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विमर्श

कबीरपंथ से कबीर ही गायब..

करीब छह सौ साल पहले कबीर धरती पर आकर चले गए, उनके विचारों का प्रभाव जबरदस्त हुआ। सामंती समाज था हमारा तब। हिन्दू धर्म में परम्परा से चलते आ रहे जातीय भेदों, अन्धविश्वासों और बाह्याचारों की जकड़न ने सामान्यजनों का जीना दुश्वार कर रखा था, साथ ही, इसका प्रभाव इतना घना कि बाहर से आई मुस्लिम शासक जातियों के साथ आए जनसमूह से बनीं हमारी मुस्लिम बिरादरी के यहाँ भी जाति-भेद का जहर समा चुका था। मुस्लिम शासकों से इस्लाम की समानता का व्यवहार पाने, परम्परा से पायी वंचना से उबरने के लोभ-लालच और जोर-जबरदस्ती जैसे तमाम कारकों ने तत्कालीन जनता के उपेक्षित और निचले तबकों की अनेक जातियों को इस्लाम कबूल करने/करवाने को उद्धत किया था, पर समानता पर आधारित इस्लाम के भारतीय हिस्से को भी हिन्दू समाज की कैंसर-कोढ़, जाति-प्रथा ने तालाब की संडी मछली की तरह गंदा कर दिया। यहाँ मूल/उच्च (बाहर से आये) मुस्लिम ही शासन-सूत्र पर जाति-सोपान में श्रेष्ठ-सवर्ण कहलाने वाले ब्राह्मण और राजपूत बिरादरी की सहायता ले काबिज़ हुए, और, इन सत्ता-सटे हिन्दुओं की देखादेखी शासकीय मुस्लिम बिरादरी भी कन्वर्ट मुस्लिमों के साथ जातीय व्यवहार करने लगी। मजेदार बात तो यह कि जो इक्के-दुक्के हिन्दू सवर्ण मुस्लिम में कन्वर्ट हुए वे उच्च मुस्लिमों की मूल पांत में ही जा बैठे। यानी, जाति का विभेदक बाज़ार भारतीय मुसलमान समाज में भी सज गया, हिन्दू धर्म ने अपने ही चरित्र में रंग लिया उसे।

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जाहिर है, हिन्दू हो या मुस्लिम, कबीर के समय में भी पीड़ित जनों के सारे मानवोचित अधिकार शासकों-सामंतों और उनकी थैली के चट्टो-बट्टों के यहाँ गिरवी थे। और, हिन्दू-मुस्लिम के बीच सांप्रदायिक तनाव और विद्वेष परवान चढ़ चुका था। सामंती व्यवस्था को ब्राह्मणी धर्म-व्यवस्था की गलबहियां मिली थीं, ऐसे समय-समाज में कोई किसी के स्वप्नों को साकार करने के लिए राह दिखाने आ जाये, तो उसकी और बेसब्र ख़ुशी से बदहवास दौर लगाने वालों का ताँता लगना अस्वाभाविक नहीं। परिणाम, तब के धार्मिक टंटों-बखेड़ों से मुक्ति दिलाने वालों की कबीरी अंगड़ाई सामने आई, कबीर के अनुयायी ‘कबीरपंथ’ के बैनर तले उनके विचारों को जहाँ-तहां समाज में दखल दिलाने को सामने आ गए।

कबीर के समय में भारत क्षेत्र में दो धर्म ही बचे थे। उनके पहले क्रांतिकारी बुद्ध और महावीर आ कर चले गए थे, उनके नाम पर बने-चले बौद्ध और जैन धर्म का प्रभाव भी हिन्दुत्वादी शासकों एवं शक्तियों के जुल्म के चलते ख़त्म हो चला था। हिन्दू धर्म फिर से पूरी तरह रुग्ण हो कर अपने आतंककारी शक्ति-स्वरूप और प्रभुता को पा गया था! अनपढ़ कहे वाले अनन्य बुद्धि-बल कौशल के धनी कबीर ऐसे ही क्रूशियल टाइम में रौशनी की एक दमदार लौ की तरह आ धमकते हैं और बाह्याचारों से जकड़े धर्म के नाम पर झगड़ रहे हिन्दुओं-मुस्लिमों के लिए मानवतावादी रास्ता अख्तियार करने की राह बनाते हैं। धर्म से लगे बाह्याम्बरों-अंधविश्वासों-चलनों को लेकर हिन्दू और मुस्लिम समाज में स्वभावतः बहुधा टकराव की स्थिति आ बनती थी। कबीर ने मनुष्यता के आड़े आते इन उच्छिष्ट धर्म-आचारों से बचने के लिए दोनों धर्म के मानने वालों को डांटा-फटकारा और चेताया भी। कबीर के ऐसे ही विचार उनके जाने के बाद कबीरपंथ के मतानुयायी आगे भी फ़ैलाने की कोशिश करते हैं जिसमें हिन्दू-मुस्लिम दोनों तबकों के मानवीय और समझदार लोग आगे आते हैं।

