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विमर्श

बौद्ध धर्म के पतन का कारण और भविष्य की दिशा

बौद्ध धर्म के पतन के बारे में बहुत स्पष्ट जानकारी नहीं है. लेकिन आधुनिक रिसर्च से आजकल कुछ बात स्पष्ट हो रही है. इस विषय को ठीक से देखें तो भारत में बौद्ध धर्म का पतन का और स्वयं भारत के एतिहासिक पतन और पराजय का कारण अब साफ़ होने लगा है. इस प्रश्न का सीधा संबंध वैज्ञानिक दृष्टि और अंधविश्वास के बीच में हुए लंबे संघर्ष से जुड़ता है. इस बात को समझना अब संभव हो रहा है. आज के भारत में शोषण दमन और अंधविश्वास से लड़ने वाले लोगों को ये बात समझनी बहुत जरुरी है. आइये इसमें प्रवेश करें.

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भारत सहित दुनिया भर में इंसानी समाज के शोषण की जो इबारत बनी है उसमे आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की बात ही मुख्य रूप से जमीन बनती आई है. किसी भी तरह के संगठित धर्म द्वारा रचा गया शोषण हो उसके आधार में उसकी मूल प्रेरणा की तरह आत्मा परमात्मा या पुनर्जन्म में से कोई एक या दो या तीनों तत्व अवश्य मिलेंगे. किसी भी धर्म को उठाकर देख लीजिये. यहाँ तक कि खुद बौद्ध धर्म में भी जब खुलकर पुनर्जन्म की वेदान्तिक अर्थ वाली व्याख्या प्रचलित हो गयी और इस व्याख्या के आधार पर जब राजसत्ता और राजनीति को सुरक्षा देने का षड्यंत्र रचा गया तब बौद्ध धर्म भी गरीबों और स्त्रीयों के शोषण का हथियार बन गया. इस बात को समझना जरूरी है. इसे दलाई लामा और तिब्बत के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है.

इसे एक नियम मानकर चाहिए कि अदृश्य, अव्यक्त, अगम्य, अगोचर और अस्पृश्य आदि के आधार पर दिव्यता की जो परिभाषाएं रची गयी हैं वे ही शोषण और पाखण्ड को जन्म देती हैं. जब तक बौद्ध धर्म में चार तत्वों या चार मूल-भूतों के आधार पर भौतिकवादी अर्थ की धर्मदृष्टि बनी हुई थी तब तक बौद्ध धर्म से गरीबों और स्त्रीयों सहित अन्यों को लाभ मिलता रहा. लेकिन जैसे ही बौद्ध धर्म में भी वेदांती अर्थ के पुनर्जन्म का व्यापार शुरू होता है वैसे ही बौद्ध धर्म बुद्ध की मूल शिक्षाओं से दूर हो जाता है और सामंतवादी राजसत्ताओं का साथी बन जाता है. इतिहास में इस बात के काफी प्रमाण मौजूद हैं कि अदृश्य अव्यक्त आदि की चर्चा को बुद्ध ने हमेशा नकारा है और जो कुछ तर्कबुद्धि से और आँखों से नजर आता है उसी की बात की जाए.

इसीलिये बुद्ध का जोर भौतिक जगत, इस लोक के जीवन और इस लोक की सच्चाइयों पर अधिक है. इसीलिये अनात्मा के सिद्धांत की वे प्रतिष्ठा कर सके. उनके अनात्मा के सिद्धांत का सीधा सीधा अर्थ यही बनता है कि कोई आत्मा या स्व नहीं होता आत्मा या स्व या असल में एक “सोशल कंसट्रक्ट” है उसका स्वयं में कोई आत्यंतिक मूल्य नहीं है बल्कि वो देश काल परिस्थिति के अनुसार जन्मता और नष्ट होता है. इसीलिये एक स्व या आत्मा के एक गर्भ से दुसरे गर्भ में जाने का प्रश्न ही नहीं उठाता, हर व्यक्ति दुनिया में पहली और आखिरी बार पैदा होता है. उसका न उससे पहले कोई जन्म है न उसके बाद कोई जन्म है. बुद्ध के लिए अनात्मा का बहुत सामान्य शब्दों में यही अर्थ है.

