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विमर्श

राजनीति में विश्वासघात के लिए कुख्यात रहे हैं नीतीश कुमार!

जो लोग आज जदयू के अंदर नीतीश कुमार की ज़्यादती व शरद यादव की रहस्यमयी व मानीखेज चुप्पी को भावुकता के चश्मे से देखते हैं, वो शायद भूल रहे हैं कि अपने उन्नयन व पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र को कुचलने के लिए, विरोध के हर संभव स्वर को तहस-नहस करने हेतु नीतीश ने हर अनैतिक काम किया। जिस जॉर्ज फर्णांडीस ने नीतीश को ‘बाल गाँधी’ की छवि अता की, उन्हीं का टिकट चाटुकारों के कहने पर 2009 के लोकसभा चुनाव में मुज़फ्फरपुर से काट दिया। जेएनयू छात्रसंघ के संयुक्त सचिव रहे कद्दावर और शिक्षाविद् नेता दिग्विजय सिंह का टिकट काटकर उन्हें अपमानित किया। हालाँकि, उन्होंने बाँका से निर्दलीय चुनाव जीतकर नीतीश कुमार को करारा सियासी तमाचा जड़ा और साबित किया कि जनतंत्र में जनता किसी की जागीर नहीं हुआ करती।

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तीन बार पार्टी के अध्यक्ष रह चुके शरद यादव, जो तीन-तीन राष्ट्रीय सरकार / गठबंधन के संयोजक रहे, तीन अलग-अलग राज्यों (मध्य प्रदेश– जबलपुर सीट, उत्तर प्रदेश– बदायूँ सीट और बिहार– मधेपुरा सीट) से लोकसभा का चुनाव जीतने वाले देश के चौथे मात्र सांसद हैं और राजनीतिक संकट-प्रबंधन के कुशल योद्धा हैं; के परामर्श की भी नीतीश पूरी तरह अनदेखी करते रहे हैं।

बहुत वक़्त नहीं हुआ, जब दो साल पहले यही नीतीश कुमार अपनी सरकार को बचाने हेतु लालू प्रसाद की पूरी पार्टी को तोड़ने में लगे हुए थे। उसके पूर्व रामविलास पासवान की लोजपा के विधायक दल का ही छलपूर्वक अपने दल में विलय करा लिया था। थोड़ा और अतीत में लौटें, तो 2005 में पासवान के 29 विधायकों में 17-18 विधायकों को तोड़कर अपने पक्ष में कर लिया और लोक जनशक्ति पार्टी टूटते-टूटते बची थी। उस वक़्त नरेंद्र सिंह लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे और पार्टी को पॉकिट में लेकर चलते थे। आगे चलकर वही नरेंद्र सिंह माँझी को ताड़ पर चढ़ाकर नीतीश को मुँह चिढ़ा रहे थे। बिहार के लोग कहते हैं कि ऐसा निर्लज्ज नेता बिहार में कम ही पैदा हुआ है।

https://www.youtube.com/watch?v=OGimnOWZ8is&t=9s

आज जिस पासवान जी के मंझले भाई पशुपति पारस को पशुपालन मंत्री बनाया गया है, उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि 2009 में रामविलास पासवान को हाजीपुर में हराने के लिए अपनी तरफ से कई पासवान उम्मीदवारों को आर्थिक साधन से लैस कर निर्दलीय लड़वाया। सभी निर्दलीय प्रत्याशियों को कुल मिलाकर 52 हज़ार के आसपास वोट मिले और पासवान मात्र 38 हज़ार वोटों से पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास से हारे। फिर, समस्तीपुर से पासवान के छोटे भाई रामचंद्र पासवान के ख़िलाफ़ नीतीश ने पासवान के ही ममेरे भाई महेश्वर हज़ारी को घर में ही आग लगवाकर उतारा और लगातार दो बार से जीत रहे रामचंद्र बुरी तरह हारे। पाटलिपुत्र से लालू प्रसाद के विरुद्ध उनके कभी अति निकटस्थ रहे व बाद में धुर विरोधी हो चुके रंजन यादव को लोजपा से तोड़कर अपने दल में लाकर चुनाव लड़ा दिया और लालू के ख़िलाफ़ हर दाँव चलकर उन्हें शिक़स्त दिलायी।

बेंजामिन डिजरेली ने अपनी रचना सिबिल में ठीक ही कहा है, “The world is weary of statesmen whom democracy has degraded into politicians”.


