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सरकार की नीतियों और लापरवाही के कारण बह गई हैं कई लाख झोपड़ियां-रवीश कुमार

मेरी बिहार सरकार से मांग है कि बाढ़ में जितनी झोंपड़ियाँ नष्ट हुईं हैं, उनका पूरा पूरा दाम ग़रीबों को वापस करे। बाढ़ प्राकृतिक आपदा नहीं है। सरकार की बाँध नीति और लापरवाही से पैदा होती है। इसलिए सरकार को अधिकतम जवाबदेही उठानी चाहिए। चूड़ा चीनी और बुनिया बिल्कुल ठीक है लेकिन ग़रीब लोगों का घर वापस होना चाहिए। दो तरह से। झोंपड़ी बनवा कर दे या फिर इंदिरा आवास योजना का पैसा उन्हें दिया जाए। यह पैसा एक महीने के अंदर सबको दिया जाए। आधार और अन्य पहचान के कारण अब सबका नाम पता है, उससे पता कर लोगों में पैसा बाँटा जा सकता है। रातों रात खाते में ये पैसा ट्रांसफ़र भी हो सकता है जिनके खाते हैं। जिनके नहीं है उन्हें भी दिया जा सकता है।

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हमने कल अपने मित्र गिरिंद्रनाथ झा की मदद से एक झोंपड़ी की लागत पता की है। दो कमरे की फूस की झोंपड़ी पचास हज़ार में बन जाती है और एक कमरे की पचीस से तीस हज़ार में। सरकार की नीतियों और लापरवाही के कारण कई लाख झोपड़ियाँ बह गई हैं। कम बही हैं तो यह अच्छी बात है, सरकार को कम लोगों को पैसे देने होंगे।

हमने एक मोटामोटी अनुमान लगाया था। कोई सात आठ सौ करोड़ का हिसाब बैठता है। बेहद मामूली रक़म है। इतना पैसा तो कब किस जगह से घोटाले में निकल जाता है, सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है। दिल्ली की सरकार भी मदद कर सकती है। इसलिए पैसे की कमी नहीं है। इतना पैसा राजनीतिक दल एक चुनाव में हँसते खेलते फूँक देते हैं।

बिहार के सभी दलों के विधायक और सांसद सरकार से मांग करें कि जिनकी भी फूस की झोंपड़ी तबाह हुई है, उन्हें नई झोंपड़ी बनाने का पैसा दशहरा से पहले बाँटा जाए। इस वक्त ग़रीब जनता विस्थापित है। अख़बार भी नहीं पढ़ पाती होगी। टीवी नहीं देख पाती होगी। इसलिए आप जिस भी बाढ़ प्रभावित ग़रीब लोगों से मिलें तो उन्हें बताए कि सरकार से चूड़ा चीनी नहीं, झोंपड़ी का दाम मांगिए। विधायक और सांसद को इसके आश्वासन के बग़ैर इलाके में घुसने न दें।

सरकार आराम से पचास हज़ार रुपये दे सकती है। यह मुआवज़ा नहीं होगा बल्कि जनता की तरफ से सरकार पर लगाया गया जुर्माना होगा। लगे हाथ प्रधानमंत्री भी सबके पास घर का अपना सपना पूरा कर सकते हैं। बिहार के जो युवा राजनीति में कुछ करना चाहते हैं , वो इस पोस्ट को अपने नाम और फोटो के साथ अभी का अभी पोस्टर पर छपवा कर अपने अपने इलाके में लगवा दें। मामूली ख़र्चे में यह मांग जन जन तक पहुँचेगा और आपका नाम भी। जल्दी करें। यूपी बंगाल और असम में भी यह मांग उठनी चाहिए।


(ये लेखक के निजी विचार हैं। रवीश कुमार एनडीटीवी के सीनियर एडिटर हैं। ये लेख उनके फेसबुक पोस्ट से लिया गया है।)

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