कबीर के विचारों पर, कबीरमत पर चलना हिन्दू या मुस्लिम धर्म के बाह्याचारों को सहलाते हुए हुए कतई संभव न था। और, बाह्याचार को छोड़ दें तो इन दोनों धर्मों में बचता ही क्या है? इसलिए, मूल कबीरपंथ बड़ी असुविधा का रास्ता था। इसे धर्म छोड़ ही अपनाया जा सकता था। पर इस बात का कहीं कोई प्रमाण नहीं है कि किसी भी काल में बड़े से बड़े कबीरपंथी ने अपने को धर्म न मानने वाला बताया हो। मैं समझता हूँ कि हिन्दू या मुस्लिम धर्म से साफ़ दूरी न रखते हुए कबीरपंथी होने का जो चलन रहा वही कबीरपंथ के रीढ़विहीन हो जाने का मूल कारण बना।

आप देखेंगे कि कथित उच्च वर्णीय स्वार्थी तत्वों ने भी अपने लाभ-लोभ की पूर्ति होते देख कबीरपंथ का बाना धारण किया और सेंध लगाकर नेतृत्वकारी व ऊँचे आसनों पर जा बैठे। अधिकांश सम्पत्तिशाली और भव्य कबीरमठों के महंथ पद आप दबंग और उच्च मानी जाने वाली जातियों से ही सुशोभित बना पाएंगे! जबकि उच्च जातियों के आम तबके ने कबीरपंथ को किसी समय में भी नहीं अपनाया। कबीरपंथ की मूल और मुख्य पैठ हिन्दू-मुस्लिम समाज के नीचले तबकों के बीच थी, कारण साफ़ था, हिन्दू-मुस्लिम के उच्च कहे जाने वाले तबके ने ही धार्मिक बाह्याचारों में दमित जातियों को फंसा कर आपस में बाँट रखा था, और उनके मूल मानवाधिकारों को स्थगित कर रखा था। यहाँ यह भी रेखांकित करने योग्य है कि कबीर का प्रभाव मुस्लिमों पर कम पड़ा, क्योंकि वहाँ धार्मिक कठोरता अधिक थी, वहाँ से भागना मुश्किल था। जबकि इसके मुकाबले, आपस में छत्तीसी रिश्ता रखने वाले चौरासी करोड़ देवी-देवता वाले हिन्दू समाज में धर्म से ‘बहकना’ अपेक्षाकृत बहुत आसान था।


आज के वैज्ञानिक-तार्किक समय में भी तो कबीर और उनके मतानुयायियों के प्रयास का कोई स्पष्ट और परिणामी प्रभाव हमारे समाज में नहीं दीखता। जबकि कबीरपंथ का प्रसार भारत में कम नहीं है। ज्यादा जोगी मठ उजाड़-वाली उक्ति कबीरपंथ के साथ भी चरितार्थ होती है। कबीरपंथी मठों से लगी चल-अचल संपत्ति और जन-स्वीकार्यता के कारण उसपर वर्चस्व का स्वार्थी-लोभी और खूनी खेल वैसा ही चलता है जैसा कि हिन्दू-धर्मावलम्बी मठों में। ‘साईं इतना दीजिये जामे कुटुम समाय’ का तोषकारी रास्ता अख्तियार करने वाले कबीर के साथ यह बड़ा धोखा, मजाक और अन्याय है। कबीर-पुत्र का प्रतीक लें कहें तो इन मठों के रहवैये भी ‘कमाल-मति’ बन गए हैं। कहते हैं कि सिद्धान्तहीनों के पास बहुत शक्ति नहीं होती अतः वे किसी मुद्दे पर महत्वपूर्ण और परिणामी संघर्ष नहीं कर सकते। कबीरपंथ के गुरुओं और अभ्यासियों का यह विचलन-फिसलन इसी अंधे रास्ते जाता है।

कहीं कहीं कबीरपंथियों में कुछ ऐसे कट्टर किस्म के शुद्धतावादी हैं कि लकड़ी पर पानी के छींटे मारकर शुद्ध करने के पश्चात् ही चूल्हे में जलाते हैं और कहीं ऐसी पंथगत शिथिलता है कि गले की कंठीमाला के कारण ही वे कबीरपंथी हैं, वरन, सुबह-शाम मूर्ति-पूजन के लिए मंदिर भी जा रहे हैं। वे शुद्ध शाकाहारी होटल तक में खाना नहीं खायेंगे, सोयाबीन (बरी, साबुत नहीं) की सब्जी में उन्हें मीट (मांसाहार) का गंध नजर आता है। बिनकंठीधारी परिवार के घर का अन्न-जल नहीं ग्रहण करने वाले लोग भी हैं।

