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विज्ञान और तकनीकी प्रबंधन के ज्ञान से ही सकारात्मक दिशा में बढ़ेगा देश

विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग मेडिसिन मैनेजमेंट आदि पर अधिक जोर देकर और ह्यूमेनिटीज, सोशल साइंस को कुचलकर असल मे वर्ण व्यवस्था को वापस लाया जा रहा है।

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वर्ण व्यवस्था को ज्ञान के कुप्रबंधन या ज्ञान की हत्या के अर्थ में देखिये। समाज की बुद्धि और चेतना को नियंत्रित करने वाला जो आयाम है वो धर्म, सँस्कृति, इतिहास, दर्शन, भाषा, साहित्य आदि है।

समाज विज्ञान विषयों की चेतना से युक्त या इससे वंचित समाज को जीते रहने के लिए जो तकनीकी या प्रबंधकीय ज्ञान चाहिए उतना वे कहीं से भी उधार ले आते हैं। इस तरह युध्द, सैन्य, व्यापार, टेक्नोलॉजी, चिकित्सा, प्रबंधन आदि को दूसरे देशों से आयात करने में किसी को कोई खतरा नहीं। इसमें कोई शर्म की बात भी नहीं है।

यही भारत ने अपने ज्ञात इतिहास में किया है। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ने दैनिक जीवन की तकनीकी और प्रबंधन संबन्धी विशेषज्ञताओं को विकसित किया है या कहीं से उधार लिया है। लेकिन समाज को सभ्यता, सँस्कृति, नैतिकता और इंसानियत की तरफ आगे बढ़ाने के लिए जो सबसे जरूरी आयाम था उस पर अन्धविश्वासी और धर्म-धूर्त ब्राह्मणों ने कब्जा कर रखा है। उन्होंने इस ज्ञान को अपने स्वार्थ के कारण विकसित ही नहीं होने दिया. वैज्ञानिक चिन्तन, आलोचनात्मक चिंतन और भौतिकवादी इतिहास दृष्टि को उन्होंने बार बार कुचला और बर्बाद किया है.

यहाँ तक कि भारत के निचले तीन वर्णों की तकनीकी या प्रबंधकीय कुशलता का स्वयं उन्हें या देश को कोई लाभ नहीं मिल सका है। व्यापक रूप से गरीबी, कायरता, आलस्य, बेरोजगारी और गुलामी हमेशा बनी रही है। भारत ज्ञात दो हजार साल में युद्ध, ज्ञान विज्ञान, सभ्यता, नैतिकता आदि के मुद्दों पर निरन्तर पिछड़ता और हारता ही रहा है।


इसका एक ही कारण है। वो है “तकनीकी और प्रबंधकीय ज्ञान से कहीं ऊंचे और महत्वपूर्ण सामाजिक दार्शनिक ज्ञान पर ब्राह्मणों का कब्जा”।

अगर धर्म, दर्शन, इतिहास, समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा आदि के ज्ञान पर किन्ही विशेष लोगों का कब्जा है तो वे आपकी तकनीकी, वैज्ञानिक, प्रबंधकीय, चिकित्सीय, गणितीय, सैन्य आदि सब तरह की क्षमताओं का इस्तेमाल अन्धविश्वास को बढाने में और दंगा फैलाने में करते रहेंगे।

यही भारत का इतिहास रहा है। अभी भी आपकी आंखों के सामने यही दोहराया जा रहा है।

क्षत्रिय की सैन्य कुशलता और वैश्य या शूद्र की प्रबंधकीय कुशलता आपस में मिलकर भी इस देश को भुखमरी और गुलामी से नहीं बचा सकी। क्योंकि देश, समाज को दिशा देने वाली सांस्कृतिक, दार्शनिक, वैचारिक बहस का नियंत्रण इनके हाथ मे नहीं बल्कि ब्राह्मणों के हाथ मे था। आज अभी अगर आप बहुजनों, दलितों, स्त्रियों, गरीबों, मजदूरों के हक में विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, सैन्य, चिकित्सा आदि का लाभ सुनिश्चित करना चाहते हैं तो आपको ह्यूमेनिटीज यानी सामाजिक विज्ञानों का नियंत्रण अपने हाथ मे लेना होगा।

