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विमर्श

‘दोगलयुग’ की संस्कृति में जी रहा है देश

उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के बाद गिरोह का उत्पात चरम पर है, योगी के मुख्यमंत्री बनने की घोषणा मात्र से ही शुरु हुआ देश भर में उपद्रव लगभग चालू ही है। समझिए कि एक चुनाव जीतना और हारना आज कितना महत्वपूर्ण हो गया है , चुनाव में जीत और हार की बहुत विवेचना हो चुकी है। अब यह समझिए कि एक चुनाव में हार और जीत से आज के भारत में क्या फर्क पड़ता है।

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अब वह दौर नहीं रहा कि एक चुनाव हुआ , नयी सरकार बनी और फिर सब कुछ पूर्व जैसा सामान्य हो गया। अब उथल पुथल होती है, सत्ता में आए लोग उपद्रव करते हैं और सरकार चुप रहती है , सत्ता में आये उस विचारधारा के लोग जहाँ जहाँ अन्य राज्यों में सरकार में नहीं वहाँ भी आक्रामक होते हैं और यह आक्रमण केवल राजनैतिक नहीं होता बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक भी होता है।

भारत विभिन्न संस्कृतियों और विभिन्न धर्मों का देश है, इनका एक चुनाव जीतना इनको दूसरी संस्कृति और दूसरे धर्म के ऊपर अपनी संस्कृति और अपना धर्म थोपने का अनैतिक बल देता है और यह उसी के अनुसार आक्रमण करने लगते हैं , इनकी सरकारें लीपा-पोती करती हैं और इनका दुस्साहस बढ़ता जाता है।

उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव यदि आए परिणामों के विरुद्ध होता तो अवसरवादी नrतीश कुमार को अवसर नहीं मिलता और वह केंचुल में पड़े रहते। तमाम जगहों पर , ट्रेनों पर , रास्ते पर लोग इस सत्तासीन गिरोह के द्वारा मारे नहीं गये होते।

दरअसल यह सब लक्षण तब दिखते हैं जब कोई अत्याचारी व्यक्ति सत्तासीन हो जाए, राज्य अस्थिर हो जाता है, उसके समर्थक अत्याचार करने लगते हैं। हमारा देश अजीब सी स्थिति से गुजर रहा है जहाँ एक विचारधारा का किया कुकर्म छिपा दिया जाता है, कोर्ट भी चुप रहती है या इसके समर्थन में फैसला सुनाती है तो ऐसे ही बहुत छोटे से आरोप पर देश में हंगामा खड़ा कर दिया जाता है।


गोशालाओं में हजारों हजार गाय वहाँ की लापरवाही से प्रतिवर्ष मर जाती हैं और वहाँ सब चुप्पी साध लेते हैं परन्तु किसी अन्य धर्म के व्यक्ति का दूध के लिए गाय लेकर जाना उसके लिए मृत्यु का काल बन जाता है , 29 लोग इसी कारण मार दिए गये।

यह देश दोगलेपन की संस्कृति में जी रहा है , आज के युग को “दोगलायुग” कहिए जहाँ अपनी विचारधारा के लोगों के सारे कुकर्म उचित हो जाते हैं और विपरीत विचारधारा के लोगों का यही कार्य देश के लिए आपदा बन जाता है।

इसी देश में हिन्दू धर्म की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले कलाकार मकबूल फिदा हुसैन को देश छोड़कर विदेश भागना पड़ता है , वहीं मरना पड़ता है और इस्लाम धर्म के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली तसलीमा नसरीन और तारेक फतेह जैसे लोग विदेश से आयातित करके सरकारी सुरक्षा में रहते हैं धन कमाते हैं।
देश “दोगलयुग’ में चल रहा है , जहाँ ईश्वर और संविधान की शपथ लेकर ऊपर से नीचे तक लोग ली गयी शपथ के विरुद्ध काम करते हैं।

देश “दोगलयुग” में चल रहा है जहाँ न्याय भी सत्ता प्राप्त लोगों के इशारों पर मिलता है।

देश “दोगलयुग” में चल रहा है जहाँ एक मुसलमान का जयश्रीराम बोलना लाभकारी और एक हिन्दू का टोपी लगा लेना उसका पाकिस्तानी होने का आधार हो जाता है।

देश “दोगलयुग” में चल रहा है जहाँ कटु भाषा और संबंधों के साथ अपने विरोधी को चुनाव में परास्त करके फिर उसी के साथ गलबहियाँ कर लिया जाता है।
देश “दोगलयुग” में चल रहा है जहाँ सत्ता , जनता की सेवा के लिए नहीं बल्कि घृणित विचारधारा को उग्र और हिंसक रूप से प्रसारित करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त करना है।

यह वही देश है जहाँ
“रघुकुल रीति सदा चलि आई
प्राण जाए पर वचन ना जाई”

की संस्कृति रही है , आज दोगलयुग में 400 सभाओं में हाईवोल्टेज साउंड के साथ लाखों लाख की उपस्थिति में दिए खुद के वचन “जुमला” बोल दिए जाते हैं।
यह देश कभी “राजा हरिश्चन्द्र” और “राजा श्रीराम” का रहा है , जो अब नहीं रहा। सोचता हूँ कि क्या यह वही देश है जहाँ श्रीराम ने अपनी एक प्रजा के सीता की पवित्रता पर सवाल उठाने मात्र से ही अपनी प्राणप्रिये गर्भवती सीता का त्याग कर दिया ? नहीं , यह वह देश नहीं , यहाँ तो 3000 हत्याएँ करने का नैतिक जिम्मेदार व्यक्ति देश की सर्वोच्च सत्ता तक पहुँच जाता है।

अब अनैतिक अधर्मी “रावणराज” है और यही “रावणराज” आज के “दोगलयुग” की सच्चाई है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। यह आलेख फेसबुक पोस्ट से लिया गया है)

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