लेकिन बुद्ध के बाद स्वयं बौद्ध आचार्यों ने और बौद्ध धर्म से सामाजिक आर्थिक राजनीतिक लाभ उठाने वालों ने बौद्ध धर्म में अदृश्य अव्यक्त अगम्य और पारलौकिक की ब्राह्मणवादी बातें आरंभ कीं. ये बुद्ध की मूल शिक्षा के खिलाफ एक षड्यंत्र था जो खुद बौद्ध धर्म में घुस आये अवसरवादियों और सत्तालोलुपों ने आरंभ किया था. बुद्ध ने अपने जीते जी इस संभावना को देख लिया था इसलिए उन्होंने चालीस से अधिक अव्याख्य प्रश्न बना छोड़े थे जिनमे ये साफ़ सन्देश था कि पारलौकिक से जुडी किसी बात को वो पसंद नहीं करते हैं और उनके शिष्यों को भी ऐसे पारलौकिक की चर्चा से दूर रहना चाहिए. लेकिन बुद्ध की सलाह के बावजूद ये खेल क्यों शुरू हुआ इसे समझना जरुरी है. इसका एक महत्वपूर्ण एतिहासिक और राजनीतिक कारण है. इस कारण को दलितों बहुजनों, आदिवासियों और स्त्रीयों को समझ लेना चाहिए.


पिछले चालीस सालों में प्राचीन बौद्ध धर्म पर जो गहराई से रिसर्च हुई है उसमे बहुत नई तरह की बातें सामने आयीं हैं. उसमे न सिर्फ बौद्ध धर्म के पतन और ब्राह्मणवाद के उभार के कारणों की जानकारी मिलती है बल्कि यह भी पता चलता है कि ब्राह्मणवाद की सफलता से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म में अंधविश्वास और पुनर्जन्म का प्रचार भी भटके हुए बौद्धों ने आरंभ किया था. ये एक जटिल वक्तव्य है इसे कदम दर कदम समझना होगा.

बौद्ध धर्म या बुद्ध की शिक्षाएं मूल रूप से अनात्मा और अनीश्वरवाद पर आधारित थीं. इसके विपरीत ब्राह्मणों का ईश्वरवादी धर्म इश्वर और आत्मा सहित पुनर्जन्म के सिद्धांत पर खड़ा था. इतिहास में ये दोनों धर्म एक साथ बराबरी से चल रहे थे. प्राचीन समय में पश्चिमी भारत में पाकिस्तान, सिंध, वर्तमान दिल्ली से होते हुए गंगा जमुना के संगम तक इस ब्राह्मणी विचार का धीरे धीरे प्रवेश होता है. इसके विपरीत श्रमण धर्मों (बौद्ध, जैन और आजीवक) का विस्तार मुख्य रूप से पूर्वी भारत में अर्थात आज के उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड उत्कल बंगाल उत्तरपूर्व सहित दक्षिण में भी था. इसके ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण अब मिल चुके हैं.