करीब २० वर्ष पहले की बात है, दरभंगा जिला स्थित एक प्रसिद्ध कबीरमठ में लगने वाले एक विशाल जनसमूह को आकर्षित करते कबीरपंथी संत समागम (वस्तुतः सामान्य मेले में तब्दील) में गया था। वहां कई मठों के महंथ आये थे। उन्होंने मंच पर आसन ग्रहण करते एक दूसरे को ‘साहब बंदगी’ (अभिवादन) तक न की, जबकि छोटे-बड़े का भेदभाव न पालने की बुनियाद पर एक कबीरपंथी के दूसरे से मिलने पर पैर छू कर त्रिपेखन-बंदगी (तीन बार अगले का सर नवा कर और पाँव छू अभिवादन) का भी रिवाज़ है। पर यहाँ तो सभी महंथ एक दूसरे से बड़े रह गए। एक ही दफ्तर में दो समजातीय व्यक्तियों को देखा है, आपस में उनने कभी (फर्स्ट जनवरी जैसे रस्मी अवसर अपवाद) न हाथ मिलाया न अभिवादन किया, जबकि कोई मन-मुटाव नहीं, बस, इगो(अहं) कि पहल मैंने की तो अगला बड़ा साबित हो जायेगा! समदर्शी कबीरपंथ के अगुआजन भी इसी मानसिकता के हैं। मेरा विदारक अनुभव यहीं नहीं रुका, देखा कि मेज़बान महंथ के पुरुष-महिला परिजनों, कतिपय विशिष्ट भक्त और चेलों ने कबीर की तस्वीर की आरती तो उतारी ही, उन महंथ को गुरु मान कबीर सरीखा ही भक्ति-ट्रीटमेंट बक्शा! और, यह बाह्याचार करीब पौन घंटे चला, यह सवाल भी बनता है कि गुरु जन्मना होना चाहिए कि कर्मणा? जन्मना व्यवस्था तो जाति-व्यवस्था की तरह हुई, जिससे कबीर ने संघर्ष किया था। ब्राह्मणी/सामंती व्यवस्था में पिता के बाद पुत्र गद्दी का हकदार होता है चाहे उसमें अपने पिता के समान काम-काज करने के गुण हों या नहीं। कबीर गुरु-गद्दी के लिए वंशानुगत-व्यवस्था के पक्षधर नहीं हो सकते। अन्य पंथों/धर्मों की तरह कबीरपंथ में भी इस वंशानुगत परम्परा का उग आना भयावह है।

भारतीय मानसिकता को धार्मिक चमत्कारों ने तर्क-शून्य बनाने की भरपूर कोशिश की है। और, धार्मिक बाह्याचारों के सख्त खिलाफ रहे कबीरपंथ पंथ के कुछ सांप्रदायिक ग्रंथों में कबीर एवं कुछ मुख्य कबीरपंथी साधुओं/महंथों के चमत्कारिक कार्यों का काफी उल्लेख है। कुछ कबीरपंथी अगुआ एवं महंथों का मानसिक स्खलन और उत्साह इस कदर बढ़ गया है कि वे गंडा-ताबीज़, जड़ी-बूटी बेचने लगे हैं और झाड-फूंक करने लगे हैं। यह भी कि हिन्दू मिथकों को समर्थित करते हुए कोई बात कहने से कबीरपंथ के विवेकशील प्रवक्ताओं और पुराण-मानसिकता के खिलाफ लड़ने वाले धर्म प्रवाचकों को बचना चाहिए। जबकि आप देखेंगे कि कबीर के विचारों-उपदेशों का बयान करते कबीरपंथी साधु-महात्मा रामचरितमानस और गीता के दोहे, चौपाई आदि का सन्दर्भ देने लगते हैं।

आप देखेंगे कि साम्प्रदायिक दंगों-टंटों पर भी कबीरपंथी महात्माओं के उपचारकारी उपदेश-अनुदेश हमें उनके किन्हीं प्रवचनों अथवा जमीनी कार्यों से नहीं प्राप्त होते। उत्तरप्रदेश के अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद विवाद के सन्दर्भ में सन १९९२ मस्जिद-ध्वंस के उपरान्त कुख्यात दंगा प्रकरण हो, अथवा गुजरात का सन २००२ का हिन्दू-मुस्लिम दंगा। मानवता को तार तार करने वाली इन और इन जैसी अन्य घटनाओं पर हमें कबीरपंथियों की चिंता सामने आती हुई नहीं दिखती। पंथ की चुप्पी कबीराना-प्रवृत्ति से मेल नहीं खाती। कबीर कहते हैं-

