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गौरी लंकेश हत्या: शरीर मिटा दोगे पर विचारधारा को कैसे मिटा पाओगे?….

कर्नाटक की मशहूर लेखिका, पत्रकार और अंधविश्वास के विरुद्ध संघर्षरत रहने वाली गौरी लंकेश को उनके घर पर अज्ञात हमलावरों ने गोली मार करके हत्या कर दिया है जो दुखद एवं शर्मनाक है। गौरी लंकेश जी दाभोलकर, कुलबर्गी,पनसारे जैसे शहीद साहित्यकारों एवं समाज सुधारकों की श्रृंखला की एक मौत थीं जिनके मारे जाने का नितांत अफसोस है, पर हत्या करने वाले लोगों यह सत्य है कि किसी को शरीर से आप मिटा सकते हो पर उसकी विचारधारा तो अजर-अमर, अमिट-अजेय बनी ही रहेगी। आखिर आप उसके विचारों को कैसे मार सकोगे? गौरी लंकेश को मार करके मुझे लगता है कि गौरी लंकेश को और भी लोकप्रिय, उनके विचारों को और भी मजबूत बना दिया है उनके हत्यारों ने।

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हम कितने असहिष्णु हो गए हैं कि अपनी बात मनवाने के लिए हम किसी की हत्या तक कर दे रहे है। यह तो अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने की कोशिश है जो कभी भी न कामयाब हुई है और न होगी। मरना तो सबको है,फर्क सिर्फ इतना है कि कोई 80 वर्ष पर मरेगा और कोई 30-40-50 पर लेकिन वह मरना क्या मरना जो गुमनाम हो जाय? गौरी लंकेश मरी हैं असमय, पर उनका यह मरना, मरना नहीं है, यह तो अमरत्व है जो उन्हें मरने के बावजूद वैचारिक रूप से अमर और अमिट कर दिया। अब इस गौरी लंकेश को कैसे मरोगे उनके हत्यारों। जो पूरे देश और दुनिया मे मरते ही लोगो के जेहन में बैठ गयीं? इस गौरी लंकेश को कैसे लोगो के दिलोदिमाग से निकाल पाओगे आप? जैसे नरेंद्र दाभोलकर, कुलबर्गी, पनसारे जैसे लोग मर करके भी दुनिया मे विमर्श का विषय बन गते हैं वैसे ही गौरी लंकेश भी अब वह लकीर बन गयी हैं जिन्हें कोई मिटा नही सकता।

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हम बैंगलौर में गौरी लंकेश जी की निर्मम हत्या की निंदा करते हुए ऐसे तत्वो से यही कहेंगे कि विचारधारा से असहमत होना अलग बात है पर इसके लिए किसी की हत्या कर बैठना बिलकुल गलत है। हम ऐसा कर किसी विचारधारा को मात नहीं दे सकते हैं। हम प्रेम, करुणा, दया, तर्क, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किसी को भी परास्त कर सकते हैं पर हिंसा से नही। गौरी लंकेश को दुखपूर्वक कोटिशः नमन है।


(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका यादव शक्ति के एडिटर इन चीफ हैं।)

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