भारत पर सिकंदर के आक्रमण के दौरान भी पश्चिमी भारत तक श्रमण दर्शन को मानने वाली फैलीं थीं. उनके बीच से रास्ता बनाते हुए ब्राह्मण आगे बढ़ रहे थे. सिकंदर की टक्कर श्रमण राजाओं से ही हुई थी. सिकंदर की मृत्यु के बाद उसके सेनापतियों से इन राजाओं ने जो संधियाँ कीं उसके कारण इस इलाके में फैले ब्राह्मणी धर्म के लिए और उसपर आधारित शुरुआती राज्यों के लिए एक भयानक संकट पैदा हो गया था. उस दौर के ब्राह्मणी धर्म में यज्ञ, हवन, कर्मकांड, मांसाहार और पशुबलि भयानक रूप से फ़ैली थी. लेकिन इन सबका स्वरूप कुछ अलग था, उस समय इनका स्वरूप समाज या राज्य को सम्मोहित करने के लिए नहीं बनाया गया था बल्कि ये छोटे छोटे समूहों में एकांत में किये जाने वाले कर्मकांड थे जिनका लक्ष्य ब्राह्मणवादी धर्म को मानने वाले कबीलों को संगठित रखना था.

लेकिन सिकंदर और श्रमणों की संधि के बाद इस इलाके में ब्राह्मणी अस्तित्व को निर्णायक खतरा पैदा हो गया. ऐसी स्थिति में उनके लिए जीवन मरण का प्रश्न खड़ा हो गया. इस दशा में उन्होंने खुद को बचाने के लिए एक भयानक निर्णय लिया, उन्होंने पूर्व की तरफ आगे बढ़ते हुए अदृश्य, अगम्य पर आधारित परलोक का जाल फैलाना शुरू किया. उन्होंने जनता में अंधविश्वास और अदृश्य के भय को फैलाते हुए अपने तन्त्र-मन्त्र और यज्ञ हवन आदि की दिव्यता का जहर फैलाना शुरू किया. अपने आप को अनुशासित करते हुए व्यक्तिगत जीवन में जैनों और बौद्धों की शुचिता और शाकाहार सहित कठोर तप और आत्मपीडन के श्रमण-योगिक व्यवहार को अपनाकर उसमे अपनी महारथ सिद्ध करके दिखाई और जनता को प्रभावित करना शुरू किया.

उन्होंने ये जतलाना शुरू किया की वे जैनों और बौद्धों से अधिक शाकाहारी और तपस्वी या सदाचारी हैं. जैनों और बौद्धों के इस व्यवहार को सीखकर उसका प्रदर्शन करने के साथ ही उन्होंने अपने मूल कर्मकांडी विचारों को जादू की तरह पेश किया और श्रमण बौद्ध सदाचार और तप के साथ ब्राह्मणी अंधविश्वास का एक भयानक गठजोड़ बनाया. इससे आम जनता तेजी से प्रभावित होने लगी. असल में ये गठजोड़ जनता के मनोविज्ञान को जकड़ने और राजनीति सत्ता हथियाने के लिए ही बुना गया था. इस काम में सफल होने के बाद ब्राह्मणी तकनीक ने एक करवट और ली, उन्होंने बाद की शताब्दियों में श्रमण धर्मों के सदाचार को गौण बनाते हुए कर्मकांड और अंधविश्वास को अधिक से अधिक मूल्य देना शुरू किया.

बाद में राजसत्ता और राज्य के उदय ने एक अन्य एतिहासिक भूमिका निभायी जिसने बौद्ध धर्म को भारत में पूरी तरह से खत्म कर दिया. ब्राह्मणों के पूर्व की तरफ बढने के दौर में भारत और अन्य पडौसी समाजों में अन्य ऐतिहासिक विकास भी हो रहा था. बड़े और संगठित राज्यों का उदय हो रहा था जो व्यापार और युद्ध पर आधारित थे. पूर्वी भारत के श्रमण धर्म जिस खेती आधारित और जनजातीय प्रष्ठभूमि में पैदा हुए थे वे गणों और गणतन्त्र पर आधारित थे. इन श्रमण राज्यों के विपरीत पश्चिम की तरफ से आक्रमण करने वाली शक्तियों की राजनीति मूलतः राजा के दैवीय वैधता के सिद्धांत पर और पिता से पुत्र तक आने वाली राजसत्ता के सिद्धांत पर आधारित थी जो कि सामंतवाद के प्राचीन रूपों से शक्ति प्राप्त करती थी. ये सामंती और दैवीय सिद्धांत पर खडी राजसत्ता अपनी जनता को अन्धविश्वासी बनाकर ताकत हासिल करती थी. स्वाभाविक रूप से ये सत्ताएं पूर्व में बसे श्रमण राज्यों और उनकी गण आधारित राजनीति से अधिक ताकतवर सिद्ध हुई. इस तरह श्रमण धर्मों पर आधारित राज्यों का पतन होने लगा.