रामविलास पासवान के गृह विधानसभा अलौली, जहाँ से वो 1969 में कद्दावर कांग्रेसी नेता मिश्री सदा (जो बाद में शिक्षा राज्य मंत्री भी बने थे) को हराकर विधानसभा पहुँचे थे; 2010 में पासवान के मँझले भाई पशुपति कुमार ‘पारस’, जो 1977 से लगातार (एक बार छोड़कर) जीत रहे थे (द्रष्टव्य :2000 में जबकि नीतीश चंद दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे, तो यही पारस उनके साथ उपमुख्यमंत्री बनने वाले थे); के विरुद्ध राजकुमार सदा को उतारा। यहाँ से पारस को हराने के लिए नीतीश ने पूरे बिहार से हर जाति व धर्म के नेताओं को लाकर अलौली में कैम्प करा दिया और अपना स्तर गिराकर इस मक़सद में क़ामयाब रहे। इतना ही नहीं, पासवान के पटना के ह्वीलर रोड स्थित पार्टी कार्यालय को वहाँ से हवाई अड्डे की निकटता व कुछ नियमों का हवाला देकर विस्थापित कराने के लिए नीतीश ने एड़ी-चोटी एक कर दिया। मगर, पटना हाइ कोर्ट द्वारा आदेश पर रोक लगने के चलते इसमें उन्हें मुँह की खानी पड़ी।

15 के चुनाव से पहले वही शकुनी चौधरी नीतीश के लिए वाकई शकुनी साबित हुए, जिनके बेटे सम्राट चौधरी को उन्होंने लालू की पार्टी से तोड़कर अपनी तरफ किया था और माँझी के मंत्रीमंडल में नगर विकास मंत्री बनवाया। वो तो समय रहते लालू प्रसाद का तगड़ा सूचना तंत्र नीतीश के कुत्सित मंशे पर पानी फेर गया, वरना लालू की पार्टी को टूटने से कोई बचा नहीं सकता था।

https://www.youtube.com/watch?v=0AvBPjIuw-s&t=315s

नीतीश कुमार को जो निकट से जानते हैं, वे ये मानते हैं कि नीतीश अपने विरोधियों को नेस्तनाबूद करने में पूरी निष्ठुरता व निर्ममता से प्रहार करते हैं। हर स्तर पर गिरकर अपनी सारी ऊर्जा झोंककर, तमाम सियासी शस्त्रास्त्रों का प्रयोग कर मैदान में उतरते हैं और कई बार न्यूनतम राजनीतिक शालीनता व राजधर्म भी भूल जाते हैं। आज नीतीश कुमार शरद जी को पार्टी फ़ोरम पर अपनी बात रखने को कह रहे हैं, पार्टी का पर्याय बन चुके जदयू के सरसंघचालक नीतीश ने पार्टी को पार्टी समझा ही कब, अपनी जागीर समझ कर पार्टी को गाय-माल की तरह हांका, बिहार में 8 साल तक संघ को अपना पैर पसारने का भरपूर अवसर मुहैया कराया व शासकीय संरक्षण दिया। आज फिर से लंबी विरह-वेदना के बाद वो जय श्री राम उचारते हुए गा रहे हैं – मेरा पिया घर आया, ओ राम जी…

जो आदमी जार्ज फर्नांडिस, दिग्विजय सिंह को ठेंगा दिखा सकते हैं, वो शरद जी के क्या होंगे! पर, यहाँ व्यक्तिविशेष मायने नहीं रखता। कोई भी सामाजिक न्याय व सांप्रदायिक सौहार्द के लिए लड़ने वाला पहला व आख़िरी योद्धा नहीं है। लड़ेंगे लड़ने वाले कि जिनमें ग़ैरत बाक़ी है, कि जिन्होंने जमीर का सौदा नहीं किया है।
आज नवाज़ देवबंदी याद आ रहे हैं :

सफ़र में मुश्किलें आयें तो ज़ुर्रत और बढ़ती है
कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है।
अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अक़्सर
न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है।

(लेखक जेएनयू में रिसर्च स्कॉलर हैं।)

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