“वही महादेव, वही मुहम्मद, ब्रह्मा-आदम कहिये/कौ हिन्दू कौ तुरुक कहावै, एक जिमी पर रहिये।” और,
हिन्दू कहे मोहे राम प्यारा, तुरक कहे रहिमाना/आपस में दोउ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।

दुखद और चिंताजनक यह है कि कबीर की जरूरत आज भी हमारे समाज को है और इसलिए इतने लम्बे काल से चलते आये कबीरपंथ की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। पता नहीं, कबीर के अपने समय में समाज पर उनका क्या प्रभाव था, कोई ठोस निष्कर्ष देने वाली जानकारी हमें प्राप्त नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि किस मामले में कबीरपंथी हिन्दू एवं अन्य पंथों-धर्मों के अनुयायियों से अलग हैं? हिन्दू कर्मकांडों के स्थान पर नये कर्मकांड, पुराने मन्त्रों के बदले नए मन्त्र, पूजा-पाठ के बदले चौका-आरती-आखिर परिवर्तन क्या हुआ? इन से पंथ का प्रचार-प्रसार भले ही हुआ हो, कबीर के मूल विचार प्रचारित नहीं हो पाए हैं। कबीरपंथियों को तो कबीर से भी आगे जाना था, कबीर के आधुनिक मिजाज़ और सर्वकालिक चिन्तन की रक्षा करते उन्हें जनसामान्य के बीच ले जाना था। कबीर के विचार को फैलाते हुए कबीरपंथियों को जाति-व्यवस्था और धार्मिक नाकेबंदी को नकारते-ललकारते हुए अंतरजातीय-अंतरधार्मिक वैवाहिक संबंधों को बढ़ावा देना था।

कबीर के मानवतावादी आदर्शों को इस देश के वामपंथी, बौद्ध, जैन, अम्बेडकरवाद जैसे म़त आगे ले जा सकते थे, वे उस चेतना को जनता के बीच फ़ैलाने का काम जारी रख सकते थे जिसके लिए कबीर जैसे क्रांतिधर्मी और अग्रसोची लोग धर्मवादियों के खिलाफ लड़ते रहे। आज लड़ना कोई नहीं चाहता, मार्क्सवाद तो बिलकुल भी नहीं, न ही कबीरपंथी या बौद्ध, जैन। वैसे, कुछ आशा वामपंथियों, अम्बेडकरवादियों से की जा सकती है, पर उनका संगठन भी बहुत असरकार नहीं है, भारतीय वामपंथियों के विचार भटके हुए हैं। कबीरपंथ की तरह यहाँ भी संगठन के महत्वपूर्ण स्थलों पर सवर्ण काबिज़ हैं। यानी, कबीर के ही शब्दों में, अंतर तेरे कपट कतरनी… फिर, ऊंट के मुंह में जीरा से तो हमारा काम नहीं चल सकता न?

जबतक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में कबीरपंथ का कोई सार्थक और प्रभावी हस्तक्षेप नहीं होगा तबतक पंथ का उद्देश्य और औचित्य पूर्ण नहीं कहा जा सकता। कबीर को एक सार्वजनिक गाली बहुत समय से पड़ती आ रही है! विद्रोही कबीर ने अपनी कर्मस्थली और हिन्दुओं की पुण्य-स्थली काशी को त्याग अपनी मृत्यु के लिए उस मगहर का चुनाव किया था जिसके बारे में धर्म-मान्यता यह है कि यहाँ जिसका अंत होता है वह सीधे नरक में जाता है। सन्देश स्पष्ट था। पर उनके अनुयायियों ने उनको हिन्दू और मुस्लिम चश्मे से ही उनका अंतिम संस्कार किया। मगहर में हिन्दू-कबीर और मुस्लिम-कबीर के मज़ार अलग अलग हैं, कबीर की अंत्येष्टि के सम्बन्ध में उनके देवत्व के किस्से को सहलाते कि शव को लेकर लड़ते-झगड़ते हिन्दू-मुस्लिम अनुयायियों के बीच से उनका मृत शरीर गायब हो गया थाऔर बच गए थे शव पर रखे फूल जिन्हें उन लोगों ने आपस में बाँट लिया था। यह किस्सा तो खैर सच हो ही नहीं सकता, न ही वैसे लोग कबीर के अनुयायी हो सकते हैं। कभी अखबार में पढ़ा था, बिहार के हृदय-स्थल जिले पटना के किसी स्थान पर ‘कुशवाहा कबीरमठ’भी है! आश्चर्य क्या करना, हतप्रभ क्यों कर होना??

लेखक-डॉ. मुसाफिर बैठा

(ये लेखक के निजी विचार हैं। डॉ.मुसाफिर बैठा लेखक, कवि, बहुजन चिंतक-विचारक हैं।)

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