इसका भी मूल कारण वही था कि आम जनता को राज्यसत्ता और राजा की दिव्यता से सम्मोहित करने का श्रमणों के पास कोई तरीका नहीं था. वे सोच भी नहीं सकते थे कि धर्म या तप या सदाचार से जुडी बातों को राजनीति या राज्य या राजा के पक्ष में षड्यंत्र की तरह कैसे इस्तेमाल करें. ये षड्यंत्र ब्राह्मणों का नया और खतरनाक आविष्कार था. उन्होंने अपने आप को बचाने के लिए ऐसे-ऐसे सिद्धांत और कर्मकांड रचे जिन्हें देखकर आम जनता इश्वर और अदृश्य से भयभीत हो जाती थी और इसके बाद राजाओं और राज्य ने ये समझ लिया कि ब्राह्मणों का ये हुनर आम जनता को बड़ी आसानी से काबू कर लेता है और इस तकनीक का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जा सकता है.

धीरे धीरे ये बात तय हो गयी कि राज सत्ता को मजबूत करने या फैलाने की दृष्टी से श्रमण धर्म के आचार्यों और गुरुओं से कोई लाभ नहीं होने वाला है. साथ ही उन्होंने ये भी समझ लिया कि ब्राह्मणों की ये परलोकवादी कर्मकांडीय तकनीक जनता को अधिक प्रभावित करने लगी है, तब तत्कालीन राजसत्ताओं ने ब्राह्मण गुरुओं को मौक़ा दिया कि वे जनता में इश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म आदि का भय फैलाकर राज्य और राजसत्ता को अतिरिक्त वैधता देते हुए राजाओं की मदद करें. यही ब्राह्मण चाहते थे, इसके बाद ब्राह्मणों ने राजा और इश्वर के लिए जो सिद्धांत रचे और जिस तरह से राजा को इश्वर का प्रतिनिधि बताना आरंभ किया वह स्वयं में एक इतिहास है. ये तकनीक बहुत सफल रही. इसके जवाब में बौद्धों, जैनों और आजीवकों के पास कोई तरीका नहीं था.अंधविश्वास के खिलाफ लिए गये उनके पुराने निर्णय उभरती हुई नई राजसत्ताओं के दौर में उन्ही पर भारी पड़ गये और अंधविश्वास को अपना गुरुमंत्र बना चुके ब्राह्मणवाद की जीत शुरू हो गयी.

बाद के इतिहास में साफ़ नजर आता है कि राजाओं ने ब्राह्मणी तकनीकों के आधार पर सफलता से आम जनता को काबू में रखा और लंबे समय तक राज करने में सफलता पायी. इसी सफलता के दौर में वर्ण और जाति सहित जातिगत व्यवसाय की प्रस्तावनाएँ रचीं गयी जिससे राजा और इश्वर की सम्मिलित सत्ता को चुनौती न दी जा सके. इस पूरे फ्रेमवर्क में राजा और इश्वर दोनों को एकसमान महत्त्व दिया गया. इतना ही नहीं इश्वर को भी सम्राट की तरह ही चित्रित किया गया. ये बातें राजाओं को बहुत पसंद आयीं. इससे प्रसन्न होकर उन्होंने ब्राह्मणों को राजगुरु की तरह प्रचारित और इस्तेमाल किया. इस तरह ‘राजा, इश्वर और ब्राह्मण’ का ये गठजोड़ अपने अंधविश्वास के ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर बौद्ध जैन और आजीवक धर्म से जीत गया.

