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औरतें तुम्हें उसी अंग से इस दुनियां में लाती हैं, जिसके लिए तुम उसकी जान ले लेते हो

स्त्री अंगों की चाहत…

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एक औरत को असहनीय पीड़ा और जानलेवा दर्द दे कर, दो टांगो के बीच से जन्म लेने के बाद। तुम पैदा होते ही उसके जीवनदाई स्तनों से अपनी भूख मिटा कर, तुम तैयार होते हो दुनिया की पथरीली राह में अपने नन्हें कदम रखने को उसी औरत की उंगली थामे जिसके बिना तुम्हारा अस्तित्व ही न रह पाता इस जहांन में।

फिर तुम जवान होने लगते हो और एक बार फिर तुम्हें उन्हीं दो अंगों की ज़बरदस्त जरूरत होती है। नतीजा…

तुम नर से पशु बन जाते हो। तुम्हारे लिए जीने का अर्थ सिर्फ उन्हीं दो अंगों को हासिल करना होता है। तुम स्त्री के उन अंगों की इज़्जत नहीं करते जिनकी वजह से तुम आज छः फुट के बलिष्ट पुरुष बन सके हो। अब तुम याचक नहीं हो जो अपनी मां के आंचल में कुछ देर दुनिया की नज़र से छुप कर अमृतपान करना चाहते हो।

अब तुम मर्द बन मर्दन करना चाहते हो। कुचलना चाहते हो, मसलना चाहते हो, वीभत्सता की सारी हदों को पार करना चाहते हो। पर क्यूं करते हो ऐसा???


क्या उन अंगों को पाने का लालच इतना होता है कि भूल जाते हो कि किसी दिन एक औरत ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी तुम्हें सांसें देने में। आज तुम रत्ती भर नहीं हिचकते किसी की सांसों को रोक देने में। एक खरोच तक नहीं लगने देती थी जब तक तुम पूरी तरह से आश्रित थे उसके रहमों करम पर। आज तुम उसी स्त्री जाति को मसल देते हो और लांघ जाते हो वीभत्सता की पराष्ठा भी।

ये कैसी कुत्सित मानसिकता है कि पहले बर्बरता पूर्ण बलात्कार करते हो और फिर हत्या। सुनों, कभी हाथ नहीं कांपे तुम्हारे? कभी विचार नहीं आया कि जननी वर्ग से ऐसा भयावह कृत्य क्यूं? औरतें जान जोखिम में डाल तुम्हें उसी अंग से इस दुनियां में लाती हैं। और तुम उसी अंग के लिए उनकी जान ले लेते हो।

क्या कभी समझ पाओग ज़मीन आसमान के इस फर्क को?

– ये लेखिका के निजी विचार हैं।

 

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