भारत के बहुजनों, दलितों, आदिवासियों, ओबीसी और स्त्रियों को सामाजिक विज्ञानों, दर्शन, भाषा, साहित्य आदि को अपने हक में मोड़ना सीखना होगा। इन विषयों पर अधिकार निर्मित करना होगा। जो कौम अपनी भाषा, इतिहास, दर्शन, साहित्य, समाज शास्त्र और सँस्कृति का विमर्श अपनी बुद्धि से आगे नहीं बढ़ा सकती वो विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, चिकित्सा आदि सीखकर भी भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान की तरह गुलाम ही रहती है।

भारत के बहुजनों को अपनी ऐतिहासिक पराजय और गुलामी को इस नजर से देखना चाहिए और ह्यूमेनिटीज या सामाजिक विज्ञान विषयों को गंभीरता से लेना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि बहुजन समाज से आने वाले लोग इन विषयों पर खूब लिखें, खूब पढ़ें और अपनी खुद की जरूरतों के हिसाब से नए नए विमर्श पैदा करें।

विज्ञान या तकनीक खुद से कोई विमर्श पैदा नहीं करते बल्कि पहले से उपलब्ध सामाजिक राजनीतिक या दर्शनिक विमर्शों की सेवा करते हैं।

जो सभ्य समाज आज विज्ञान, तकनीक प्रबंधन आदि के ज्ञान से लाभ उठा रहे हैं और एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ पा रहे हैं उन देशों समाजों को गौर से देखिये. उन्होंने पहले अपने समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा, इतिहास और दर्शन आदि के ज्ञान को दुरुस्त किया है. अपने समाज में मानविकी विषयों की बेहतर शोध और समझ को विकसित किया है इसीलिये वे विज्ञान तकनीक आदि को सही दिशा में इस्तेमाल कर पा रहे हैं.

इसके विपरीत भारत पाकिस्तान अफगानिस्तान सीरिया आदि देशों में जहां अपने सामाजिक विज्ञान अपने साहित्य इतिहास दर्शन आदि की समझ के विकास को रोका गया है वहां के समाज विज्ञान तकनीक आदि को अपनी ही जनसंख्या के हित के लिए इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. इस “उधार ली गयी” विज्ञान और तकनीक से वे अपनी समस्याओं को बढा रहे हैं कम नहीं कर रहे हैं.

इसका सीधा मतलब ये हुआ कि विज्ञान और तकनीक जिस तरह के मनोविज्ञान और सामाजिक, मानसिक प्रौढ़ता से पैदा होते हैं वैसा सामाजिक मनोविज्ञान और वैसी सामाजिक प्रौढ़ता पैदा किये बिना अगर किसी समाज को विज्ञान, तकनीक और प्रबन्धन आदि का ज्ञान उधार में मिल जाए तो वो उस ज्ञान से आत्मघात कर लेगा. यही भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों ने किया है.

इस विषय में केन विल्बर्स नामक एक अमेरिकी दार्शनिक ने कहा है कि “तीसरी दुनिया के वे देश जिन्होंने अपनी जमीन पर सामाजिक मुक्ति की लड़ाई नहीं लड़ी है उन्हें अगर पश्चिमी टेक्नोलोजी सिखा दी जाए तो वे उसे सही दिशा में इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं”. किसी विज्ञान या तकनीक को कैसे और किस दिशा में इस्तेमाल करना है ये बुद्धि सामाजिक विज्ञानों की दर्शन, साहित्य,इतिहास आदि की समझ से आती है. और ये समझ भारत पाकिस्तान जैसे गरीब मुल्कों में पैदा ही नहीं हो पा रही है.

विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि आपके हित में काम करेंगे या आपके खिलाफ काम करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मानविकी और समाज विज्ञान का नियंत्रण किसके हाथ मे है। अगर ये नियंत्रण बहुजनों के हाथ मे है तो विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि भारत के पंचानवे प्रतिशत लोगों के हित में काम करेगा। अगर ये नियंत्रण भारत के बहुजनों के हाथ मे नहीं है तो विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि की ये विशेषज्ञताएँ पांच प्रतिशत धर्मधूर्तों की सेवा करेंगी।

भारत के बहुजन तय कर लें कि वे क्या चाहते हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। संजय जोठे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के शोधार्थी हैं।)

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