इस हार के बाद जैन और आजीवक भारत में ही या तो समाप्त हो गये या ब्राह्मणी सत्ता से समझौते करके उनके साथ जीने लगे. लेकिन बौद्धों के कई आचार्यों ने दूसरे देशों में पलायन किया. लेकिन इस हार की स्मृति उनके दिमाग में हमेशा जीवित रही. वे समझ गये कि अंधविश्वास के बिना जनता और राजसत्ता को प्रभावित करना मुश्किल है. इसलिए उन्होंने दूसरे देशों में और भारत में (जिन इलाकों में अभी भी उनका प्रभाव था) ब्राह्मणों की सफलता को दोहराते हुए खुद अपने दर्शन में अंधविश्वास परलोक और पुनर्जन्म आदि का आविष्कार किया. चीन में जिस तरह का महायान उन्होंने विकसित किया वो इसी अनुभव और ज्ञान पर आधारित था.

चीन के राजवंशों ने भी इस बात को धीरे धीरे समझ लिया कि ये तकनीक उनकी खुद की राजसत्ता के लिए कितनी काम की साबित हो सकती है. इसीलिये इन चीनी राजाओं ने बाद के बौद्ध आचार्यों को खूब सम्मान से आमंत्रित करना शुरू किया. इसी क्रम में आचार्य पद्मसंभव ने एक बड़ा प्रयोग किया और तिब्बत में पुनर्जन्म को प्रचारित किया. उस विचार की शक्ति को भांपते हुए दलाई लामा नाम की एक संस्था उभरी. दलाई लामा के नाम से राज करने वाले राजाओं ने ब्राह्मणी अंधविश्वास को अपने राज्य और सत्ता को वैधता देने का मुख्य उपकरण बना लिया और तन्त्र मन्त्र सहित न जाने कैसे कैसे अंधविश्वासों के आधार पर पूरी जनता के मनोविज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर लिया. भयभीत और प्रभावित जनता ने इसके बाद कभी गरीबी, शोषण और दमन के खिलाफ आवाज नहीं उठाई. सैकड़ों साल तक ये तकनीक काम करती रही, इससे तिब्बत गरीब से गरीब और अंधविश्वासी होता गया ठीक उसी तरह जैसे भारत गरीब कमजोर और नाध्विश्वासी होता गया.

ब्राह्मणी अंधविश्वास के आधार पर जनता को भयभीत बनाये रखते हुए राजसत्ताओं ने खूब धन बटोरा, राज्य विस्तार किया और लंबे समय तक राज किया लेकिन इसकी वजह से आम जनता में ज्ञान विज्ञान, तर्क, बुद्धि, साहस, उद्यम, तकनीक और सामूहिक प्रयास सहित राष्ट्र की अवधारणा का कोई विकास नहीं हो सका. एक तरफ तिब्बत में बौद्ध राजा ब्राह्मणी अंधविश्वास का सफल प्रयोग कर रहे थे और दूसरी तरफ भारत में भी इसका बड़े पैमाने पर प्रयोग हो रहा था. फिर जैसा कि होना ही था, जनता और पूरा देश राजनीतिक, सामाजिक चेतना से दूर होता गया और सभ्य और शिक्षित और समर्थ न हो सका. बाद में जब मुस्लिमों, ब्रिटिशों के आक्रमण आरंभ हुए तो भारत उनके सामने नहीं टिक सका. उधर साम्यवादी क्रान्ति के बाद उभरे नये चीन के सामने तिब्बत ने जिस बेचारगी और लाचारी का प्रदर्शन किया वो भी भारत की पराजय का ही एक अन्य रूप है.

