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तलवार लिए ये बन्दरछाप नेता ही 2019 में बीजेपी का रथ रोकेंगे

अगर आज राज्यों के चुनाव हो जाएं तो नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी की जीत सुनिश्चित कही जा सकती है लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में ऐसा नहीं होने जा रहा। और अगर मैं एक कदम आगे बढ़ के कहूँ तो मोदी जी की अगुवाई में बीजेपी की हार भी हो सकती है तो चौंकिएगा मत बशर्ते विपक्ष महागठबंधन बना के साथ लड़े।

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अगर मोदीजी हारे तो उनकी हार का सबसे बड़ा कारण होगा एक खास समुदाय के प्रति देशभर में हो रही हिंसा, जिसके लिए सीधे तौर पे बीजेपी की केंद्रीय सरकार और उसकी चुप्पी को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। हालांकि मोदी जी बीच-बीच में इस मामले पे बोलते हैं लेकिन आरोपियों-दोषियों के दिनोदिन बढ़ते हौसले उनकी सरकार का इक़बाल खत्म कर रहे हैं। और ये बात सरकार के थिंक टैंक के लिए चिंता की बात होनी चाहिए।

अगर इसे इतिहास की पुनरावृत्ति कहें तो ये ठीक वैसा ही होगा जिस तरह ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारों और मीडिया की वाहवाही-घोर समर्थन के बावजूद अटल बिहार वाजपई की सरकार रोड शो कर रही निर्बल सोनिया गांधी से हार गई थी। तब वाजपई जी ने आत्ममंथन करते हुए अपनी हार का जिम्मेदार गुजरात के दंगों को ठहराया था।

https://www.youtube.com/watch?v=mk2MkawCUj4

सो अगर मोदीजी हारे तो उनकी हार के बीज यहीं छुपे हुए हैं। दरअसल इस देश की 97 फीसद से ज्यादा जनता शांतिप्रिय और न्याय पसन्द है। वो अन्य धर्मों-समुदायों के साथ मिलकर सदियों से एक साम्य कोरस में जीवन बसर करती आ रही है। कितने राजा, शहंशाह व सम्राट आए और चले गए लेकिन उन्होंने जनता के बीच के इस साम्य को तोड़ने की कभी कोशिश नहीं की। पर अभी एक खास समुदाय को निशाना बनाकर देश में जो हो रहा है, वो जनता के बीच सदियों से बने उस साम्य को डिस्टर्ब कर रहा है, जिससे इस देश की बहुसंख्यक जनता नरेन्द्र मोदी की सरकार से नाराज़ होती जा रही है। सोशल मीडिया ने कोढ़ में खाज का काम किया है।

अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते ये वीडियो तेज़ी से वायरल हो जाते हैं और देश के हर भाग में पहुंचते हैं जो इस देश की बहुसंख्यक जनता को रास नहीं आते। धीरे-धीरे उनमें ये धारणा प्रबल होती जा रही है कि विकास के नाम पे केंद्र में आई मोदी सरकार अपने असल एजेंडे से भटक गई है और धर्मांध उत्पातियों को प्रश्रय दे रही है। इस कारण बहुत तेज़ी से मोदी सरकार से उनका मोहभंग होता जा रहा है और अगर हालात यही रहे तो 2019 के चुनाव में इसकी परिणति दिख सकती है।


कल ही फेसबुक पे एक वीडियो देखा जो जमशेदपुर का बताया जाता है। उसमें एक फेरीवाले को बहुसंख्यक समुदाय के लोग बुरी तरह पीट रहे थे। ट्रेंड देखें तो ऐसे मामलों में कारण कुछ भी गिना दिए जाते हैं और ज्यादातर मामलों में छुटभैये नेता हाई कमान की नज़र में आने के लिए अपने गुर्गों के साथ मिलकर ऐसी घटना को अंजाम देते रहते हैं। हाथ में तलवार लिए ये बन्दरछाप नेता 2019 में बीजेपी का रथ रोक सकते हैं। यकीन मानिए ऐसे हालात में चुनाव जीतने के लिए विपक्ष को ज्यादा मेहनत करने की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी। बस उसे एक रहना होगा। भारत की जनता गली चौराहों पे खून खराबा मारपीट नहीं चाहती। ये तालिबानी समाज नहीं है।

https://www.youtube.com/watch?v=E9t_k2056nQ

दूसरी बात। नोटबन्दी से लेकर नीति आयोग तक के प्रयोग में मोदीजी की सरकार आर्थिक फ्रंट पे कमाल नहीं दिख पाई है। महंगाई-बेरोज़गारी बढ़ी है और बीजेपी के जीते सांसद जनता से कट गए हैं। नीति आयोग में धूमधाम से लाये गए अरविंद पनगढ़िया जिस तरह बीच रास्ते में ही मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए हुए हैं (हटाये गए हैं), उससे ये साफ पता चलता है कि संगठन-पार्टी और सरकार के स्तर पर किस तरह उच्चस्तरीय सामंजस्य का अभाव है। अरुण जेटली जी (एक आदमी) लंबे समय से वित्त और रक्षा जैसे दो दो महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले हुए हैं जबकि देश आर्थिक और सामरिक झंझावातों से जूझ रहा है। आपको क्या लगता है कि जनता मूर्ख है? उसे कुछ समझ नहीं आता!! मीडिया सरकार की कितनी भी चापलूसी कर ले लेकिन जनता को पता है कि उसके घर और समाज के हालात क्या हैं।

ये बात वाजपई जी जानते थे फिर भी राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसकर चुनाव हार गए। एक बार तो खिसियाकर उन्होंने सार्वजनिक रूप से कह भी दिया था कि न टायर्ड न रिटायर्ड, आडवाणी जी के नेतृत्व में विजय पथ की ओर प्रस्थान। मोदीजी को तो समानांतर चैलेंज करने वाला भी कोई नहीं। फिर भी पता नहीं क्यों वे उपद्रवियों से सख्ती से पेश नही आ रहे??!!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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