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भीड़ के इस रूप के बारे में आपका क्या ख्याल है?

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।

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यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।

यह कहने वाले इस देश में पहले एक मानसिक रूप से विक्षिप्त औरत को बच्चा चोरी का आरोप लगा कर पहले ट्रैक्टर से बांधा जाता है, निःवस्त्र किया जाता है और इतनी पिटाई की जाती है कि वह मर जाती है और ये सब हुआ केवल शक के आधार पर।

ये वही भीड़ है जो मध्यमवर्गीय शहरों में दुर्गा पूजा की भीड़ में महिलाओं के अंगों को छूने के बहाने ढूंढती है तो कभी यही भीड़ बंगलौर जैसे हाई प्रोफाइल शहर में रात का बहाना ढूंढती है औरतों पर सामूहिक हमलें करने के लिए, और यही वो भीड़ है जो गांव में औरतों को डायन करार दे कर निर्दयता से मार देती है।

महिलाओं के प्रति भीड़ का स्वरुप तो और खतरनाक हो गया है, जहां कुछ उन्हें केवल पिटाई से संतुष्ट हो जाती है, तो कुछ उन्हें निवस्त्र करके ही अपने गुस्से के प्रदर्शन का इजहार करती है। इस भीड़ में गुनाहगार वो लोग भी है जो किसी को बचाने की बजाय फोटो लेने या वीडियो बनाने तक ही अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।


भीड़ की अपनी कोई पहचान नहीं होती, होती है तो केवल इतनी शक्ति कि वह किसी की हत्या कर दे। उसके आगे सारे तर्क बेमानी होते हैं। बच्चा, बीमार, महिला या कोई बुजुर्ग हो, भीड़ दया नहीं दिखाती है।

14 साल का जुनैद, 42 साल की ओतेरा हो या कश्मीर के डीएसपी अयूब पंडित या कोई भी। भीड़ को केवल अपनी शक्ति की आजमाइश चाहिए।

हमें यह समझना होगा कि यह भीड़ कहीं आकाश से नहीं आती बल्कि ये हम ही होते हैं या हमारे अपने। जो कभी न कभी किसी तरह से ऐसी भीड़ का हिस्सा बने होते हैं। किसी निर्दोष या दोषी को सजा देना यह तय करने का अधिकार केवल कानून को है। ये हमें सोचना होगा।

फेसबुक तथा अन्य सोशल मीडिया पर गलत तथ्यों को फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि अफवाहों के प्राथमिक स्तर की शुरुआत यहीं से होती है।

(चाहत अन्वी रांची विश्वविद्यालय की छात्रा हैं)

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