इन दो मुल्कों के उदाहरण से साफ़ नजर आता है कि राजाओं और राजसत्ता ने अंधविश्वास से भरे ब्राह्मणी प्रचारतंत्र के आधार पर सफलता हासिल की. उसी सफलता को वे आज और अगले दौर में भी दोहराना चाहते हैं. इसके विपरीत श्रमण दर्शनों – बौद्धों जैनों आजीवकों – ने अंधविश्वास को सामाजिक नियंत्रण के उपकरण की तरह कभी इस्तेमाल नहीं किया. इससे ये साफ़ पता चलता है कि आधुनिक दौर की लोकतांत्रिक और तर्कबुद्धि से संचालित राजनीति या जीवनशैली के लिए श्रमण दर्शन अधिक उपयोगी सिद्ध होंगे. अब विज्ञान और तकनीक के दौर में जनता को अशिक्षित और अंधविश्वास से भयभीत बनाते हुए एकजुट करने की जरूरत नहीं है.

इसके विपरीत आज के और भविष्य के लोकतान्त्रिक समाज में जनता को सुशिक्षित और जागरूक बनाकर अधिक आसानी से और अधिक सृजनात्मक ढंग से संगठित किया जा सकता है. यूरोप ने पुनर्जागरण के बाद जिस तरह की राजनीति और समाज दर्शन बनाया है उसमे अंधविश्वास से भयभीत जनता को नहीं बल्कि वैज्ञानिक बोध से जागी हुई जनता को आधार बनाया गया है. इसके विपरीत अरब, मध्यपूर्व, और भारत सहित दक्षिण एशिया के अन्य देशों में अभी भी राजसत्ता और धर्मसत्ता के गठजोड़ का अन्धविश्वासी ब्राह्मणी माडल चल रहा है. अगर ये देर तक चलता रहा तो ये मुल्क प्राचीन भारत और तिब्बत की तरह फिर से कमजोर होकर गुलाम होंगे. यूरोप ने जिस तरह से अपने समाज को अपनी राजनीति, अर्थव्यवस्था, विज्ञान तकनीक आदि को विकसित किया है उसका मुकाबला कोई भी “राजा-इश्वर-ब्राह्मणवाद” की त्रिमूर्ति और अंधविश्वास पर खड़ा समाज या देश नहीं कर सकता.

आज के दलितों, बहुजनों, आदिवासियों और स्त्रीयों को इस बात से शिक्षा लेते हुए ये ध्यान रखना चाहिए कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में अंधविश्वास को घुसने न दिया जाए. इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म – ये तीन ऐसे जहरीले हथियार हैं जिनमें से कोई एक भी आपको और पूरे मुल्क को हजारों साल के लिए बीमार कर सकता है. इनसे बचकर रहना जरुरी है और वर्तमान ब्राह्मणवादियों सहित दलाई लामा जैसे पुनर्जन्म के अंधविश्वास पर जीने वाले राजनेताओं से सावधान रहना चाहिए. दलाई लामाओं ने बहुत होशियारी से पुनर्जन्म के अन्धविश्वास के आधार पर निष्कंटक राज किया है इसी से उनकी सभ्यता संस्कृति और देश बर्बाद हुआ. दुर्भाग्य की बात है कि अपने देश और संस्कृति को बर्बाद करने वाले इन महोदय को दुनिया भर में ज्ञान के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है.

हालाँकि इसका अपना राजनीतिक कारण है. यूरोप अमेरिका के देश इन महोदय को चीन के खिलाफ अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. इन सज्जन से पूछा जाना चाहिए कि आपका दिव्य ज्ञान आपके अपने लोगों देश और संस्कृति को अगर बर्बाद कर चुका है तो आपको जगत में ज्ञान बांटने का क्या अधिकार है? इस बात को भारत के दलितों को भी समझना जरुरी है. आजकल बहुत सारे दलित, बहुजन भाई बहन बौद्ध धर्म के गुरु के रूप में दलाई लामा से बहुत प्रभावित हो रहे हैं. ये एक खतरनाक बात है.

