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आपके डेयरी प्रोडक्ट में हमारे किसान भाईयों के खून का स्वाद तो नहीं?

बिहार के कथित सहकारी संस्था कम्फेड किसानों से न्यूनतम 18 रुपये प्रति लीटर दूध लेती है और उसी दूध को 40 रुपये प्रति किलो से अधिक में बेचती है। वहीं महाराष्ट्र में गाय के दूध की न्यूनतम कीमत 27 रुपये प्रति लीटर है। दूध के रखरखाव में इतने मार्जिन का खर्च होने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। लेकिन फिर भी सरकार के संरक्षण में कथित सहकारी संस्था किसानों के साथ विडम्बनापूर्ण खेल खेलती है।

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आपको पानी 20 रुपये लीटर से लेकर 60 रुपये लीटर में आसानी ने गांव-कस्बा तक में उपलब्ध हो जाएगा। लेकिन हाड़-मांस जलाकर गाय-भैंस पालकों के दूध की कीमत 19 रुपये प्रति लीटर। सरकार ने पशुपालन को कृषि का दर्जा नहीं दिया है। पशुपालन जैविक खेती और कुपोषण से लड़ने का सर्वश्रेष्ठ सहायक हथियार है। लेकिन सरकार ने कभी भी इस पर खास ध्यान नहीं दिया।

राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति जहां दूध की खपत 350 ग्राम है वहीं बिहार में ये खपत मात्र 184 ग्राम प्रति व्यक्ति है। दूध उत्पादन में बिहार का देश में 9वां स्थान है। पूरे देश में करीब 14.63 करोड़ लीटर दूध का उत्पान होता है वहीं इसमें बिहार की हिस्सेदारी महज 5.6 % है। बिहार में दूध के लिए कम्फेड जैसी कथित सहकारी संस्था के जरिए सरकार पशुपालकों का दोहन करती है।

कम्फेड के तहत पांच दुग्ध उत्पादक संघ हैं जो करीब 13 हजार समितियों के जरिये अपना व्यवसाय करते हैं। आपको जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हमारे ही देश में अमूल के जरिये गुजरात जैसे राज्यों में पशुपालक की स्थिति के साथ ही दुध उत्पादन में बढ़ोतरी का रिकॉर्ड बनाया। आज अपने ही देश में ऐसे नजीर रहने के बाद भी बिहार सरकार ने उससे कुछ खास सीख नहीं लिया है।

नतीजा पशिपालक तेजी से पशु पालन छोड़ने को विवश हैं। आप पंजाब जाइये जहां पशुपालन को लेकर सरकार (चाहे किसी भी दल की हो) इतनी ज्यादा गंभीर है कि आज करीब 10 साल पहले लगातार शोध के बाद विश्व में सबसे ज्यादा दूध देने वाली नस्ल हबरधेनू का विकास कर किसानों को सहज उपलब्ध करवा रही है यही नहीं गाय के बच्चों में बाछा की संख्य रोककर बाछी की संख्या बढ़ाने के लिए सटरा सीमेन को किसानों तक अनुदानित दर पर पहुंचाने का कार्य कर रही है।


बिहार सरकार के यहां कहने के लिए पशुपालन विभाग है लेकिन ये पशुपालन विभाग क्या करता है अभी तक मैं समझ नहीं पाया हूं। कहने के लिए कम्फेड को केंद्र सरकार की संस्था एनएसडीसी (NSDC) से करीब 704 करोड़ का लोन मिला है। बिहार सरकार ने बड़े-बड़े अक्षरों में अखबारों के जरिए प्रचार करवाया कि बेरोजगार युवाओं के लिए पशुपालन लोन 50 % अनुदान के साथ उपलब्ध है लेकिन जहां तक मैं सफर करता हूं, लोगों से मिलता हूं एक भी ऐसा लाभार्थी नहीं मिला है जिसे सरकार से पशुपालम के लिए लोन मिला है।

इसके लिए सिर्फ कम्फेड जिम्मेदार है या कम्फेड की आड़ में अपनी राडनीतिक रोटियां सेंकने वाले राजनेता। क्या कैमरे के सामने बैठे या बंद एसी कमरे में बैठे लोगों को किसानों के इस दर्द का अंदाजा लग सकता है? क्या हमारे नेता, हमारे जन-प्रतिनीधि किसानों के इस दर्द को समझ सकते हैं? हम सरकार से किसी तरह के अनुदान की मांग नहीं करते हैं, हमारा सिर्फ इतना मानना है कि आप हमारे उत्पाद का सही कीमत दे दो। सम्पन्नता दौड़ेगी। लेकिन आपमें साहस नहीं है।

(कुणाल कुमार सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

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