारी किए है। इसके मुताबिक अनुसूचित जातियों में गैर जाटवों ने महगठबंधन पर भरोसा नहीं जताया। अब सवाल यह भी खड़ा होता है की यह आकड़े चुनाव परिणाम के बाद जारी किये जाये क्या इन आकड़ो पर भी भरोसा किया जा सकता है।


चुनाव के दौरान बड़ी मात्रा में EVM पर सवाल उठे और आंकड़े भी उसी EVM के आधार पर जारी किये गए है और इन्हे आंकड़ों का इस्तेमाल कर बसपा सुप्रीमो के खिलाफ किया जा रहा है।

आकड़ो में मीडिया द्वारा यह दिखाया जा रहा है की दलितों ने मायावती का साथ छोड़ दिया है। बीएसपी से मुंह मोड़कर इन्होंने बीजेपी को झोली भर-भर के वोट दिए हैं। आंकड़ों के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव में गैर जाटव जातियों के सिर्फ 30 फीसदी वोट महागठबंधन को पड़े। मायावती की बजाय इन्होंने बीजेपी पर भरोसा जताया है। करीब 60 फीसदी गैर जाटव जातियों ने बीजेपी को वोट दिया है। हालाँकि जारी किये गए यह आकड़े संदेहजनक है।

बताया जा रहा है की जिस समुदाय से मायावती खुद आती हैं, उस जाटव समुदाय में भी मायावती के प्रति भरोसे में कमी दिखती है। गैर जाटवों की तरह उन्होंने बीजेपी को खुलकर वोट तो नहीं किया है लेकिन पुराने वक्त जैसा यकीन भी नहीं रख पाए हैं। लोकसभा चुनाव में 74 फीसदी जाटवों ने महागठबंधन को वोट दिया है। तो इस जाति से बीजेपी को.21 फीसदी जाटवों ने बीजेपी को भी वोट किया है।

मीडिया द्वारा लगातार सभी जगह इन आकड़ो के आधार पर बसपा सुप्रीमो मायावती की लोकप्रियता को कम दिखने का प्रयास लगतार किया जा रहा है हालाँकि इन आकड़ो का आधार क्या है यह किसी को नहीं पता पर इतना समझा जा सकता है की गोदी मीडिया के द्वारा लगातार इन आंकड़ों का इस्तेमार महागठबंधन के खिलाफ किया जा रहा है।

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