अंतिम रूप से मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि भारत के गरीबों दलितों बहुजनों और विशेष रूप से स्त्रीयों को वैज्ञानिक विश्लेषण पर खड़े श्रमण दर्शनों औ प्राचीन भारतीय भौतिकवाद का अध्ययन करना चाहिए. हालाँकि एसा करते हुए यह नहीं माना जा सकता कि प्राचीन बौद्ध धर्म अगर लौट आयेगा तो भारत में या भारत के शोषितों और स्त्रीयों के जीवन में खुशहाली आ जायेगी. एक बात हजार बार नोट कर लेनी चाहिए कि अतीत के सभी धर्म अब हमारे किसी काम के नहीं हैं. सबका अपना हिंसक, पाखंडी और अन्धविश्वासी इतिहास रहा है.

हमें अपने भविष्य के लिए अतीत से आने वाले या अतीत के किसी स्वर्णयुग की प्रशंसा करते हुए किसी भी धर्म को आधार नहीं बनाना है. बल्कि हमें भविष्य की तरफ देखती हुयी लोकतांत्रिक चेतना और तर्कबुद्धि का सहारा लेना है. अब चूँकि इस आशय से तुलनात्मक रूप से बुद्ध सबसे वैज्ञानिक नजर आते हैं इसलिए मैं बुद्ध की प्रशंसा कर रहा हूँ. प्राचीन बौद्ध धर्म और महायान का इतिहास भी दलितों के लिए बहुत उत्साहवर्धक या आश्वासन देने वाला नहीं कहा जा सकता. लेकिन इतना जरुर कहा जा सकता है कि बुद्ध की मूल अनात्म्वादी और अनीश्वरवादी शिक्षाएं भविष्य के भारत के लिए उपयोगी सिद्ध होंगी. ये बात याद रखी जानी चाहिए कि तर्कबुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टि इसलिए महान नहीं हैं क्योंकि उन्हें बुद्ध ने प्रचारित किया है, बल्कि बुद्ध इसलिए महान हैं क्योंकि उन्होंने तर्कबुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टि का प्रचार किया है.

जो लोग बुद्ध या बौद्ध धर्म में आश्वासन खोज रहे हैं उन्हें अपने नजरिये में एक बात और जोड़ लेनी चाहिए कि बुद्ध या बौद्ध धर्म अगर उन्हें अधिक तर्कशील या वैज्ञानिक नहीं बना रहा है तो उनकी बुद्ध की शिक्षाओं की समझ में कुछ कमी है और इस कमी का फायदा उठाकर अन्धविश्वासी ताकतें उन्हें फिर से गड्ढे में गिरा सकती हैं. इसीलिये डॉ. अंबेडकर ने प्राचीन या ज्ञात बौद्ध धर्म को नहीं चुना बल्कि उन्होंने वैज्ञानिक और लोकतान्त्रिक चेतना दृष्टि पर आधारित बौद्ध धर्म का आविष्कार किया है.

ये नया धर्म या नवयान सफल होगा या नहीं ये बात महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन ये बात अधिक महत्वपूर्ण है कि शोषितों दलितों की मुक्ति के लिए डॉ. अंबेडकर ने किस तरह के बुद्ध या बौद्ध धर्म को चुना या निर्मित किया है. इसका मतलब साफ़ है. हमें अतीत से आने वाले रेडीमेड बौद्ध धर्म में नहीं बल्कि ज़िंदा और भविष्य की फ़िक्र करने वाली “बुद्ध-दृष्टि” की आवश्यकता है. ये बात बहुत बहुत महत्वपूर्ण है. इस प्रकार बुद्ध और बुद्ध की शिक्षाओं में आश्वासन खोजने वाले लोगों के कंधों पर अपने भविष्य के हित लिए ही नहीं बल्कि भारत के भविष्य के हित लिए भी एक बड़ी जिम्मेदार आन पड़ी है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं। संजय जोठे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में शोधार्थी हैं।)

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