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मेनस्ट्रीम मीडिया ने जिनको साबित किया था आतंकी, ATS ने छोड़ दिया..

कहते हैं पुलिस रस्सी का सांप बना देती है, मगर हिन्दी जगत के कई मीडिया संस्थानो ने अब रस्सी का सांप बनाने में पुलिस को कई मील पीछे छोड़ दिया है। बीते छ तारीख को एटीएस ने देवबंद से कुछ छात्रों को पूछ ताछ के लिये हिरासत में लिया था।

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इनमें से पांच छात्रों दानिश,अब्दुल बासित,रहमान, अब्दुल रहमान, और आदिल को 24 घंटे के अंदर ही पाक साफ बताते हुऐ बाइज्जत बरी कर दिया, इनमें से तीन छात्र देवबंद और दो जलालाबाद के एक मदरसे में पढ़ते हैं।

देवबंद के कोतवाल पंकज त्यागी ने आज मदरसा संचालक को बुलाकर इन छात्रों को उनके सुपुर्द कर दिया। लेकिन आज के अखबार जिनमें हिन्दुस्तान, अमर उजाला शामिल हैं इन छात्रों को आतंकवाद का मास्टरमाईंड साबित कर चुके थे। इन अखबारों ने पहले पृष्ठ पर जो खबरें लगाईं उनके शीर्षक देखिये –

मुजफ्फरनगर में बंग्लादेशी आतंकी गिरफ्तार (अमर उजाला)
देवंबद – मुजफ्फरगर से छ आतंकी दबोचे (हिन्दुस्तान)
आतंकवादियों की पनाहगाह बन चुका है वेस्ट यूपी (दैनिक जागरण)
शिकंजे में आतंकी नाम से हिन्दुस्तान ने तो स्पेशल पेज प्रकाशित किया जिसकी खबरों के शीर्षक कुछ इस तरह हैं।
एटीएस ने दो कश्मीरी छात्रों को हिरासत में लिया (हिन्दुस्तान)
घर में हॉस्टिल मालिक को बुलाकर की छापेमारी (हिन्दुस्तान)
पाकिस्तानी के बाद बंग्लादेशी (हिन्दुस्तान)
छात्रो ने लिया था मदरसे में दाखिला (हिन्दुस्तान)
आतंकियों का पुराना कनेक्शन (हिन्दुस्तान)
मस्जिद के मोहतमिम गायब (हिन्दुस्तान)
आतंकवादी पकड़े जाने के बाद स्टेशन पर बढ़ी चौकसी (हिन्दुस्तान)
पश्चिम बंगाल है वेस्ट यूपी का इंट्री प्वाईंट (हिन्दुस्तान)

आज के अखबार इन खबरों से भरे हुऐ हैं, किसी भी अखबार ने यह कमी नहीं छोड़ी कि वह कह सके कि उसने पकड़े गये नोजवानों को आतंकवादी नहीं लिखा, बल्कि सभी ने जज बनकर फैसला सुना दिया, नई नई कहानियां गढ़कर इन लोगों के तार आतंकवाद से जोड़ दिये, ये कहानियां इनके पास कहां से आईं ये पुलिस ने दी या फिर इन अखबारों ने खुद तैयार कीं यह अलग सवाल है।


फिलहाल सवाल यह है कि आखिर ये कैसी पत्रकारिता हो रही है ? और कौन इस पत्रकारिता के जनक हैं ? इस पत्रकारिता के जनक जो भी हों वे पत्रकार नहीं बल्कि वे मानसिक रूप से दिवालिया हैं, आतंकवादी हैं, वे ऐसे पत्रकार हैं जो एक समाज में जहर घोलने का काम कर रहे हैं। मनघड़ंत कहानियां गढ़कर वे समाज को आतंकित कर रहे हैं।

अमूमन देवबंद जैसी कस्बों में वहीं के बाशिंदे रिपोर्टर हुआ करते हैं, पत्रकार कोई मशीन नहीं है बल्कि वह भी इंसान है, क्या इन पत्रकारो की मुलाकात समाज में मुसलमानों से नहीं होती ? क्या इनका उठना बैठना मुसलमानों के साथ नहीं होता ? अगर नही होता तो फिर ये पत्रकार नही बल्कि आतंकी हैं, और अगर समाज में पैंठ होने के बाद भी वे मुसलमानो से इतने ज्यादा नफरतजदा हैं तो फिर वे बीमार और मानिसक रूप से दिवालिया हो चुके हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। वसीम अकरम त्यागी ‘मुस्लिम टुडे’ से जुड़े हैं।)

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